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कुबेरनाथ राय की गाँधी-विषयक दृष्टि

डॉ. नीरा नाहटा

कुबेरनाथ राय कवि-हृदय से सज्जित ऐसे निबंधकार हैं, जो अपनी मिट्टी से रस ग्रहण करके निरन्तर ऊर्ध्वगति की ओर बढ़ते रहे हैं। उनके लिए लेखन एक साहित्यिक और राष्ट्रीय दायित्व है। इस दायित्व का निर्वाह करते हुए उन्होंने ललित निबंध लिखे, जिसे उन्होंने 'आर्तनाद' कहा। हिंदुस्तान का आर्तनाद।

अश्रुपात कर रहा है मनुष्य जाति का सूर्य

विपन्न है मनुष्य जाति का सूर्य।

अपने समय की कटु सच्चाइयों और तरह-तरह के अवरोधों से गहराते अँधेरे में सर्वाधिक चिंतित करनेवाला तत्त्व है - मनुष्य की आंतरिक विपन्नता। उन मूल्यों से दूर होते जाने की स्थिति, जिनकी वजह से मनुष्य मनुष्य है।

एक लेखक की हैसियत से इस अवस्था को बदलने तथा आस्था की नींव मज़बूत करने के लिए, संस्कृति के विशाल प्रांगण में साहित्य-जगत्, इतिहास-बोध और लोक-जीवन की गहराई में अवगाहन करते हुए उन दीर्घजीवी मूल्यवान तत्त्वों और शाश्वत सच्चाइयों को उन्होंने सम्मुख रखा, जो हमारी जीवंतता और गौरव-बोध के परिचायक हैं। श्री राय का मानना है कि पाठक की मानसिक ऋद्धि और क्षितिज का विस्तार करना लेखक का कर्तव्य है। कुबेरनाथ राय ने अपनी पीढ़ी को अपने दायरे से परिचित करवाने, उसमें जीवन-दृष्टि का सही बोध जगाने का कार्य अपने निबंधों द्वारा किया है। आज की परिस्थितियों में उन प्राचीन मूल्यों को प्रासंगिक मानकर उन्होंने पुनर्व्याख्यायित किया और उसकी उपादेयता सिद्ध की। इस प्रकार विकास के लिए परम्परा की ज़मीन पर खड़े होने का उन्होंने समुचित साधन प्रस्तुत किया है।

इस प्रक्रिया में उनकी दृष्टि भारतीय मनीषा की वैचारिक उच्चता और उज्ज्वल कर्तृत्व के उन महान् तपी आत्माओं पर पड़ती है, जिन्हेंने भारत की अस्मिता को मिटने से बचाया और विश्व के सामने इसकी साख बनायी। विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ और आनंद कुमार स्वामी ने क्रमश: भारत की दार्शनिक, साहित्यिक और कलात्मक गरिमा को प्रतिष्ठित किया। परन्तु महात्मा गाँधी ने अपने व्यापक और सहज जीवन द्वारा भारत की आत्मा को विश्व के समक्ष उद्घाटित किया।

कुबेरनाथ राय गाँधीजी को युग का सर्वश्रेष्ठ मनुष्य मानते हैं। आज जब हम अपनी आत्मा से ही बेख़बर होते जा रहे हैं, घोर हताशा के इन क्षणों में उन्हें गाँधी-चिंतन के अतिरिक्त और कोई राह नहीं सूझती।

गाँधीजी को समझने के लिए राय के अनुसार कुंजी के रूप में तीन शब्द हैं - सत्य, अहिंसा और अभय। उनकी प्रत्येक विचारधारा में तीनों मौजूद हैं, परन्तु विषयानुसार ज़ोर कभी एक पर है तो कभी दूसरे पर। उनकी रस-दृष्टि या साहित्य-दर्शन, शिल्प-दृष्टि को समझने के लिए 'सत्य' पर विशेष बल देना होगा।

