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40. जबर्दस्त तूफान

गांधीजी अफ्रीकासे हिन्दुस्तान आये । कुछ दिन यहाँ रहे, और वापस दक्षिण अफ्रीका जानेके लिये जहाज पर सवार हुए । यह उनकी दूसरी यात्रा थी । इस बार श्रीमती कस्तूरबा और बच्चे भी उनके साथ थे । रास्तेमें जहाज एक तूफानसे घिर गया। जोरोंका तूफान था । मुसाफिर डर गये । खानापीना हराम हो गया । उल्टियों और उछाटोंके मारे लोग दिक आ गये । ऐसे समय गांधीजीने सबकी सेवा की । सबको ढारस बँधाया। लेकिन सच्चा तूफान तो डबरनमें आनेवाला था ।

डबरनके गोरोंको खबर मिल चुकी थी कि गांधी वापस आ रहा है । सब आग-भभूका हो उठे। बोलेः 'फिर वह हमारे देशमें आ रहा है? उसीने न हिन्दुस्तान जाकर हमारी शिकायत की? वही न हमें सारी दुनियामें बदनाम कर रहा है? बस, निकाल बाहर करो उसे । मजाल है, जो यहाँ कदम रक्खे ।'

कुछ लोगोंने कहाः 'यह गांधी बहुत ही बदमिजाज है, बडा़ मक्कार है, नाकों दम कर रक्खा है इसने । किसीको सुखसे रहने ही नहीं देता । बस, हर बातमें 'कुलियों' को हमारे खिलाफ भड़काता रहता है । कसम खाओ कि उसे अपनी जमीन पर पैर न रखने देंगे ।'

दूसरोंने गरज कर कहाः 'और अबकी तो वह अपने बीबी-बच्चोंको लेकर आ रहा है । मानो, यहीं अड्डा जमाना चाहता है । हम भी देखेंगे, कि बच्चा कैसे आते हैं और कैसे बसते हैं ।' तीसरे दलने चिल्लाकर कहाः 'कुछ खबर भी है, यारो? अबकी वह अकेला नहीं आ रहा, दो जहाज भर कर कुलियां को अपने साथ ला रहा है ।'

'लावे बलासे; लेकिन यहाँ उसे उतरने कौन देगा?'

'चलो, सरकारसे कहा जाय, मनाही हुक्म जारी कर दे ।'

'और अगर सरकार न सुने, तो हमीं गांधीको उठाकर सागरमें फेंक दें ।'

डबरनके गोरोंने सच-झूठ बहुत-कुछ सुन रक्खा था । उनका जहाज डबरनके बन्दरगाहमें आ लगा ।

बन्दरगाहके अफसरोंने देखते ही मनाही कर दी । कहला दियाः
       'दूर रहो ! अपना जहाज यहाँ न लगाओ । यहाँ उतरनेकी मनाही है । तुम्हारे देशमें प्लेग फैला है । तुम्हें क्वारण्टीन में रहना पडे़गा ।'

'लेकिन हमारे जहाजमें कोई बीमार नहीं है ।'

'भले न हो ! क्वारण्टीनमें तो रहना ही होगा ।'

'कै दिन रहना होगा?'

'23 दिन ।'

गांधीजीको अचम्भा हुआ । ये बन्दरगाहवाले इतना कडा़ रूख क्यों दिखा रहे हैं? धीमें-धीमे डरबनकी बातें कान पर आती गई और भेद खुलता गया ।

कुछ लोग जहाजके मुसाफिरोंको डराने लगेः 'अरे भाई, लौट जाओ ! नहीं, समन्दरमें डुबो दिये जाओगे ।'

कुछने जहाजके मालिकको डाँटना शुरू कियाः 'अपना जहाज वापस हिन्दुस्तान ले जा । वरना बरबाद हो जायेगा ।'

लेकिन धन्य हे उनको कि उसमें से न तो कोई डरा, और न कोई डिगा ।

23 दिन तक सब समुद्रकी हवा खाते रहे, और बडे़ मजेसे जहाजमें ये दिन गुजार दिये । आखिर क्वारण्टीनसे छुटकारा मिला । सभी हँसते-खेलते हिम्मतके साथ डरबनके बन्दरगाह पर उतरे । गोरे मुँह ताकते रह गये ।

इतनेमें एक अफसरका संदेशा आयाः 'गांधीजीसे कह दो, दिनमें जहाजसे न उतरें, नहीं, जानका खतरा है ।'

 इस पर एक मित्रने गांधीजीसे पूछाः 'कहिये, क्या इरादा है? आपको डर तो नहीं लगता न?'

