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8. अफीम

जो टीका शराबखोरीके विषयमें की गई है, वही अ़फीम पर भी लागू होती है । दोनों व्यसनोंमें भेद ज़रूर है ।

शराबका नशा जब तक रहता है मनुष्यको वह पागल बनाये रखता है । अ़फीम मनुष्यको जड़ बना देती है । अ़फीम आलसी हो जाता है, तन्द्रावश रहता है और किसी कामका नहीं रहता ।

शराबखोरीके बुरे परिणाम हम ऱोज अपनी आंखोसे देख सकते हैं । अ़फीमका बुरा असर इस तरह प्रत्यक्ष नहीं दीखता । अ़फीमका जहरीला असर प्रत्यक्ष देखना हो  तो उडीसा और आसाममें जाकर हम देख सकते हैं । बहां हजारों लोग इस दुर्व्यसनमें फंसे हुए दिखाई देते हैं । जो लोग इस व्यसनके शिकार बने हुए हैं, वे ऐसे लगते हैं मानों कब्रमें पैर लटकाकर बैठे हों ।

मगर अ़फीमका सबसे खराब असर तो चीनमें हुआ कहा जाता है । चीनियोंका शरीर हिन्दुस्तानियोंसे ज़्यादा  म़जबूत होता है । परन्तु जो अ़फीमके फंदेमें फंस चुके हैं, वे मुर्दे-से दिखाई देते हैं । जिसको अ़फीमकी लत लगी होती है, वह दीन बन जाता है और अ़फीम हासिल करनेके लिए कोई भी पाप करनेको तैयार हो जाता है ।

चीनियों और अंगेजोंके बीच एक लड़ाई हुई थी, जो अ़फीमकी लड़ाईके नामसे इतिहासमें प्रसिध्द है । चीन हिन्दुस्तानकी अ़फीम लेना नहीं चाहता था, जब कि अंगेज जबरदस्ती चीनके साथ उस अ़फीमका व्यापार करना चाहते थे । इस लड़ाईमें हिन्दुस्तानका भी दोष था । हिन्दुस्तानमें बहुतसे अ़फीम ठेकेदार थे । इससे उन्हें अच्छी कमाई भी होती थी । हिन्दुस्तानको  महसूलमें चीनसे करोड़ों रुपये मिलते थे । यह व्यापार प्रत्यक्ष रुपमें अनीतिमय था तो भी चला । अन्तमें इंग्लेंडमें भारी आन्दोलन हुआ हौर अ़फीमका यह व्यापार बन्द हुआ । जो च़ीज इस तरह प्रजाका नाश करनेवाली है, उसका व्यसन क्षणभरके लिए भी सहन करने योग्य नहीं है ।

इतना कहनेके बाद भी यह स्वीकार करना चाहिये कि वैद्यक या चिकित्सा-शास्त्रमें अफीमका बहुत स्थान है । वह ऐसी दवा है जिसके बिना चल ही नहीं सकता । इसलिए अ़फीमका व्यसन मनुष्य स्वेच्छासे छ़ेड दे तभी उसका उध्दार हो सकेगा ।


(11-10-42)

चिकित्सा-शास्त्रमें उसका स्थान भले ही रहे । परन्तु जो च़ीज हम दवाके तौर पर ले सकते हैं वह व्यसनके तौर पर थोड़े ही ले सकते हैं? अगर लें तो वह ज़हरका काम करेगी । अ़फीम तो प्रत्यक्ष ज़हर ही है । इसलिए व्यसनके रुपमें वह सर्वथा त्याज्य है ।

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