आज चारों ओर कृत्रिमता, जटिलता और बनावटीपन के चेहरे इस तरह हर क्षेत्र में उभरे हुए हैं कि इस जड़ता और यांत्रिकता से अलग कुछ दिखायी नहीं देता। परन्तु गाँधीजी बहुत बड़े आशावादी हैं। उनका मनुष्य की अन्तर्निहित अच्छाइयों में दृढ़ विश्वास है। 'आज की यंत्रणा का मूल कारण 'बुराई' उतना नहीं है, जितना अच्छाई का अक्षम और अपर्याप्त हो जाना।' कैथोलिक चर्च के पोप पायस की इस चिंता के लिए गाँधीजी का उत्तर है 'लोकशक्ति' को जगाना। लोकशक्ति की कल्पना जनशक्ति से अलग है। 'लोक' का एक व्यक्तित्व होता है और व्यक्तित्व वाला सदैव हृदय या अन्त:करण वाला ही होता है। अत: अच्छाई को लोकशक्ति में जगाकर व्यक्ति-व्यक्ति के माध्यम से सर्वोदय के उद्दिष्ट तक पहुँचना है। गाँधीजी का अटूट विश्वास है कि राज्य-व्यवस्था या अर्थ-व्यवस्था बदलने से कुछ नहीं होता, जब तक कि हमारी चिंतन-शैली न बदले। औसत आदमी की बात आज तथाकथित वैज्ञानिक सोच का गणित है, जो प्रगति का मापक बना हुआ है। परन्तु गाँधीजी के लिए प्रगति औसत के रूप में नहीं, सर्वोदय के रूप में स्वीकार्य है, जहाँ आख़िरी आदमी तक समाज की हिस्सेदारी पहुँचे। अपने हर कार्य के लिए इसे कसौटी मानने तथा मानसिकता के परिवर्तन पर ही वे ज़ोर देते हैं।

गाँधीजी के जीवन, उनकी रुचि, उनके आदर्श पर चिंतन-मनन करके कुबेरनाथ राय ने 'शान्तं, सरलं, सुन्दरम्' के सूत्र द्वारा उनकी दृष्टि का निचोड़ प्रस्तुत किया है। उनका मानना है कि रस-बोध और सौंदर्य-रुचि ही हमारे जीवन के शुभ और अशुभ का स्रोत है। यदि ये दोनों स्वस्थ, पवित्र और उच्चगामी रहें तो व्यक्ति का जीवन एवं प्रकारान्तर से समूह का जीवन स्वस्थ, पवित्र और उच्चगामी रहेगा। इसीलिए आज की बढ़ती कृत्रिमता और उपभोक्ता संस्कृति के विलासपूर्ण विस्तार के संदर्भ में 'शान्तं, सरलं, सुंदरम्' का गाँधीवादी सूत्र उन्हें सर्वोत्तम और सर्वाधिक उपयोगी लगता है।

गाँधीजी की दृष्टि संत-दृष्टि थी। जो सरल है, ऋजु है, वही सुंदर है। उनके यहाँ सरल दो अर्थों में प्रयुक्त होता है : सरल यानी सादा और अकृत्रिम और दूसरे अर्थ में सरल यानी निष्कपट, पारदर्शी। इसी सरल का दूसरा नाम है 'सुशील'। जो कुटिल है, जटिल है, वह निश्चय ही 'दु:शील' है। राय का मानना है कि यह 'शान्तं, सरलं सुंदरम्', हमें अपनी वैदिक प्रार्थना के निकट ले जाता है। हमारी सनातन प्रार्थना यही रही है कि 'हे भगवान, बाह्य सौंदर्य, बाहरी रोब-दाब, बाहरी चमक-दमक हमें पराभूत न करे, हम भीतर निहित सच्चाई को पहचानें।' खादी भी इसी शान्त-सरल-सुंदर सौंदर्यबोध का प्रतीक है।

गाँधीजी आध्यात्मिक नहीं, नैतिक मूल्यों के दार्शनिक हैं। नैतिक मूल्य ऊपर अध्यात्म से जुड़े हैं तो नीचे रोज़मर्रा के लोक-जीवन से। 'हर हाथ को काम' - हमारी विशाल जनसंख्या वाले देश में गाँधीजी ने खादी के द्वारा संभव करने का प्रयास किया। मशीन या आधुनिक सभ्यता के वे विरोधी नहीं थे, पर मशीन का लक्ष्य है 'अधिक उत्पादन' और हमारे देश के लिए चाहिए 'अधिक हाथों द्वारा उत्पादन'। इसलिए कुटीर शिल्प को मशीन और उद्योग के स्थान पर वे तरजीह दे रहे थे। मशीनी सभ्यता तो धीरे-धीरे मनुष्य के मनुष्यत्व को ही ग्रास बनाती जा रही है।

