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युवा राजनीतिज्ञ

जिस राजनीतिक संघर्ष में गांधीजी कूद पड़े थे, उसके प्रथम अनुभव ने उन्हें उस संकोच और झेंप से मुक्त कर दिया जिससे पहले वह बुरी तरह चिपके थे। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि उनमें एकाएक अहंभाव प्रबल हो उठा। 5 जुलाई 1894 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अग्रगण्य नेता श्री दादाभाई नौरोजी को एक पत्र में उन्होंने लिखा था : "और अन्त में अपने बारे में कुछ शब्द कह कर मैं यह पत्र समाप्त करता हूं। मैं युवक हूं, अनुभवहीन हूं और इसीलिए मुझ से गलतियां भी हो सकती हैं। मेरी योग्यता थोड़ी और उसके अनुपात में उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। लेकिन आप देखेंगे कि अपनी योग्यता के मुकाबले बहुत भारी पड़ने वाले इस काम को हाथ में लेने में मेरा उद्देश्य भारतीयों के हितों को हानि पहुंचाकर अपनी स्वार्थसिद्धि करना नहीं है। असल बात यह है कि यहां इस तरह का काम करने वाला मैं ही अकेला व्यक्ति हूं।" अपने को हीन समझने की भावना भी सापेक्ष होती है। भारतीय समुदाय को नेतृत्व के लिए अपनी ओर आशा से निहारते देख कर गांधीजी अपनी अयोग्यता और हीनभाव को भूल गए। दूसरी जगह जिस काम के वह शायद पास भी न फटकते, उसी को पूरा करने का उत्तरदायित्व उन्होंने अपने ऊपर ले लिया, क्योंकि उस समय इस काम को कर सकने वाले वही अकेले व्यक्ति थे।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक - भारत के वयोवृद्ध एवं प्रतिष्ठित दादाभाई नौरोजी

गांधीजी 1893 में एक वर्ष के लिए दक्षिण अफ्रीका गए थे। तब वह यह सोच भी नहीं सकते थे कि उन्हें करीब दो दशक का समय वहां बिताना पड़ेगा। प्राथमिक नागरिक अधिकारों के लिए भारतीय प्रवासियों का संघर्ष दीर्घ अवधि तक चलने वाला और प्रचण्ड रूप ग्रहण करने वाला था। नेटाल की राजनीति में गांधीजी के हस्तक्षेपका तात्कालिक कारण भारतीयों को मताधिकार से वंचित किया जाना था, लेकिन यह तो जाति-भेद के रोग का एक लक्षण मात्र था जो उस अंधियारे महाद्वीपको सता रहा था।

लार्ड मिलनर ने लिखा था कि, "प्रवासी एशियाई दक्षिण अफ्रीका में ऐसे अजनबी हैं जो यूरोपीय समुदाय की मर्जी के खिलाफ अपने को उस पर थोप रहे हैं।" लेकिन सच कुछ और ही था। 1860 और उसके बाद के वर्ष़ों में भारतीय प्रवासियों ने वहां के गोरे उपनिवेशियों के आग्रह और निमंत्रण पर ही दक्षिण अफ्रीका में जाना शुरू किया था। इन गोरे अधिवासियों के पास चाय, कॉफी और ग़s के बागानों के लिए बड़े-बड़े भूखण्ड थे, जिन पर तब तक खेती नहीं हुई थी। इन पर काम करने के लिये मजदूरों की भारी कमी थी। दास-प्रथा का अन्त हो जाने से नीग्रो लोगों को काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता था। बागान के गोरे मालिकों के भारतीय एजेण्टों ने भारत के कुछ सब से गरीब और घनी आबादी वाले जिलों का दौरा किया और वहां के दुखी लोगों को सब्ज बाग दिखाये कि उन्हें नेटाल में जाकर अच्छा काम मिलेगा। मार्गगव्यय, खाना और मकान मुफ्त। पहले साल दस शिलिंग माहवार वेतन और हर साल एक शिलिंग की वृद्धि, पांच साल काम करने का 'एग्रीमेण्ट' या इकरारनामा, (जिसे 'गिरमिट-प्रथा' कहते हैं और जिसके अन्तर्गत मजदूर 'गिरमिटिया' कहलाता है) और इकरार पूरा होने पर मुफ्त भारत लौट आने का अधिकार (या अगर चाहें तो वहप बस जाने का विकल्प)। हजारों गरीब और अनपढ़ भारतीय दूर देश नेटाल की ओर चल पड़े।

यूरोपीय बागान-मालिक और सौदागर इस बात को बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे कि भारतीय मजदूर इकरारनामे के पांच साल खत्म होने के बाद, स्वतंत्र नागरिक होकर वहप बस जाएं। यद्यपि नेटाल में बसने के अधिकार का उपयोग इकरारनामे की शर्त़ों के अनुकूल ही था, फिर भी इस अधिकार का उपयोग करने वाले मजदूर के परिवार के प्रत्येक सदस्य पर तीन पौण्ड का कर लगा दिया गया। उन गरीब अभागे लोगों को, जिनका वेतन महीने में केवल दस से बारह शिलिंग के बीच था, इस कर ने मानो अपंग कर दिया था।

