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खुराक के प्रयोग

खाने-पीनेके मामलेमें तरह-तरहके तजरबे करनेका शौक गांधीजीको बचपन ही से है । अपनी जिन्दगीमें उन्होंने ऐसे अनगिनत प्रयोग किये है, अपने आप पर उन्हें आजमा कर देखा है, और कई दफा तो इसीकी वजहसे अपनी जानको भी खतरेमें डाला है ।

उनका बडे़से बडा़ प्रयोग दूधका है । किसी भी चौपायेका दूध पीनेमें गांधीजी एक तरह का अधर्म और हिंसा महसूस करते हैं । वे सोचते हैः भगवनने् जो चीज दुधारू जानवरोंके बछडो़के लिए पैदा की है, उस पर अपना हक जमा लेना इन्सानके लिए बहुत बडा़ पाप है पाप माना जाना चाहिये । वैसे देखा जाय तो दूधकी खुराकको भी हम एक तरहका मांसाहार ही कह सकते हैं । जब इस तरहके खयाल मजबूत होते गये, तो गांधीजीने अपनी खुराकमें से दूधको हटा देनेका, दूध छोड़ देनेका, व्रत ले लिया ।

कई सालों तक उन्होंने दूधको छुआ तक नहीं । इसी अरसेमें बे एक बार इतने सख्त बीमार हुए कि बचनेकी कोई उम्मीद न रही । डाक्टरोंने कह दिया कि अगर गांधीजी दूध लेना शुरू करें, तो मुमकिन है बच जायँ ! आखिर श्रीमती कस्तूरबाके समझाने और आग्रह करने पर गांधीजीने बकरीका दूध लेना कबूल किया, और अब तक वे बराबर बकरीका ही दूध लेते हैं !

दूधके बारेमें जो तजरबा उन्हें हुआ, उस परसे गांधीजी अब यह मानने लगे हैं कि बिना दूधके आदमीका काम चल नहीं सकता । लेकिन साथ ही उन्हें यह भी उम्मीद है कि किसी दिन कोई ऐसा वैज्ञानिक इस देशमें जन्मेगा, जो वनस्पतिसे दूधके-से गुणोंवाली खुराक तैयार करके उसें लोगोके लिए सुलभ बना देगा ।

नमकके बारेमें गांधीजीका यह खयाल रहा कि इन्सानके लिए वह जरूरी नहीं है । और इसलिए कई साल तक उन्होंने नमक नहीं खाया । लेकिन बादमें उन्हें यकीन हो गया कि आदमीकी खुराकमें इस चीजकी भी जरूरत है, इसलिए फिर नमक खाना शुरू कर दिया ।

गांधीजीका खयाल है कि इन्सानकी पूरी और सच्ची खुराक फल ही है । मनुष्यके शरीरकी बनावट, उसके हाथ-पैरोंकी गढ़न, उसके दाँत, उसका पेट, इन सबकी तासीरको देखते हुए साफ मालूम होता है कि भगवानने् मनुष्यको फल खानेके लिए ही पैदा किया है । हम देखते हैं कि बन्दर, जो सूरत-शकलमें आदमीसे बहुत-कुछ मिलता-जुलता है, फल खाकर ही जीता है, इससे भी हमारी बातोको बल मिलता है ।

लेकिन जैसी गरीबी आज इस देशमें है, उसमें यहाँके लोग फल कैसे खा सकते हैं? शायद इसी खयालसे गांधीजीनें मूँगफली, खजूर और केले जैसे कुछ सस्ते फल खोज निकाले, और खुद कई सालों तक इन्हीं फलों पर रहे ।

खाना पकानेके बारेमें भी गांधीजीका खयाल है कि जिन तरीकोंसे वह आजकल पकाया जाता है, वे ठिक नहीं हैं। उनके विचारोमें दरअसल तो खानेकी चीजोंको आग पर चढ़कर पकानेकी कोई जरूरत ही नहीं । जो फल सूरजकी गरमीमें डालने पर पक जाते हैं, वे पूरी खुराकका काम दे सकते है, उन्हें दुबारा आग पर पकाना उनको बेकस बनाना है ।

एक बार गांधीजीको यह खयाल सूझा कि अगर अनाजको भिगोकर अँकुवा लिया जाय और उसको उसी रूपमें खाया जाय, तो औरतोंको चूल्हा फूँकनेसे छुट्टी मिल सकेगी और खर्चमें भी काफी बचत हो जायेगी । भिगोया हुआ अनाज खूब चबा-चबा कर खाना पड़ता है, इसलिए पकाये हुऐके मुकाबलेमें कम खाया जाता है ।

अगर यह चीज सध जाय, तो देशके गरीबोके लिए एक अच्छा वरदान बन सकती है । उन दिनों गांधीजीकी तंदुरूस्ती इस लायक नहीं थी कि वे ऐसा खतरनाक तजरबा अपने ऊपर करते, लेकिन उन्होंने किया । कुछ महीनोके अनुभवके बाद यह भरोसा हो गया कि ऐसी खुराकको इन्सान आम तौर पर हमेशा हजम नहीं कर सकता, तो उन्होंने इस चीजको भी छोड़ दिया ।

लोग धानको कूट-खाँड कर चावलोंको इतना सफेद कर लेते हैं कि वे बिलकुल बेकस हो जाते हैं, और फिर बड़े चावसे उन्हीं निकम्मे चावलोंको खाते हैं । गेहूँ वगैरा नाजके चोकरको फेंककर महीन मैदे जैसा आटा खानेमें शान समझते हैं । सच पूछा जाय तो भूसी और चोकरमें नाजकी असली ताकत रहती है, उसको फेंक देनेका मतलब है, रसको थूककर गुठली चबाते बैठना । जबसे गांधीजीको इस सचाईका पता चला, वे बराबर यह कोशिश कर रहे हैं कि लोग हाथ-कुटे चावल और चोकरवाला हाथ-पिसा मोटा आटा खायें ।

अब तो गांधीजीकी तंदुरूस्ती काँचके कंगनकी तरह कमजोर पड़ गई है, फिर भी खुराकके मामलोंमें उनकी दिलचस्पी कायम है, और छोटे-मोटे प्रयोग तो आज भी हररोज चलते ही रहते हैं ।

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