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35. हाथ पकड़कर उतारा

गांधीजीको डबरनसे प्रिटोरिया जाना था । उन्होंने पहले दर्जेका टिकट कटाया और रेल पर सवार हुए ।

जब घरसे चलने लगे, तो लोगोंने समझाया और कहाः 'देखिये गांधीजी, यह हिन्दुस्तान नहीं है । यहाँ हम लोगोंको कोई पहले दर्जेमें बैठने नहीं देता ।' हम कहते हैं : 'खबरदार. आगे आप जानिये ।'

गांधीजीने किसीकी सुनी नहीं । उन दिनों वे मानते थे कि बैरिस्टरीकी शान बनाये रखनेके लिए पहले दर्जेमें बैठना जरूरी है ।

कुछ दूर तक किसीने कोई छेड़छाड़ न की । रातको करीब नौ बजे गाडी़ मैरित्सबर्ग नामके स्टेशन पर खडी़ हुई । यहींसे एक गोरा मुसाफिर गांधीजीके डब्बेमें बैठा ।

मगर वह बैठे क्यों कर? बैठते ही वह चकरा गया । उसने देखा, गजब हो गयाः पहले दर्जे में और कुली !

गोरा मुँहसे कुछ न बोला। फौरन उतरकर नीचे गया । और स्टेशनके एक-दो अफसरोंको बुला लाया । अफसर आये, टुकर-मुकर देखा किये, मगर हिम्मत न हो कि कुछ कहें । आखिर एक अफसरने गांधीजीके पास जाकर कहा 'सामी ! जरा सुनो, तुम्हें आखिरी डिब्बेमें जाना होगा ।' गांधीजीने कहा 'मेरे पास पहले दर्जेका टिकट जो है ।'

'कोई हर्ज नहीं, टिकट रहने दो । मगर मैं कहता हूँ कि तुम्हें आखिरी डब्बेमें जाना होगा ।'

'मैं भी कहता हूँ कि मैं डबरनसे इसी डब्बेमें बैठाया गया हूँ, और इसीमें जानेवाला हूँ ।'

जवाब सुनकर अफसर तो दंग रह गया ! 'एक गोरे अफसरकी शानमें एक कुलीकी यह हिम्मत?' अफसरने रोब गाँठते हुए कहाः 'हरगिज नहीं. तुम्हें उतरना ही होगा, नहीं, सिपाही आकर तुम्हें उतार देगा ।'

गांधीजीने भी साफ कह दियाः 'अच्छी बात है, आने दीजिये सिपाहीको। मैं अपनी मरजीसे नहीं उतरूँगा ।'

अफसर चिल्लाता हुआ गया और सिपाहीको बुला लाया । आते ही सिपाही डिब्बेमें घुसा, हात पकड़कर गांधीजीको धकेला, नीचे उतारा, और सामान उठाकर बाहर फेंक दिया ।

गांधीजी इस समय आपेमें न थे । वे सिरसे पैर तक हिल उठे थे । खून खौल रहा था । वे न तो दूसरे डिब्बेमें गये, न उन्होंने सामान ही छुआ ! प्लैटफार्म पर खडे़ ही रहे, सो खडे़ ही रहे, और गाडी़ चल दी ।

सारी रात प्लैटफार्म पर पडे़ रहे । कडा़केकी सर्दी थी । साथमें ओवरकोट था । लेकिन फेंके हुए सामानको आँख उठाकर देखनेका भी दिल न होता था । कहीं सामान लेने बढे़ और फिर बेइज्जती हुई तो? बस, सारी रात ठण्डमें ठिठुरा किये, मगर सामानको हाथ न लगाया । जाडा़ खातेखाते दिल में कई तरह के खयाल आये और चले गये ।

'रेलमें बैठकर आगे जाने और फिर बेइज्जत होनेसे फायदा क्या?  बेहतर तो यह है कि वापस लौट जाऊँ ।'

'नहीं, नहीं, यह कैसे हो सकता है?  जिसका बीडा़ उठाया, उसे अधबीचमें कैसे छोडा़ जा सकता है?'

'इस देशमें रहकर धन कमानेसे फायदा क्या?  बेहतर है कि हिन्दुस्तान वापस चला जाऊँ ।'

'नहीं, नहीं, यह कैसे हो सकता है?  यह तो डरपोकोंका काम है । क्या तू डरपोक है?'

'तो क्यों न गोरे सिपाही और गोरे अफसर पर मुकदमा चलाऊँ, और यों दोनोंको उनकी हिमाकतका सबक सिखाऊँ?'

'फजूलकी बात है । इससे होगा क्या? यहाँके तमाम हिन्दुस्तानियोंके सर कुलीपन का जो कलंक लगा हुआ है, क्या वह इससे धुलेगा?'

इस तरह सोचते-सोचते गांधीजीने अपने मनको समझा लिया और अपमानकी इस कड़वी घूँटको पीकर रह गये ।

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