मशीन द्वारा मनुष्य के अवमूल्यन को प्रश्रय न देने और हस्तशिल्प के माध्यम से सही तऱीके से रचनात्मक कार्य में जुड़ने का लक्ष्य था खादी के पीछे। मशीन रहे, मनुष्य के हाथ में शंख-चक्र बनकर रहे, उसका दिल और स्नायुमण्डल बन कर नहीं।

गाँधीजी की भोजन-दृष्टि भी उनके शील-दर्शन का अंग थी। 'निरामिष भोजन का नैतिक दर्शन' और 'स्वास्थ्य की कुंजी' गाँधीजी की इन दोनों पुस्तकों से उनकी भोजन-संबंधी चिंता स्पष्ट होती है। उनके लिए भोजन शरीर के आरोग्य और बल के लिए आवश्यक है। भोजन को वे 'औषधि' की दृष्टि से देखने के समर्थक थे। 'औषधवदशनमाचरेत' (भोजन वैसे ही करो, जैसे औषधि ग्रहण करते हैं अर्थात् नपी-तुली संतुलित मात्रा, भूख के अनुसार करो और स्वाद-तोष के लिए नहीं।)

श्री राय नलबारी के एक होम्योपैथ कॉमरेड नवीन वर्मन की स्वीकारोक्ति उद्धृत करते हुए कहते हैं कि उनकी धारणा में विश्व-शांति की स्थापना संभव है गाँधीवादी भोजन द्वारा। सब लोग गाँधीजी की तरह सीधा-सरल भोजन करने लगेंगे, तो किसी का स्वभाव उग्र नहीं होगा, सब लोग कोमल-सरल प्रकृति के हो जायेंगे। कोई किसी को देखकर अकड़ेगा नहीं, कोई किसी की ओर सींग नहीं तानेगा। क्योंकि सादा सात्त्विक भोजन मनुष्य को उत्तेजित नहीं करता, उसे धीर और शांत रखता है।

गाँधीजी को नीरस, निषेधवादी या सौन्दर्य-विरोधी मान लेने की युवा-पीढ़ी की मानसिकता को श्री राय पूर्वाग्रह और भ्रम मानते हैं। उनका तो कहना है कि उनके जैसा रसमय पुरुष इस शताब्दी के राजनीतिक या सामाजिक जीवन में शायद ही कोई हुआ हो। प्रेम उत्तेजना से ऊपर शान्त और अविकल स्थिति है। गाँधीजी रामायण को प्रेम-काव्य भी मानते थे। गाँधीजी की रसदृष्टि 'प्रसन्न गंभीर रसदृष्टि' थी। 'प्रसन्न' शब्द का अर्थ है पारदर्शी। जब हम प्रसन्न होते हैं, हमारे चेहरे पर हमारा हृदय उतर आता है। इसीलिए 'प्रसन्न' का अर्थ आनन्दित भी है। गाँधीजी आजीवन हर काम में प्रसन्न व गंभीर जल की तरह रहे। उन्होंने अपना भला-बुरा कुछ नहीं छिपाया। गाँधीजी की रसदृष्टि में रूप तभी सुंदर है, जब कर्म का सहयोगी हो और सत्य का बोधक हो। गाँधीजी ने स्वयं कहा है, ''मैं सौंदर्य को सत्य के माध्यम से देखता हूँ।''

कला के क्षेत्र में भी गाँधी-दृष्टि में तीन कसौटियाँ हैं - स्वदेशी हो, लोकायत जीवन से जुड़ी हो और उपयोगी हो। प्रसिद्ध चित्रकार नंदलाल वसु उनके आश्रम के गोबर लिपे कमरे में घड़े के पत्तेनुमा आकार के ढक्कन को देखकर गाँधीजी के उद्गार व्यक्त करते हैं - 'देखो सुंदर है न! इस पर प्रकृति की छाप है, साथ ही इसे मुझे गाँव के लोहार ने गढ़ कर दिया है।'

भाषा और साहित्य के संदर्भ में भी गाँधीजी की दृष्टि में केन्द्राrय तत्त्व 'शील-सौंदर्य' है। हिंदुस्तानी का प्रचार-प्रसार करते हुए 'स्वच्छता और सरलता के साथ उच्चगामिता' उनकी साहित्य-संबंधी धारणा को व्यावहारिक रूप दे देती है। सरल भाषा से तात्पर्य प्राणहीन, गँवारू या भदेस शब्दावली नहीं था।

