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44. दो ऐतिहासिक कूच

अपने सत्याग्रहकी लडा़ईमें गांधीजी कभी कभी कूचका भी कार्यक्रम रखते हैं । सत्याग्रहकी ऐसी एक कूच उन्होंने दक्षिण अफ्रीकामें की थी और दूसरी हिन्दुस्तानमें । हिन्दुस्तानवाली कूच दाँडीकूचके नामसे मशहूर है ।

दक्षिण अफ्रीकाके सत्याग्रहमें जब सरकारने मनमानी पर कमर कस ली, तो गांधीजीने तीन पौण्डवाले जजिया के खिलाफ लडा़ई छेड़ दी, और हजारों गिरमिटिया मजदूरोंको लडा़ईमें शामिल होनेकी दावत दी । मजदूरोंने धडा़धड़ खेतों और कारखानोंसे रूखसत ली और गांधीजीके झण्डे तले आ डटे ।

अब गांधीजी सोचने लगे कि सत्याग्रहका वह कौनसा तारीक होगा, जिससे मजबूर होकर सरकारको हजारों सत्याग्रहियोंकी मुश्कें बाँधनी पडे़ हजारोंको जेल भेजनेका इन्तजाम करना पडे़ ।

आखिर गांधीजीको एक ऐसा तरीका सूझा, जिसका किसीको सपना भी न था । उन्होंने ऐलान कर दिया कि वे अपने भारी काफिलेके साथ पैदल कूच करेंगे, और बिना परवानेके ट्रान्सवाकी हदमें घुसकर परवानोंका कानून तोडेंगे ।

बस कूचका दिन तय हो गया। कूच शुरू हो गई । 2,211 आदमियोंका वह काफिला क्या था, एक छोटी-मोटी निहत्थी फौज ही थी ! उस काफिलेमें मर्दोके साथ 127 औरतें भी थीं । मजदूर अपने बाल-बच्चोंको साथ लिये कूच कर रहे थे । अपना-अपना सामान सब अपने कन्धों पर लादे चले जा रहे थे । काफिला एक हद छोड़कर दूसरी हदमें जा पहुँचा । परवानेका कानून तूट गया । मगर सरकार भिनकी तक नहीं । रातमें जब सब लोग खा-पीकर सो रहे, तो पुलिस चुपकेसे आई और गांधीजीको गिरफ्तार करके ले गई ।

सवेरे साथियोंको पता चला। लोगोंके जोशका ठिकाना न रहा । उन्होंने नये जोशसे कूच शुरू कर दी । दूसरे दिन गांधीजी जमानत पर छोड़ दिये गये । छूटते ही वे अपने दलमें आ मिले। लोगोंका उत्साह चौगुना हो गया ।

अगले मुकाम पर सरकारने गांधीजीको फिर गिरफ्तार किया, फिर जमानत पर छोडा़ और गांधीजी फिर अपने साथियोके बीच आ पहुँचे। लोगोके हर्षका पार न रहा ।

इस काफिलेको बडी़ लम्बी-लम्बी मंजिलें तय करनी पड़ती थी । राहमें एक बच्चा बीमार पडा़ और मर गया । सारी छावनीमें शोक (मातम) छा गया लोगोंने बहादुरीके साथ इस चोटको सहा और आगे बढ़ चले ।

जैसे ही पडा़व पड़ता, लोग सोने-बैठने, खाने-पीने, और झाड़ने-बुहारनेकी तैयारियोंमे जुट पड़ते, किसीको दम मारनेकी फुरसत न रहती। जहाँ पडा़व होता, वहाँके, हिन्दुस्तानी व्यापारी बडे़ प्रेमसे काफिलेवालोके लिए खाने-पीनेका सामान पहुँचा देते ।

तीसरी बार जब सरकारने गांधीजी को पकडा़ ही पकडा़। जमानत पर भी न छोडा़ । मुकदमा चलाया और सजा ठोक दी। गांधीजी जेल चले गये ।

