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क्रिप्स मिशन

1939 में जब युद्ध आरम्भ हुआ तो गांधीजी की आस्था शान्ति में पूर्णतः दृढ़ हो चुकी थी, लेकिन उनके बहुत से निकट सहयोगी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सामान्य कार्यकर्ता यह स्वीकार करने में असमर्थ थे कि आक्रामक के विरोध में हथियार उठाए बिना भी देश की रक्षा की जा सकती है। लड़ाई के दिनों में दो बार ऐसे अवसर आए जब कांग्रेस और सरकार के बीच युद्ध में सहयोग करने की संभावना सामने आई। एक बार तो 1940 में, जब फ्रांस का पतन हुआ और दूसरी बार 1941 में जब दक्षिण-पूर्व एशिया में अंग्रेज बुरी तरह हार गए। दोनों बार गांधीजी ने संगठित हिंसा में सहयोग देने से अपने को अलग रखा। सरकार और कांग्रेस में कोई समझौता न हो सका। समझौते का गंभीर प्रयत्न केवल एक ही बार 1942 के वसंत में किया गया, जब क्रिप्स मिशन भारत आया। यह प्रयत्न निष्फल रहा।

करीब ढाई वर्ष से गांधीजी के अनुयायी जन-आन्दोलन शुरू करने के लिए उन पर दबाव डाल रहे थे। लेकिन गांधीजी ने उनकी बात न मानी। यह स्पष्ट था कि ब्रिटिश सरकार, पहले चैम्बरलेन और बाद में चर्चिल के नेतृत्व में, भारतीयों को भविष्य में स्वाधीनता का न तो कोई आश्वासन देना चाहती थी और न वास्तविक संकेत के रूप में अभी कोई छोट-मोटे अधिकार ही। गांधीजी ने कांग्रेस दल के उग्रवादियों को संयम में रखने का प्रयत्न किया और उनके असंतोष को 'व्यक्तिगत सत्याग्रह' की ओर मोड़ दिया। यह सविनय अवज्ञा का एक छोटा रूप था जिसमें सिर्फ चुने हुए कुछ लोगों ने भाग लिया।

क्रिप्स-मिशन के असफल होने के बाद, गांधीजी को इस बात की चिन्ता हुई कि दक्षिण-पूर्व एशिया में जापानी सेना के आगे बढ़ने से उत्प़ संकट की स्थिति का, भारत के लोग ढ़ता से सामना करने के बदले, अपने को निराश, आतंकित और निस्सहाय अनुभव कर रहे थे। अगर भारत को मलाया और बर्मा की तरह जापानियों द्वारा पददलित होने से बचाना था तो अविलंब कुछ करना अनिवार्य था। गांधीजी इस नतीजे पर पहुंचे कि अगर भारतीयों को अपने देश की रक्षा में जुट जाने के लिए प्रेरित किया जाना है तो ब्रिटिश सरकार को तुरन्त ही भारत को आजादी देने की घोषणा करनी चाहिए।

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