मजदूरों के बाद जो भारतीय व्यापारी नेटाल पहुंचे, उनकी अपनी कठिनाइयां थप। बिना लाइसेंस के कोई व्यापार कर ही नहीं सकता था। यूरोपीयों को तो लाइसेंस बड़ी आसानी से, मांगते ही मिल जाते थे; लेकिन भारतीयों को या तो मिलते ही न थे या बहुत कोशिश और खर्च के बाद। हर प्रवासी के लिए किसी एक यूरोपीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि अपनी इच्छा से आने वालों के लिए दक्षिण अफ्रीका के दरवाजे बन्द हो गये। लेकिन इकरारनामे के अन्तर्गत लाये जाने वाले अर्द्ध-गुलाम गिरमिटियों के लिए ऐसी कोई शर्त और रोक नहीं थी, फलतः उनका लाया जाना जारी रहा।

भारतीयों की कानूनी स्थिति तो बुरी थी ही लेकिन उन्हें रोज-रोज गोरों के हाथों जो अपमान सहने पड़ते थे, वे और भी कष्टदायी थे। भारतीयों का उल्लेख आम तौर पर "गन्दगी और दुष्टता से भरपूर, भात और गंदे कीड़ेगमकोड़े खानेवाले, गालीगगलौज के पात्र एशियाई" के रूप में किया जाता था। उन्हें राजमार्ग़ों पर चलने की मनाही थी। पहले और दूसरे दर्जे के यात्रा टिकट उन्हें नहीं दिये जाते थे। गोरे यात्री के आपत्ति करने पर उन्हें बिना कहेगसुने रेलगाड़ी के डिब्बे से बाहर धकेल दिया जाता था। कभी-कभी तो उन्हें रेलगाड़ी के फुटबोर्ड पर खड़े होकर सफर करना पड़ता था। यूरोपीय होटलों में वे प्रवेश नहीं कर सकते थे।

गांधीजी ने अनुभव किया कि सबसे पहली आवश्यकता तो इस बात की है कि दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों के हितों की रक्षा करने वाला एक स्थायी संगठन तुरन्त बनाया जाना चाहिए। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1893 के अधिवेशन के अध्यक्ष दादा भाई नौरोजी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उन्होंने अपने नये संगठन का नाम नेटाल इंडियन कांग्रेस रखा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संविधान, कर्तव्य और कार्य प्रणाली की गांधीजी को कोई जानकारी नहीं थी। यह उनके लिए अच्छा ही हुआ। वह नेटाल इंडियन कांग्रेस को अपनी प्रतिभा से वहां के भारतीयों की आवश्यकताओं के अनुरूप एक जीवंत संगठन बना सके, जो पूरे साल कार्यशील रहता और जिसका उद्देश्य केवल राजनीतिक चौकसी न होकर सदस्यों का सामाजिक और नैतिक उत्थान भी थाङ। जिनके हितों के लिए यह संगठन बना था, उनका राजनैतिक अनुभव और ज्ञान नहीं के बराबर था; फिर भी उस संस्था पर किसी व्यक्तिगविशेष की इजारेदारी नहीं थी। उसके अथक परिश्रमी सचिव गांधी हर कदम पर सभी का सक्रिय सहयोग प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहे। इससे काम में सार्वजनिक उत्साह और रुचि बराबर बनी रही। सदस्य बनाने और चंदा जमा करने जैसे साधारण कार्य को भी उन्होंने महत्व दे रखा था। आधे मन से सहयोग देने वालों के साथ वह नैतिक दबाव का विनम्र, परन्तु साथ ही ढ़ ढंग अपनाते थे। एक बार एक छोटे कस्बे के भारतीय व्यापारी के घर पर वह सारी रात भूखे बैठे रहे, क्योंकि व्यापारी नेटाल कांग्रेस का अपना चन्दा नहीं बढ़ा रहा था। आखिर सबेरा होते-होते उन्होंने उसे अपना चन्दा तीन से बढ़ा कर छः पौण्ड कर देने को राजी कर ही लिया।


नताल भारतीय कांग्रेस की स्थापना

राजनैतिक प्रशिक्षण के इन शुरू के सालों में गांधीजी ने एक स्वतंत्र राजनीतिक आचार-संहिता बना ली। वह इस प्रचलित धारणा का विरोध करते थे कि राजनीति में अपने दल के लिए संघर्ष करना ही चाहिए, चाहे उसका पक्ष सही हो या गलत। किसी बात को बढ़ा-चढ़ा कर कहना उनके स्वभाव में था ही नहीं। अपने सहयोगियों को भी वह ऐसा करने से रोकते थे। नेटाल इंडियन कांग्रेस भारतीय अल्पसंख्यकों के राजनैतिक और आर्थिक अधिकारों की सुरक्षा का माध्यम ही नहीं, उनमें सुधार और एकता लाने का साधन भी थी। गलतियों और कमजोरियों के लिए वह अपने देशवासियों को भी माफ नहीं करते थे और उनकी कड़ी आलोचना करते थे। नेटाल के प्रवासी भारतीयों के वह न केवल प्रबलतम समर्थक थे, वरन उग्रतम आलोचक भी थे।

