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6. चाय, काफी और कोको

इन तीनोंमें से एककी भी शरीरको आवश्यकता नहीं है । चायका प्रचार चीनसे हुआ कहा जाता है । चीनमें उसका खास उपयोग है । वहाँ पानी अकसर शुध्द नहीं होता । पानीको उबाल कर पिया जाय तो पानीका विकार दूर किया जा सकता है । किसी चतुर चीनीने चाय नामकी एक घास ढूंढ निकाली । वह घास बहुत थोडी मात्रामें भी उबलते पानीमें ड़ाली जाय, तो पानीका रंग सुनहरा हो जाता है । अगर इस तरह पानी सुनहरा रंग पकड़ ले, तो यह इस बातकी पक्की निशानी है कि पानी उबल चुका है । सुना है कि चीनमे लोग इसी तरह पानीकी परीक्षा करते हैं  और वही पानी पीते हैं । चायकी दूसरी विशेषता यह है कि उसमें एक तरहकी खुशबू रहती है । ऊपर लिखे तरीकेसी बनी हुई चायको निर्दोष मान सकते हैं ऐसी चाय बनानेका यह तऱीका है ः एक चम्मच चाय छलनीमें डाली जाय । छलनीको चायके बर्तन पर रखा जाय छलनी पर घीरे-धीरे उबला हुआ पानी डाला जाय । नीचे जो पानी आये असका रंग सुनहरा हो, तो समझ लें कि पानी ठीक उबल चुका है ।

झैसी चाय सामान्यत पी जाती है, उसका कोई गुण तो जाननेमें नहीं आया । मगर उसमें एक भारी दोष होता है । अर्थात् उसमें टेनीन होता है । टेनीनी ऐसी च़ाज है, जो चमड़ेको पकानेके काममें आती है । यही काम टेनीनवाली चाय आमाशय (Stomach) में जाकर करती है ।


(10-9-42)

अमाशयके भीतर टेनीनकी तह चढनेसे उसकी पाचन-शक्ति कम होती है । इससे अपच होता है । कहाजाता है कि इंग्लैण्डमें तो असंख्य औरतें केवल कड़क चायकी आदतके कारण अनेक रोगोंकी शिकार बनती हैं । जिन्हें चायकी आदत हैं, उन्हें समय पर चाय न मिले, तो वे व्याकुल हो जाते हैं । चायका पानी गरम होता है । उसमें थोडी चीनी और थोडासा दूध डाला जाता है । यह चायका गुण जरूर माना जा सकता है । मगर दूधमें पानी डालकर उसे गरम किया जाये और उसमें चीनी या गुड़ डाला जाय, तो उससे वही काम अच्छी तरह निकलता है । उबलते पानीमें एक चम्मच शहद और आधा चम्मच नीबूका रस डाला जाय, तो सुन्दर पेय बन जाता है ।

जो चायके विषयमें कहा गया है, वह कॉफीको भी थोडे-बहुत प्रमाणमें लागू होता है । कॉफीके बाबरेमें एक कहावत हैः

कफकाटन वायुहरण, धातुहीन बलक्षीण;

लोहूका पानी करे, दो गुण अवगुण तीन ।

जो राय मैंने चाय और कॉफीके बारेमें दी है, उसे चाय, कॉफी और कोकोकी मददकी आवश्यकता नहीं रहती ।


(7-1042)

अपने लंबे अनुभव पर से मैं यह कह सकता हूँ कि तन्दुरुस्त मनुष्य को सामान्य खुराकसे पूरा संतोष मिल जाता है । मैंने उपर्युक्त तीनों च़ीजोंको खूब सेवन किया है । जब मैं ये च़ीजें लेता था, तब शरीरमें कुछ न कुछ बिगाड़ रहा ही करता था । इन चीजोंके त्यागसे मैंने कुछ भी खोया नहीं है, उलटा बहुत पाया है । जो स्वाद मुजे चाय इत्यादिमें मिलता था, उससे काही अधिक स्वाद अब मैं उबली हुई सामान्य भाजियोंके रसमें पाता हूं ।

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