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नया संविधान

1934-35 में भारतीय राजनैतिक वातावरण में उदासी छाई रही। लेकिन जब 1935 के संविधान के अनुसार प्रान्तीय विधानमण्डलों के चुनाव का समय आया तो राजनैतिक उत्तेजना बहुत बढ़ गई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विचार में नया संविधान अनुपयुक्त और असंतोषजनक था। मानी हुई बात थी कि रियासतों में चुनाव और प्रतिनिधि संस्थाएं न होने से उनके प्रतिनिधि राजाओं द्वारा मनोनीत व्यक्ति होंगे, जबकि राजा स्वयं ही अपने अस्तित्व के लिए ब्रिटिश सरकार की कृपा पर निर्भर थे। अतः संविधान के प्रति भारतीय राष्ट्रवादियों का दृष्टिकोण घबराहट और घोर निराशा से भरा था। संघ की तुलना में प्रान्तों में चुने विधानमण्डलों के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों का कार्यक्षेत्र अधिक व्यापक था, लेकिन प्रान्तों में गवर्नरों को मंत्रियों के निर्णय बदलने अथवा रद्द करने का अधिकार दे दिया गया था।

इन बंधनों और सीमाओं के कारण कांग्रेस में एक बड़ा दल, जिसके नेता जवाहरलाल नेहरू थे, नये संविधान से कोई मतलब नहीं रखना चाहता था। फिर भी कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का निश्चय किया। चुनाव 1937 के आरम्भ में हुए। इनमें कांग्रेस को बड़ी सफलता मिली और उसकी ग्यारह में से छः प्रान्तों में मंत्रिमण्डल बनाने की स्थिति हो गई। कांग्रेस में एक दल अधिकार ग्रहण के पक्ष में था और इसे गांधीजी का नैतिक समर्थन प्राप्त था। महात्मा गांधी का विचार था कि संविधान में सभी त्रुटियों के होते हुए भी, वह ग्रामोत्थान के कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकेगा और कोई कारण नहीं था कि कांग्रेसी मंत्रिमण्डल, अपनेगअपने प्रान्तों में ग्रामोद्योगों को प्रोत्साहन देने, नशाबन्दी लागू करने, किसानों का भार कम करने, खादी के उपयोग को बढ़ावा देने, शिक्षा-प्रसार और अस्पृश्यता निवारण आदि के काम नहीं कर सकेंगे।

कांग्रेस द्वारा पदग्रहण करने का काम वाइसराय लार्ड लिनलिथगो द्वारा जारी किए गए एक वक्तव्य से सरल और संभव हो गया। इससे गवर्नर के अधिकारों अथवा कानूनी स्थिति में तो कोई फर्क नहीं पड़ा, पर इसमें समझौते की भावना थी और इसके फलस्वरूपकांग्रेस ने मंत्रिमण्डल बनाने का निश्चय किया।

एक ऐसे दल के लिए, जो बहुत समय तक सरकार का विरोध करता रहा, अधिकार ग्रहण करना एक नया और संकटपूर्ण अनुभव था। मंत्रिमण्डल बनाने का विरोध करने वाले पार्टी के वामपक्ष ने कांग्रेसजनों में आन्तरिक मतभेदों और अधिकार ग्रहण करने से प्राप्त होने वाली सुविधा के लिए छीनाझपटी की संभावना पर जोर दिया था। मंत्रिपद या नौकरियां प्राप्त करने की इच्छा करने वाले उम्मीदवारों के आवेदनों की गांधीजी के पास जैसे बाढ़ आ गई। उन्होंने इस प्रवृत्ति पर आीचर्य और दुख प्रकट किया क्योंकि उनकी ष्टि में विधानमण्डल अथवा मंत्रिपद देश की सेवा का एक, और वह भी अत्यंत सीमित, माध्यम था। उनके विचार में अधिकतर कांग्रेसजनों को गांवों में सामाजिक और आर्थिक सुधार के रचनात्मक कार्यक्रम को अपनाना चाहिए था। चुनाव-प्रणाली और दलों का निर्माण, अधिकार-ग्रहण और संघर्ष की राजनीति जो प्रजातंत्र के आवश्यक अंग हैं, इनसे गांधीजी को नफरत थी। 'अनुभवी सेवक और सेनापति' होने के नाते, वे अधिकार-ग्रहण से प्राप्त होने वाली सुविधाओं के लिए छीनाझपटी और गुटबंदी में शक्ति के अपव्यय को बुरा समझते थे।

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