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अस्पृश्यता विरोधी आन्दोलन

सितम्बर 1932 में, यरवदा जेल में बन्द महात्मा गांधी ने अस्पृश्य कही जाने वाली जातियों को नये संविधान में पृथक निर्वाचन का अधिकार दिये जाने के विरोध में अनशन कर अपने प्राणों की बाजी लगा दी। अनुदार आलोचकों ने उपवास को एक प्रकार का आत्मपीड़न अथवा धमकी देकर लाभ उठाने की प्रक्रिया बताया। गांधीजी इस बात को जानते थे कि उनके उपवास से लोगों पर नैतिक दबाव पड़ता है। लेकिन इसका प्रयोग वे अपने से असहमत होने वालों पर नहीं करते थे, केवल अपने स्नेहियों और विीवास-भाजनों पर ही करते थे। अपने आलोचकों से उन्होंने कभी यह आशा नहीं की कि उपवास के प्रति उनकी वही प्रतिक्रिया हो जैसी उनके मित्रों और साथियों की होती है। लेकिन उनके आत्म-पीड़न से अगर विरोधियों और आलोचकों को उनकी सच्चाई और ईमानदारी में विश्वास हो जाता, तो वे इसे लड़ाई में आधी से ज्यादा जीत मान लेते। वे लोगों के नैतिक विवेक और भावनाओं, उनकी आत्मा को जगा कर परम्परागत, कठोर सामाजिक अत्याचार के प्रति अपनी असह्य मनोव्यथा की अभिव्यक्ति करना चाहते थे। उपवास से मूल प्रश्न उभर कर प्रकाश में आ जाते हैं। यह तो स्पष्ट ही है कि यह प्रक्रिया तर्क से कुछ दूर ले जाती है, लेकिन सच तो यह है कि इसका उद्देश्य तर्क एवं बुद्धि को उन पूर्वाग्रहों और जड़ता से युक्त करना था, जिनके कारण समाज में अस्पृश्यता को प्रश्रय मिला था और जिससे करोड़ों हिन्दू नित्य ही अपमान, अलगाव और विपत्ति के शिकार बनते थे।

गांधीजी का उपवास 20 सितम्बर को आरम्भ हुआ। उपवास की खबर ने सारे देश को हिला दिया। उस दिन देश भर में लोगों ने उपवास रखा और प्रार्थना की। शान्तिनिकेतन में कवीन्ौ रवीन्ौ नाथ ठाकुर ने काले वस्त्र पहन कर एक विशाल सभा में गांधीजी के उपवास के महत्व पर प्रकाश डाला और लोगों से आग्रह किया कि सदियों से चली आ रही इस बुराई को हटाने के लिए कमर कस कर जुट जाएं। लोगों में मानो उत्साह का ज्वार ही आ गया। मन्दिरों, कुओं और अन्य सार्वजनिक स्थानों में अछूतों को प्रवेश का अधिकार मिला। हिन्दू नेताओं ने अछूतों के प्रतिनिधियों से बातचीत की। ब्रिटिश सरकार के साम्प्रदायिक निर्णय से भि़ एक दूसरी निर्वाचन व्यवस्था पर सहमति हुई। ब्रिटिश सरकार द्वारा इसके स्वीकृत होने पर गांधीजी ने उपवास तोड़ा। लेकिन हिन्दू समाज का जो आन्तरिक शुद्धिकरण हुआ, वह इस नयी चुनाव व्यवस्था से अधिक महत्वपूर्ण था। गांधीजी के लिए उपवास का उद्देश्य ''हिन्दू समाज की आत्मा को जगा कर उसे धार्मिक स्तर पर सही दिशा में कार्यशील बनाना था।'' पृथक निर्वाचन का रद्द किया जाना तो अस्पृश्यता के अन्त होने की प्रक्रिया का आरम्भ मात्र था। अभी गांधीजी जेल में ही थे कि उनकी प्रेरणा से अस्पृश्यता का विरोध करने के लिए 'हरिजन सेवक संघ' की स्थापना हुई और एक नये साप्ताहिक पत्र 'हरिजन' का प्रकाशन शुरू किया गया। गांधीजी ने अछूतों का नया नामकरण 'हरिजन' - हरि के प्यारे जन किया।

जेल से छूटने के बाद गांधीजी ने करीब-करीब पूर्ण रूप से अपने को अस्पृश्यता-निवारण-आन्दोलन में लगा दिया। 7 नवम्बर, 1933 से नौ महीने तक उन्होंने इस काम के लिए पूरे देश का दौरा किया। उन्होंने कुल मिलाकर साढ़े बारह हजार मील की यात्रा की। इससे अछूतों और सवर्ण हिन्दुओं को अलग करने वाली दीवार को तोड़ने के लिए लोगों में बड़ा उत्साह पैदा हुआ। पर साथ ही इससे कट्टर हिन्दू भी लड़ाई पर उतर आये। पूना में 25 जून को जब गांधीजी म्युनिसिपल हाल की ओर जा रहे थे, उनके दल पर एक बम फेंका गया। सात व्यक्ति घायल हुए लेकिन गांधीजी बच गये। बम फेंकने वाले अज्ञात व्यक्ति के लिए ''गहरी करुणा'' व्यक्त करते हुए गांधीजी ने कहाः ''शहीद होने की मेरी जरा भी इच्छा नहीं है, लेकिन अगर मुझे उसे काम को करने में मरना भी पड़े, जिसे मैं उस धर्म की रक्षा के लिए जो मेरा और करोड़ों हिन्दुओं का है, अपना महान कर्तव्य मानता हूं, तो मैं इसे अपना सौभाग्य ही समझूंगा।''

गांधीजी के उपवास से जनता में उत्साह जगा लेकिन उनका ध्यान राजनीति से सामाजिक मामलों की ओर चला गया। मई 1933 में उन्होंने सविनय अवज्ञागआन्दोलन को छः सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया। बाद में उसे फिर चालू तो किया लेकिन अपने तक ही सीमित रखा। एक साल बाद इसे भी खत्म कर दिया। यह इस बात की साक्षी थी कि देश थक गया है और अब संघर्ष जारी रखने की उचित मानसिक स्थिति नहीं है। इन निश्चयों से गांधीजी के बहुत से साथी, जिन्हें राजनैतिक विषयों में धार्मिक और नैतिक ष्टिकोण अपनाना पसन्द नहीं था, विचलित हो गए। उन्हें गांधीजी द्वारा स्वयं पर लगाये गये बंधनों से झुंझलाहट होती थी। गांधीजी कांग्रेस दल में होने वाली इस आलोचना को भांप गए और अक्तूबर 1934 में वे पार्टी से अलग हो गए। अगले तीन वर्ष़ों में उनकी रुचि का विशेष विषय राजनीति न होकर, ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी।

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