'नहीं, डरकी क्या बात है?'

'तो फिर आइये, दिन-दहाडे़ चलें । मैं आपके साथ हूँ । क्या हम चोर हैं, जो अँधरेमें जायँ?'

गांधीजीने अपने परिवारके लोगोंको एक गाडी़ में बैठाया, शहरकी तरफ रवाना किया, और खुद अपने दोस्तोके साथ पैदल डरबनकी ओर चले ।

दोनों दोस्त शहरमें दाखिल हुए । कुछ दूर तक तो किसीने गांधीजीको पहचाना ही नहीं ।

बादमें कुछ गोरे छोकरोंने, जो उधरसे जा रहे थे, गांधीजीको देख लिया । उस देशमें वैसी पगडी़ पहननेवाले गांधीजी अकेले ही थे, इसलिये फौरन पहचान लिये गये ।

उन्हें देखते ही छोकरोंने शोर मचाना शुरू कर दियाः 

'गांधी है ! गांधी है !

मारो ! मारो !

पकडो़ ! पकडो़ !'

शुरू-शुरू में लौंडे चिल्लाते रहे । फिर कंकर फेंकने लगे । इतनेमें बच्चोंके साथ बडे़-बूढे़ भी शामिल हो गये ।

मित्रने गांधीजीसे कहाः 'जान का खतरा है । जल्दी भाग निकलना चाहिये । चलिये, रिक्शामें बैठ चलें ।'

गांधीजीने चौंककर पूछाः 'रिक्शामें? माई, रिक्शा तो आदमी चलाता है । मुझे वह पसन्द नहीं । मैं नहीं बैठूँगा ।'

'अजी साहब, बैठ चलिये ! पसन्दकी एक ही कही । यहाँ जानके लाले पडे़ हैं, आफतके बादल सर पर मँडरा रहे हैं, और आप पसन्दकी चर्चा चला रहे हैं ।'

दोस्तने रिक्शावालेको आवाज दी । रिक्शा आई । गांधीजी अपने मनको समझाकर उस पर सवार होना ही चाहते थे कि उतनेमें लोगोंकी उस टोलीने रिक्शावालेको घेर लिया ।

डपटकर बोलेः 'खबरदार ! भूलकर भी इन्हें न बैठाना । नहीं, रिक्शा तोड़ डालेंगे । सर फोड़ डालेंगे ।'

बेचारा हबसी ! उसकी हिम्मत ही कितनी? डर गया । 'खा' (ना) कहकर लौट पडा़ । जान लेकर भागा ।

अब कोई चारा न रहा । आगे गांधीजी थे । पीछे लोगोंकी भीड़ थी । जैसे बढ़ते गये, भीड़ भी दुगुनी-चौगुनी होती गई । गांधीजी चल रहे थे, पीछे गोरोंका एक जंगी जुलूस आ रहा था ।

शरारतियोंकी उस भीड़में से एक मोटा-ताजा गोरा सामने आय ा। उसने गांधीजीके साथीको अपनी बगलमें दबाया, और उन्हें लेकर एक ओर हट गया ।

अब मैदान साफ था । गांधीजी अकेले पड़ गये थे । लोगोंने उन पर गालियोंकी बौछार और पत्थरोंकी मार शुरू कर दी । एक हजरत जो आगे बढे़, तो गांधीजीकी पगडी़ उछालकर चलते बने । एक दूसरे मुस्टण्डे गोरेने दो चपतें रसीद कीं, और लात मारकर छू हुआ ।

अकेले गांधीजी क्या करते? चक्कर खाकर गिरने ही वाले थे कि पासके एक घरकी जाफरी हाथमें आ गई । थामकर खडे़ हो गये। कुछ देर सुस्ताये और फिर चल पडे़ ।

