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5. मसाले

ख़ुराकका विवेचन करते समय मैंने मसालोंके बारेमें कुछ नहीं कहा । नमकको हम मसालोंका राजा कह सकते हैं, क्योंकि नमकके बिना सामान्य मनुष्य कुछ खा ही नहीं सकता । इसलिए नमकको सबरस' भी कहा गया है । शरीरको कई क्षारोंकी आवश्यकता रहती है । उनमें से नमक भी एक है । ये सब क्षार खुराकमें होते ही हैं । मगर उसे अशास्त्राrय तरीके से पकानेके कारण कुछ क्षारोंकी मात्रा कम हो जाती है, इसलिए वे ऊपरसे लेने पड़ते हैं । ऐसा ही एक अत्यन्त आवश्यक क्षार नमक है । इसलिए उसे थोड़े प्रमाणमें  अलगसे खानेको मैंने पिछले प्रकारणमें कहा है ।

मगर कई ऐसे मसाले, जिनकी शरीरको सामान्यत कोई आवश्यकता नहीं होती, केवल स्वादके खातिर या पाचन-शक्ति बढ़ानेके खातिर लिये जाते हैं,जैसे कि हरी या सूखी लाल मिर्च, काली मिर्च, हल्दी, धनिया, जीरा, राई, मेथी, हींग इत्यादि । इनके विषयमें पचास वर्षके निजी अनुभवसे मेरी यह राय बनी है कि शरारको पूरी तरह निरोग रखनेके लिए इनमें से एककी भी आवश्यकता नहीं है । जिसकी पाचन-शक्ति बिलकूल कम़जोर हो गई है, उसे केवल औषधिके रूपमें, अमुक समयके लिए, निश्चित मात्रामें मसाले लेने पड़े तो वह भले ले । मगर स्वादके खातिर तो ऐसी च़ीजका आग्रहपूर्वक निषेध ही मानना चाहिये । हर प्रकारका मसाला, यहां तक कि नमक भी, अनाज और शाकके स्वाभाविक रसका नाश करता है । जिस आदमीकी जीभ बिगड़ नहीं गई है, उसे स्वाभाविक रसमे जो स्वाद आता है, वह मसाला या नमक डालेके बाद नहीं आता । इसीलिए मैंने सूचना की है कि नमक लेना हो तो ऊपरसे लिया जाय । मिर्च तो पेठ और मुंहको जलाती है । जिसे मिर्च खानेकी आदत नहीं होती, वह शुरूमें तो उसे खा ही नहीं सकता । मैंने देखा है कि मिर्च खानेसे कई लोगोंका मुंह आ जाता है-उसमें था, अपनी भरजवानीमें इसी कारण मृत्युका शिकार भी बना था ।

दक्षिण अफ्रीकाके हबशी तो मिर्चका छू भी नहीं सकते । स़ुराकमें हल्दीका रंग वे बरदास्त ही नहीं कर सकते । अंग्रेज भी हमारे मसाले नहीं खाते हिन्दुस्तानमें आनेके बाद उन्हें आदत पड़ जाय तो बात अलग है ।

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