| | |

3. आकाश

आकाशका ज्ञानपूर्वक उपयोग हम कमसे कम करते हैं । उसका ज्ञान भी हमें कमसे कम होता है । आकाशको अवकाश काह जा सकता है । दिनमें अगर बादल न हों, तो ऊपरकी ओर देखने पर एक अत्यन्त स्वच्छ, सुंदर, आसमानी रंगका शामियाना नजर आता है । उस शामियानेको हम आकाश कहते हैं । इसका दूसरा नाम आसमान है न? इस शामियानेका कोई ओर-छोर देखनेमें नहीं आता । वह जितना हमसे दूर है, उतना ही हमारे ऩजदीक भी है । हमारे चारों ओर आकाश न हो, तो हमारा खातमा ही हो जाय । जहां कुछ भी नहीं है वहां आकाश है । इसलिए यह नहीं समझना चाहये कि दूरदूर जो आसमानी रंग देखनेमें आता है, स़िर्फ वही आकाश है । आकाश तोहमारे पाससे ही शुरू हो जाता है । इतना ही नहीं, वह हमारे भीतर भी है । खालीपन अथवा शून्य (vacuum)को हम आकाश कह सकते हैं । मगर सच है कि हम हवाको देख नहीं सकते । मगर हवाके रहनेका ठिकाना कहां है? हवा आकाशमें ही विहार करती है न? इसलिए आकाशसे हम अलग हो ही नहीं सकते । हवाको तो बहुत हद तक पम्प द्वारा खींचा भी जा सकता है, मगर आकाशको कौन खींच सकता है? यह सही है कि हम आकाशको भर देते हैं । मगर क्योंकि आकाश अनन्त है, इसलिए कितने भी शरीर क्यों न हों, सब उसमें समा जाते है ।

इस आकाशकी मदद हमें आरोग्यकी रक्षाके लिए और उसे खो चुके हों तो फिरसे प्राप्त करनेके लिए लेनी हैख्ख् जीवनके लिए हवाकी सबसे अधिक आवश्यकता है, इसलिए वह सर्व-व्यापक है । मगर हवा दूसरी चीजोंके ग़ुकाबलेमें व्यापक तो है, पर अनन्त नहीं है । भौतिकशास्त्र हमें सिखाता है पृथ्वीसे अमुक मील ऊपर चले जायें, तो वहां हवा नहीं मिलती । ऐसा कहा जाता है कि इस पृथ्वीके प्राणियों जैसे प्राणी हवाके आवरणसे बाहर रह ही नहीं सकते । यह बात सच हो या न हो, हमें इतना ही समझना है कि आकाश जैसे यहां है, वैसे ही वह हवाके आवरणसे बाहर भी है । इसलिए सर्व-व्यापक तो आकाश ही है, फिर भले वैज्ञानिक लोग सिध्द किया करें कि उस आवरणके ऊपर ईश्वर'नामका पदार्थ या कुछ और है । वह पदार्थ भी जिसके भीतर रहता है वह आकाश ही है । दूसरे शब्दोंमें यह कहा जा सकता है कि अगर हम ईश्वरका भेद ज़ान सकें,तो आकाशका भेद भी जान सकेंगे ।

ऐसे महान तत्त्वका अभ्यास और उपयोग जितना हम करेंगे, उतना ही अधिक आरोग्यका उपभोग कर सकेंगे ।

पहला पाठ तो यह है कि इस सुदूर और अदूर तत्त्वके और हमारे बीचमें कोई आवरण नहीं आने देना चाहिये । अर्थात् यदि घरबारके बिना, अथवा कपडोंके बिना हम इस अनन्तके साथ सम्बध जोड़ सकें तो हमारा शरीर, बुध्दि और आत्मा पूरी तरह आरोग्यका अनुभव कर सकेंगे । इस आदर्श तक हम भले ही न पहुंच सकें, या करोड़ोमें एक ही पहुंच सके, तो भी इस आदर्शको जानना, इसे समझना और इसके प्रति आदर-भाव रखना आवश्यक है । और यदि यह हमारा आदर्श हो, तो जिस हद तक हम इसे प्राप्त कर सकेंगे, उसी हद तक हम सुख, शान्ति और सन्तोषका अनुभव कर सकेंगे । इस आदर्शको मैं आखिरी हद तक पेश कर सकूं, तो मुझे यह कहना पडेगा कि हमें शरीरका अन्तराय भी नहीं चाहिये, अर्थात् शरीर रहे या जाये, इस बारेमें हमें तटस्थ रहना चाहिये । मनको हम इस तरहका शिक्षण दे सकें, तो शरीरको विषय-भोगका साधन तो कभी नहीं बनायेंगे । तब अपनी शक्ति और अपने ज्ञानके अनुसार हम अपने शरीरका सदुपयोग सेवाके लिए, ईश्वरको पहचाननेके लिए, उसके जगतको जाननेके लिए और उसके साथ ऐक्य साधनेके लिए करेंगे ।