बडा़ नाजुक मौका था । गांधीजी घिर गये थे । जानका खतरा था । इतनेमें उधरसे एक बहादुर गोरी महिला गुजरीं। वह डरबनके पुलिस अफसरकी पत्नी थीं और गांधीजीको पहचानती थीं । वह दौड़कर गांधीजीके पास पहुँच गई और धूप न रहते हुए भी उनके सर पर अपने छातेकी छया करके साथ-साथ चलने लगीं ।

गोरे सिटपिटा गये । उन्हें इस नेक और बहादुर औरतका लिहाज रखना ही पडा़ । भीड़ कुछ छँटी । लोग कुछ हटकर चलने लगे । फिर भी बीच-बीचमें कुछ मनचले लोग दौड़कर आतें और गांधीजीको चपतिया कर चले जाते थे । उन्हें इसीमें मजा आता था ।

इतनेमें पुलिसका एक दस्ता आ पहुँचा । उसने शराररियोंकी भीड़को तितर-बितर किया और गांधीजीको उनकी इच्छा के अनुसार उनके मित्र डरबनके मशहूर व्यापारी पारसी रूस्तमजीके घर पहुँचा दिया ।

गोरोंकी वह शैतानी टोली उस समय तो बिखर गई, लेकिन रातमें फिर हजारों गोरे पारसी रूस्तमजीके घरके सामने इकट्ठा हो गये और शोर मचाने लगे ।

उनकी एक ही पुकार थी एक ही नाराः
     'गांधीको सौंप दो, नहीं, घर फूँक देंगे ।'

मगर रूस्तमजी थे कि टससे मस न हुए ।

इस मौके पर डरबनके पुलिस अफसरने बडी़ चतुराईसे काम लिया । उन्होंने अपने भरोसेके एक अफसरको रूस्तमजीके घरमें भेजा । गांधीजीको सलाह दी कि वे भेस बदलकर वहाँसे खिसक जायँ । फिर खुद लोगोंकी भीड़में जाकर मिल गये और उसे बहलाने लगे ।

उन्होंने रूस्तमजीके दरवाजेके सामने अपने लिये एक तख्त रखवा लिया, उस पर चढ़ गये और लोगोंसे गपशप लडा़ने लगे । एक तुक जोड़ ली, और लोगोंसे गवाने लगेः

"आओ रे आओ ! गांधीको लाओ !

जिन्दा जलाओ ! फाँसी चढा़ओ !

इमलीके पेड़ पर फाँसी चढा़ओ !"

लोग झूम-झूमकर गाने लगे ।

अमलदारने अपने मनमें कहाः बच्चो, चिल्लाते रहो, जितना चिल्लाना चाहो ! दरवाजा मेरे कब्जेमें है । जाओगे किधर?

बाहर यह तमाशा हो रहा था । अन्दर गांधीजी पुलिस अफसरकी भेजी हुई देशी पुलिसकी पोशाक पहन रहे थे। गांधीजीको यह चीज जँची तो नहीं, मगर मजबूरी थी । जब पहन चुके, तो दोनों बगलके तहखानोंमें घुसे । कुछ देर में सिरेके एक तहखानेका दरवाजा खुला ! दो जवान उसमें से बाहर निकले, दोनों बलवाईयोंकी भीड़में पैठे और बेदाग उस पार निकल गये । उनकी तरफ किसीने देखा तक नहीं । फुरसत किसे थी, जो देखे?

लोग तो झूम-झूम कर उस तुकको गानेमें लगे थेः

"आओ रे आओ ! गांधीको लाओ !

जिन्दा जलाओ ! फाँसी चढा़ओ !

इमलीके पेड़ पर फाँसी चढा़ओ !"

जब पुलिस अफसरको खबर मिली कि गांधीजी सहीसलामत दूसरे मुकाम पर पहुँच गये हैं, तो उसने फौरन बाजी उलट दी, और लोगोंसे कहाः 'दोस्तो, अब आप थक गये होंगे । जाइये, घर जाकर आराम कीजिये ।'

लोग एकदम पुकार उठेः 'नहीं जायेंगे, हरगिज न जायेंगे । गांधी कहाँ है  गांधीको लाओ !'

