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42. हरिजन पहले

एक गाँवमें सभा रखी गई थी । गांधीजी उसमें बोलनेवाले थे ।

गांधीजीका भाषण सुननेकी इच्छा किसे न होगी? गाँवकी अठारहों जातके लोग आ-आकर इकट्ठा होने लगे ब्राह्मण आये, बनिये आये, ठाकुर आये, पटेल, पटवारी, जमींदार, चौधरी, नाई, तेली, कुम्हार, चमार, बढ़ई, सभी कोई आये ।

ढेढो़के मुहल्लेसे ढेढ़ भी आये । उन्होंने सोचाः सभामें चलना चाहिये । बापूजी पधारनेवाले हैं । उनकी बातें सुननी चाहियें । उनके दर्शन करने चाहियें । न जाना ठीक न होगा । वे भी आये ।

सभावालोंने ढेढो़को पहचान लिया । लोग चिल्ला उठेः अरे, ये तो ढेढ़ हैं. दूर, दूर ! यहाँ नहीं, उधर जाओ ।

दूसरोंने कहाः 'जाओ, बैरंग वापस हो जाओ ! तुम्हें किसने बुलाया था? यहाँ तुम्हारा क्या काम है?

बेचारों पर चारों तरफसे फटकार पड़ने लगी ! कोई उनकी मदद पर आता ही न था ।

गरीबोंने नरमीसे कहाः 'मालिक, हमें भी बैठने दो न ! बापूजी तो हमारे भी हैं !' किसीको दया न आई । आखिर सभावालोंको समझाकर ढेढो़के लिए कुछ दूर पर थोडी़ जगह दे दी गई और उनसे कह दियाः 'यहाँ बैठो, लेकिन खबरदार! छूना नहीं । किसीके पास जाना नहीं ।

नहीं मालिक ! नहीं जायेंगे, यहीं बैठेगे ।

सभामें खासी भीड़ हो गई । पैर रखनेको जगह न मिलती थी । समय हुआ और गांधीजी आये । 'वन्दे मातरम्' और 'महात्मा गांधीकी जय' के नारोंसे सभा-स्थान गूँज उठा । दूर बैठे हुए उन हरिजन भाइयोंने भी जय-जयकारकी पुकारमें भाग लिया, और वे उझक-उझककर अपने बापूको देखने लगे ।

आते ही गांधीजी सीधे मंच पर पहुँचे और भाषण करनेको खडे़ रहे । उन्होंने एक नजरमें सारी सभाका सिंहावलोकन कर लिया । बडी़ पैनी आँखें हैं उनकी ! दूर बैठे हुए हरिजनोंकी उस टोलीको उन्होंने तुरंत ताड़ लिया ।

गाँववालोंको बुलाकर पूछाः 'वे लोग अलग क्यों बैठे है?'

'महात्माजी, वे ढेढ़ है ।'

'क्या हर्ज है, अगर वे सबके साथ बैठें?'

गाँववाले सोचमें पड़ गये, सर खुजलाने लगे ।

'आप लोग उन्हें सभामें न बुला सकें, तो मैं उनमें जाकर बैठूँगा और वहींसे भाषण करूगा ।'

बस गांधीजी मंचसे नीचे उतर आये, और अपने प्यारे हरिजनोंके पास जा पहुँचे । गाँवके कुछ साहसी लोग भी उनके साथ हो लिये  हरिजन भाईयोंकी खुशीका ठिकाना न था ! उनके दिल बाँसों उछल रहे थे । हृदय उमड़ पड़ते थे । वे गदगद कण्ठसे पुकार उठेः 'बापूजीकी जय. जुग जुग जीयें हमारे बापूजी ।'

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