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कहाँके हैं?

अगर कोई पूछे 'गांधीजी  कहाँके हैं?'

तो पोरबन्दर सबसे पहले कह उठेगा- 'मेरे यहाँके हैं। यहीं उनका जनम हुआ है।'

सागर के उस पार से फिनिक्स और टाल्स्टाय आश्रम पुकार उठेंगे - 'भाई! उनका सच्चा जनम तो हमारे यहाँ हुआ! क्या इतने ही में भूल गये?'

अहमदाबाद कहेगा 'लेकिन आश्रम तो उन्होंने मेरी साबरमतीके किनारे बसाया था न?'

पूरा अपना हक जताते हुए कहेगा -  'यरवादका जेल तो मेरा है न ? बापूका 'यरवदा मन्दिर', उनका वह 'जेल-महल' क्या इस तरह भूल जानेकी चीज है?

बिहारका किसान क्यों पीछे रहने लगा? वह कहेगा 'आपकी जो मरजी हो, कह ले; मगर गांधीजी हैं तो हमारे! आपको क्या पता कि हमारे नीलके खेतोंमें उन्होंने कितने-कितने चक्कर काटे हैं?

क्या पंजाब चुपचाप इन दावोंको सह सकता है? नहीं, वह अपनी बुलंद आवाजसे पूछेगा 'क्या आप इस हकी़क़तसे इनकार करना चाहते हैं कि गांधीजीको जगानेवाला, होशमें लानेवाला, मेरा जलियाँवाला बाग ही है?'

कलकत्ता कहेगा 'लेकिन भाई, असहयोगका बिगुल तो मेरे आँगनमें बजा था न?'

बम्बई पूछेगी 'पर मेहरबान, सत्याग्रहका आरम्भ करने तो वे मेरे ही घर आये थे न?'

बारडोलीका दावा भी सुनने लायक होगा। वह कहेगी 'नक्कारखानेमें तूतीकी आवाज भला कौन सुनेगा? पर सच तो यह है, कि गांधीजीने लडा़ईके लिए मैदान मेरा ही चुना था।'

इसी तरह दिल्ली भी गांधीजीको अपना समझती है; क्योंकि गांधीजीने अपने उपवासके पवित्र इक्कीस दिन वहीं बिताए थे। बेलगाँवको अपना दावा किसीसे कम नहीं मालूम होता। हिन्दुस्तान के राष्ट्रपति का ताज बेलगाँवकी महासभाने ही गांधीजीको पहनाया था न? और राजकोट, जहाँ उन्होंने अपने प्राणोंकी बाजी लगाई थी, वह भी तो उन्हें अपना ही समझता है।

इन सारी बातोंको सुनकर पहाडो़का राजा हिमालय होठोंमें मुसकराता है। वह कहता है 'कौन इन लोगोंके मुँह लगे? इन बेचारोंको क्या पता कि गांधीजी मन-ही-मन किसके लिए तड़पा करते हैं?

पर धन्य है, उस छोटे-से सेवाग्रामको ! बीच हिन्दुस्तानमें बसे हुए इन नन्हें-से गाँवका कोई नाम तक नहीं जानता था। औरोंकी तरह न वह अपना दावा लेकर आगे बढ़ा, न झगडा़, न फरियाद की। फिर भी बडा़ भगवान है वह, कि गांधीजी आज उसीको अपनाये हुए हैं। इसलिए न साबरमतीका सन्त अब सेवाग्रामका सन्त कहलाता है?

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