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36. शिकरमकी बीती

प्रिटोरियाका रास्ता मुसीबतोंका रास्ता साबित हुआ । एकका किस्सा सुन चुके । दूसरीका सुनिये । उन दिनों चार्ल्सटाउनसे जोहानिसबर्ग तक रेल न थी । शिकरम चलती थी ।

गांधीजीने शिकरमके लिए बाकायदा टिकट खरीदा । पर ज्योंही शिकरम पर सवार होने चले, गोरे शिकरमवालेने रोका। बोलाः 'सामी ! तुम्हें नहीं बैठायेंगे। तुम्हारा टिकट पुराना है कलका है ।'

उसने सोचाः 'परदेशी आदमी है, अजनबी है, बहानेसे काम चलता हो तो क्यों न चला लूँ?' मगर दरअसल उसकी नीयत कुछ और ही थी । वह नहीं चाहता था कि अपनी शिकरममें गोरे मुसाफिरोके साथ काले कुलीको बैठावे ।

लेकिन यह झाँसेबाजी क्योंकर चले? आखिर शिकरमके अन्दर गोरोंके साथ तो नहीं, बाहर कोचवानकी बराबरीसे गांधीजी बैठाये गये । गांधीजी बहुत सिटपिचटाये मनमें उथल- पुथल मच गईः 'मैं यहाँ क्यों बैठूँ? मुझे अन्दर क्यों नहीं बैठाया जाता?'

लेकिन इस अपमानको भी वे पी गये और बाहर कोचवानके पास जा बैठे ।

कुछ ही दूर गये थे कि मुसीबत शरू हुई । शिकरमका गोरा मालिक साथमें था । उसकी इच्छा हुई कि वह बाहर बैठे और बीडी़ पीये । शायद हवा खानेका भी दिल रहा हो । लेकिन बाहर तो गांधीजी बैठे थे । गोरेने, अपनी जान, इसका भी रास्ता निकाल लिया । कोचवानके पास टाटका एक गन्दा-सा टुकडा़ पडा़ था । गोरेने उसे लेकर पैर रखनेके पटिये पर फैला दिया और गांधीजीसे बोलाः 'ए सामी, तू यहाँ बैठे ! मैं कोचवानकी बराबरीसे बैठूँगा ।'

सुनते ही गांधीजी तिलमिला उठे । सामने पहाड़-सा ऊँचापूरा और मजबूत गोरा था, और मुकाबलेमें दुबले-पतले और अकेले गांधीजी थे। मामला टेढा़ था, मगर गांधीजी डरे नहीं । क्या डरकर अपमान सह लेते?

गांधीजीने साफ कह दियाः 'देखिये, आपकी पहली गलती तो यह है कि आपने मुझे यहाँ बैठाया । मैनें भी जिद नहीं की, बैठ गया । अब आप बाहर बैठाना चाहते हैं । आपको बीडी़ पीनी है । बैठिये, पीजिये । मगर मुझसे क्यों कहते हैं कि आपके पैरोंमें बैठूँ? मैं अन्दर शिकरममें जानेको तैयार हूँ । आपके पैरों तले हरगिज न बैठूँगा ।'

गांधीजी अभी अपनी बात भी पूरी नहीं कर पाये थे कि गोरा भिन्ना उठा । उसने तडा़तड़ तमाचे जड़ने शुरू कर दिये, और हाथ पकड़कर उन्हें नीचे घसीटने लगा । गांधीजीने बैठकके पास लगे हुए पीतलके सीखचोंको काटकाटकर पकड़ लिया और मनमें तय कर लिया कि चाहे हाथ उखड़ जायँ, पर सलाइयाँ नहीं छोड़ूँगा ।

गोरा गालियाँ दे रहा था, घसीट रहा था, और गांधीजी सीखचोंको पकडे़ अड़े थे । न कुछ बोले, न अपनी जगह छोडी़ । गोरे मुसाफिरोंने जब देखा कि मामला बढ़ रहा है, तो बाहर आये, बीच-बचाव किया, शिकरमवालेको बुरा-भला कहा और गांधीजीको छुडा़या ।

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