अमलदारने जरा हँसकर कहाः 'मान लीजिये, आपका शिकार आपके सामनेसे निकल भागा हो, तो आप क्या कीजियेगा?'

'वाह, खूब कही, निकल भागा हो ! कैसे निकल भागा हो? हम इतने जो खडे़ हैं यहाँ?'

तो मैं आपसे सच कहता हूँ कि आपका शिकार आप ही के बीचसे होकर निकल गया है ।

'झूठ ! सरासर झूठ ! हम हरगिज न मानेंगे ।'

'अच्छी बात है; अगर अपने बूढे़ फौजदारका आपको यकीन नहीं है, तो आप खुद अन्दर जाकर देख लीजिये । लेकिन सब नहीं जा सकेंगे । अपनेमें से दो-चारको चुनकर भेज दीजिये ।'

लोगोंने पंचोंको अन्दर भेजा कि जाकर देख आवें । उन्हें यकिन हो गया कि गांधीजी घरमें नहीं हैं । जब लोगोंने सुना, तो चकराये ! खुशमिजाज फौजदारने कहाः 'दोस्तो, आपने अपनी पुलिसकी बात नहीं रक्खी, तो पुलिसको आपसे छल करना पडा़ । हम लोग तो आपके नौकर ठहरे, किसी भी तरह अपना काम बजा लाना हमारा फर्ज है न?  अब आप मेहरबानी करके जाइये । पुलिसकी जीत हुई, आप लोगोंकी हार ।'

जो दाँत कटकटाते आये थे, वही खिलखिलाते हुए लौट गये । इस बवण्डरके बाद कई दिन बीत गये । गांधीजीकी चोटें दुरूस्त हो गई । गोरोके दिमाग ठण्डे पड़ गये । सब अपने-अपने काम-धन्धेसे लगे ।

मारपीट करनेवाले गोरोंका खयाल था कि वह कुली बैरिस्टर उन्हें छोडे़गा नहीं, मुकदमा चलायेगा, सजा ठुकवायेगा।

सरकारवाले रोज राह देखते थे कि गांधी आज शिकायत करेंगे, कल करेंगे ।

लेकिन गांधीजीका तो तरीका ही कुछ और था. दंगाइयोंको वे दयाकी दृष्टिसे देखते थे ।

मारनेवालों को मन ही मन माफ कर चुके थे । वे जानते थे कि बेचारे नासमझ हैं ।

एक दिन गांधीजीको डरबनके एक बडे़ अफसरने बुलाया और कहाः

'गांधीजी, आपको जो चोट पहुँची, जो परेशानी उठानी पडी़, उसके लिए हम सचमुच दुःखी हैं । मानता हूँ कि जिन्होंने आपको सताया, वे सब गोरे थे । लेकिन गोरे हुए तो क्या हुआ? वे गुनहगार हैं । सजावार हैं । यह न समझिये कि वे बच जायेंगे । सरकार चाहती है कि उन्हें सजा हो । आप जरा उनकी शनाख्त करवा दीजिये ।'

गांधीजीने बडी़ शान्तिके साथ कहाः

'इस सहानुभूतिके लिए मैं आपका आभारी हूँ । लेकिन दरअसल मुझे किसीसे कोई शिकायत नहीं ।'

'आप अपराधियोंको पहचान तो सकते हैं न?'

'शायद दो-चारको पहचान सकूँ ! लेकिन मैं मानता हूँ, उन बेचारोंका कोई कसूर नहीं है ।'

'गांधीजी, आप यह क्या कहते हैं? क्या उन दुष्टोंने आपको पीटा नहीं? सताया नहीं?

'गांधीजीसे न रहा गया । उन्होंने बिना झिझके साफ-साफ गोरे हाकिमसे कह दियाः 'माफ कीजिये, असली गुनहगार तो आप लोग हैं । आप-जैसोंने उन्हें उभाडा़ और वे दंगाई बन गये । 'उन बेचारोंका कसूर क्या है? उन्हें सजा किस बातकी दिलाऊँ?'

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