गांधीजी के नेतृत्व में नेटाल के भारतीयों ने रंगभेदमूलक कानूनों तथा कष्टप्रद नियमों को रद्द कराने और भावी अत्याचार को रोकने की कोशिश की। गांधीजी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की लंदन स्थित ब्रिटिश समिति के सदस्यों से, जिनमें नौरोजी भी थे, सम्पर्क बनाए रखा। दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों के मामले को भारत मंत्री और उपनिवेश मंत्री के सामने पेश करने के विषय में, वह उनकी सलाह और समर्थन प्राप्त करते रहे। दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों की शिकायतों को लेकर उन्होंने एक अथक पत्राचारकर्ता के रूप में तीन महाद्वीपों में मित्रों, विरोधियों, समाचारपत्रों और अधिकारियों के नाम पत्र, तार और विवरण पत्रों की बौछार कर दी। गांधीजी के प्रचार कार्य के ही परिणाम स्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दिसम्बर 1894 के अपने वार्षिक अधिवेशन में मताधिकार विधेयक के विरोध में प्रस्ताव पास किया और लंदन के 'टाइम्स' समाचारपत्र ने इस समस्या पर कई विशेष लेख छापे। जिस आंदोलन का गांधीजी नेतृत्व कर रहे थे, उसके लिए भारतीय जनता का समर्थन प्राप्त करने हेतु वह 1896 में कुछ दिनों के लिए भारत आए। 10 जनवरी 1897 को वापस नेटाल पहुंचने पर यूरोपीयों की एक अत्यन्त उत्तेजित और क्रुद्ध भीड़ ने डरबन की सड़क पर बिना किसी अपराध के गांधीजी को अधमरा कर डाला। उनकी नाराजगी का कारण अखबार में छपी वे खबरें थप, जिनमें यह बताया गया था कि गांधीजी ने अपने देश में नेटाल के भारतीयों के मामले को किस तरह पेश किया था।

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बोअर-युद्ध में भारतीय ऐम्बुलेंस टुकड़ी के साथ गांधीजी

1899 में बोअर-युद्ध छिड़ जाने पर गांधीजी ने ग्यारह सौ भारतीयों की ऐम्बुलेंस टुकड़ी संगठित की। 'प्रिटोरिया न्यूज' के सम्पादक विअर स्टेण्ड ने रणक्षेत्र में सेवा-कार्य में लगे गांधीजी का यह स्फूर्तिदायक शब्दचित्र अपने अखबार में छापा थाः "सारी रात की कड़ी मेहनत के बाद, जिसने तगड़े जवानों को भी ढीला कर दिया था, बड़े सवेरे मेरी भेंट श्री गांधी से हुई। वह सड़क के किनारे बैठे हुए फौजी राशन में दिए गए बिस्कुट का कलेवा कर रहे थे। उस दिन जनरल बुलर की फौज का हर आदमी थका-मांदा, सुस्त और उदास था और सारी दुनिया को कोस रहा था। अकेले गांधीजी ही प्रस़, अविचलित और संतुलित थे। उनकी वाणी में आत्मविश्वास की झलक और नेत्रों में करुणा की ज्योति थी ।"

यह स्वीकार करना पड़ेगा कि अहिंसा पर गांधीजी के विचार अभी परिपक्व नहीं हुए थे। अभी तो उनकी दलील यह भी थी कि अंग्रेजी उपनिवेशों में बसने वाले भारतीयों को नागरिकता के सभी अधिकारों और सुविधाओं की मांग करने के साथ-साथ, नागरिक के नाते अपने सभी कर्तव्यों को स्वीकार करना चाहिए और इन कर्तव्यों में, अपनाये गये नये देश की रक्षा भी शामिल थी। गांधीजी द्वारा उन अल्पसंख्यकों की एम्बुलेंस टुकड़ी का संगठन, जो नागरिकता के मूल अधिकारों से भी वंचित किये गये थे, बड़ा ही प्रशंसनीय था लेकिन इसका कुछ भी सुपरिणाम न हुआ। बोअरगयुद्ध का अन्त होने पर भी भारतीयों की दशा में कोई सुधार न हुआ। उनकी शिकायतें ज्यों की त्यों बनी रहप। इसके विपरीत,भूतपूर्व बोअर-उपनिवेशों में उनके लिए नई जंजीरें गढ़ी गइ।


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