अगले मुकाम पर सरकारने सब सत्याग्रहियोंको भी दलबलके साथ गिरफ्तार कर लिया और दो स्पेशल गाड़ियोंमें चढ़कर रवाना कर दिया ।

दाँडीकूच तो अभी कल ही की बात है । उसे कौन नहीं जानता? जब गांधीजीने पूर्ण स्वराज्य या मुकम्मल आजादीके लिए जंग छेड़नेका बीडा़ उठाया, तो उनके सामने सवाल पैदा हुआ कि सत्याग्रहियोके लिए जेलखानोंके दरवाजे क्यों कर खुलें । उन्होंने छान-बीन शुरू की। कई बातें सोची गई, कई सुझाई गई, अंतमें नमकका कानून तोड़नेकी बात तय पायी । गांधीजीको वही जँच गई ।

नमक का कानून तोड़नेके लिए गांधीजीने दाँडीकूच का कार्यक्रम बनाया और कुच शुरू करनेसे पहले भीषण प्रतिज्ञा की जंगल जंगल भटकूँगा, दर-दरकी खाक छानूँगा, कौए-कुत्तेकी मौत मरूगा, लेकिन मुकम्मल आजादीके बिना, वापस आश्रममें पैर न रखूँगा। बस इस प्रतिज्ञाके साथ वे चल पडे़ ।

कार्यक्रम यह बनाया कि साबरमती आश्रमसे पैदल चलेंगे । गुजरातके गाँवों और शहरोंमें ठहरते हुए चलेंगे । अन्तमें समुद्रके किनारे दाँडी तक पहुँचकर वहाँ खुद नमक बनावेंगे, और नमकका कानून तोड़कर मुल्कमें लडा़ईका ऐलान करेंगे ।

आश्रमके 80 साथियोंका एक दल बनाकर गांधीजी 12 मार्च, 1930 को साबरमतीसे चल पडे़ । सुबह-शाम चलते, दुपहरमें और रातमें मुकाम करते, मुकाम पर पहुँचकर लोग खाते-पीते, चरखा और तकली चलाते, और गांधीजी लोगोंको आजादीकी लडा़ईका सन्देश या पैगाम सुनाते। जहाँ-जहाँ कूचवाले जाते, जहाँ वे ठहरते, जिन गाँवों और शहरोके पाससे होकर निकलते, वहाँ लोगोंके दलके दल उनके दर्शनोंको उमडे़ चले आते । अपने बापूको देखकर और बापूकी वाणी सुनकर वे गदगद हो उठते उनकी आँखोंमें खुशीके आँसु छलछला आते ।

लोग रोज सोचते कि आज गिरफ्तार होंगे, कल गिरफ्तार होंगे, और रोज उनकी अटकलें झूठी पड़तीं । आखिर गांधीजी दाँडी पहुँचे, वहाँ समुद्रमें नहाये, समुद्रके पानीसे नमक बनाया और नमक का कानून तोडा़ । फिर भी सरकार चुप रही, उसने गांधीजीकी गिरफ्तारीका हुक्म न छोडा़ ।

सारे देशमें नमकका कानून टूटने लगा लोग घर घर नमक बनाने और कानून तोड़ने लगे ।

सरकारी दमन शुरू हो गया, लोग गिरफ्तार होने लगे, जहाँ-तहाँ लाठियों और डण्डोके जोरसे सभायें तोडी़ जाने लगीं, कई जगह औरतों पर लाठियाँ चली, बच्चों पर डण्डे बरसे । इन खबरोंसे गांधीजी बेचैन हो उठे । वे सोचने लगे ये डण्डे औरतों और बच्चों पर न बरसकर मुझ पर बरसने चाहियें। मैं क्या करू? कैसे ये मुझ पर बरसें?

आखिर उन्होंने धारासणा पर धावा करनेका, वहाँके सरकारी नमकको लूटनेका, निश्चय किया । लेकिन लूटके लिए जिस दिन कूच करनेवाले थे, उनके एक दिन पहले ही रातमें पुलिस आई और चुपकेसे गांधीजीको चुरा ले गई। फिर उनके साथियोंने धारासणा पर धावा बोला ।

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