इस विचारसरणी के अनुसार घरबार, वस्त्रदिके उपयोंगमें हम काफी अवकाश रख सकते हैं । कई घरोमें इतना साज-समान देखनेमें आता है कि मेरे जैसे गरीब आदमीका तो उसमें दम ही घुटने लगता है । उन सब च़ीजोंका जीवनमें क्या उपयोग है, वहां तो मैं खो ही जाता हूं । यहांकी कुर्सियां, मेजें, अलमारियां और शीशे मुझे खानेको दौड़ते हैं । यहांके क़ीमती कालीन केवल धूल इकट्ठी करते हैं और सूक्ष्म जन्तुओंका घर बने हुए हैं । एक बार एक कालीनको झाड़नेके लिए निकाला गया था । वह एक आदमीका काम नहीं था । छह-सात आदमी उसमें लगे । कमसे कम दस रतल धूल तो उसमें से निकली ही होगी । जब उसे वापस उसकी जगह रखा गया, तो उसका स्पर्श नया ही मालूम हुआ । ऐसे कालीन ऱोज थ़ेडे ही निकाले जा सकते हैं? अगर निकाले जायं तो उनकी उमर कम हो जायगी और मेहनत बढ़ेगी । यह तो मैं अपना त़ाजा अनुभव लिख गया । मगर आकाशके साथ मेल साधनेके खातिर मैंने अपने जीवनमें अनेक झंझटें कम कर डाली हैं । घरकी सादगी, वस्त्रकी सादगी ओर रहन-सहनकी सादगीको बढाकर,एक शब्दमें कहूँ, और हमारे विषयसे सम्बन्ध रखनेवाली भाषामें कहूँ, तो मैंने अपने जीवनमें उत्तरात्तर खालीपनको बढ़ाकर आकाशके साथ सीधा सम्बन्ध बढ़ाया है । यह भी कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे यह सम्बन्ध बढ़ता गया, वैसे-वैसे मेरा आरोग्य भी बढ़ता गया, मेरी शान्ति बढती गई,सन्तोष बढता गया और धनेच्छा बिलकुल मन्द पड़ती गई । जिसने आकाशके साथ सम्बन्ध जोड़ा है, उसके पास कुछ नहीं है, और सब-कुछ है । अन्तमें तो मनुष्य उतनेका ही मालिक है न, जितनेका वह प्रतिदिन उपयोगसे वह आगे बढ़ता है । सब कोई ऐसा करें तो इस आकाश-व्यापी जगतमें सबके लिए स्थान रहे और किसीको तंगीका अनुभव ही न हो ।

इसलिए मनुष्यके सोनेका स्थान आकाशके नीचे होना चाहिये । ओस और सर्दीसे बचनेके लिए हम काफी ओढ़नेको रख सकते हैं । वर्षा ऋतुमें एक छातेकी सी छत भले ही रहे, मगर बाकी हर समय उसकी छत अगणित तारागणोंसे जड़ा हुआ आकाश ही होगा । जब आंख खुलेगी, वह प्रतिक्षण नया-नया दुश्य देखेगा । इस दृश्यसे वह कभी भी ऊबेगा नहीं ।


(18-12-42)

इससे उसकी आंखे चौंधियाएंगी नहीं बल्कि वे शीतलताका अनुभव करेगी । तारागणोंका यह भव्य संघ उसे घूमता ही दिखाई देगा । तो मनुष्य उनके साथ सम्पर्क साधकर सोयेगा, उन्हें अपने हृदयका साक्षी बनायेगा, वह अपवित्र विचारोंको कभी अपने हृदयमें स्थान नहीं देगा और शान्त निद्राका उपभोग करेगा ।

परंतु जिस तरह हमारे आसपास आकाश है, उसी तरह हमारे भीतर भी वह है । चमड़ीके एक-एक छिद्रमें और दो छिदोंके बीचकी जगहमें भी आकाश है । इस आकाशको - अवकाशको - भरनेका हम जरा भी प्रयत्न न करें । इसलिए आहार जितना आवश्यक हो उतना ही यदि हम लें तो शरीरको अवकाश रहेगा । हमें इस बातका हमेशा भान नहीं रहता कि हम कब अधिक या अयोग्य आहार कर लेते हैं । इसलिए अगर हम हप्तेंमें एक दिन या पखवारेमें एक दिन या सुविधासे उपवास करें, तो शरीरका सन्तुलन क़ायम रख सकते हैं । जो पूरे दिनका उपवास न कर सकें, वे एक या एकसे अधिक वक्ताका खाना छोडनेसे भी लाभ उठायेंगे ।