ĎA call to the Nationí शीर्षक से 'यंग इंडिया' में लिखे अपने लेख के लिए भदन्त आनंद कौसल्यायन से गाँधीजी ने 'हिंदुस्तानी अनुवाद' पूछा। उन्होंने संकोच से कहा 'आह्वान'। गाँधीजी संतुष्ट हो गये। पर भदन्तजी ने कहा, 'बापू! यह तो हिंदुस्तानी नहीं हुई।' गाँधीजी ने आश्चर्य से कहा, 'कैसे! 'आह्वान' काफ़ी ज़ोरदार शब्द है और ख़ूब चलता है।'

गाँधीजी के लिए दर्शन सही वही है, जो जीवन के 'शील' से; 'शीलाचार' के समस्त अंग-प्रत्यंग से जुड़ा हो। गाँधीजी के चिंतन के सारे अंग, चाहे वह सत्याग्रह या ग्रामोद्धार हो, सत्य या अहिंसा हो या मूँगफली का तेल और बकरी का दूध हो, सभी एक ही 'शील' के उन्मेष, आभास और विवर्त्तन हैं। इन सबकी चरम परिणति है 'अभय'। जो इस शील का पालन करता है, वह अभय को प्राप्त हो जाता है।

इतिहास के पन्नों में गाँधीजी के समकक्ष श्री राय को गुरु गोविन्दसिंह दिखायी पड़ते हैं। गाँधीजी की 'राम धुन' की पहली दो पंक्तियाँ स्वामी रामानंद की हैं और अंतिम पंक्तियाँ गुरु गोविन्दसिंहजी की। दोनों को मिलाकर 'राम धुन' पूरी होती है। श्री राय बड़े गर्व से वे पंक्तियाँ उद्धृत करते हैं -

'रघुपति राघव राजा राम

      पतित पावन सीता राम।' (स्वामी रामानंद)

'ईश्वर अल्ला तेरे नाम

      सबको सन्मति दे भगवान।' (गुरु गोविंदसिंह)

लोकनायक और गुरु की भूमिका में आने की तैयारी के रूप में भी श्री राय गाँधीजी के अ़फ्रीका-प्रवास को देखते हैं, क्योंकि भारतीय संस्कृति सिर्फ़ नेता को लोकनायक नहीं मान सकती। वही लोकनायक हो सकता है, जो 'गुरु' होने की क्षमता से युक्त है।

श्री राय गाँधीजी को 'एक सही हिंदू' कहते हैं। नव्यपाषाण युग से आयी भारतीय परंपरा से शुरू होकर राममोहन, दयानंद, गाँधी तक आनेवाली हिंदुत्व की परंपरा है। इसी के मानसिक उत्तराधिकार के प्रकाश में ही गाँधी की कर्म-प्रणाली, चिंतन और जीवन-पद्धति का सही अर्थ खुलता है। `िहन्दुत्व' में परम्परा के विभिन्न स्रोतों का समावेश है, जिसका चरम है 'सर्व धर्म समान रूप से सत्य है।' इसी दृष्टिकोण का एक दूसरा परिणाम है 'मध्यम मार्ग'। सब समान भाव से सही हैं तो सबकी उपलब्धियों को स्वीकार कर समन्वित दृष्टि अपनाना है।

गाँधीजी किसी भी विषय को जीवन के सम्पूर्ण अंगों से जोड़कर, परिवेश की समग्रता के भीतर रखकर देखते थे। उनकी रस-दृष्टि (शान्तं, सरलं, सुंदरम्) शिल्प-दृष्टि (सहजता, स्वदेशीपन, उपयोगिता) से जुड़ी है, शिल्प-दृष्टि कुटीर उद्योग के अर्थशास्त्र से, अर्थशास्त्र जुड़ा है सर्वोदय समाजशास्त्र से, सर्वोदय समाजशास्त्र से जुड़ा है सामूहिक शील और राष्ट्रीय चरित्र, फिर ये जुड़े हैं व्यक्तिगत 'शील' और आचार से, व्यक्तिगत शील और आचार जुड़े हैं भोजन और शिक्षा से...। इस तरह चिंतन की समग्रता का वृत्त बनता जाता है।

आज विभिन्न क्षेत्रों में गहराती समस्याओं का मूल इसी समग्र दृष्टि के अभाव में है। हर ओर छोटे-छोटे द्वीप अपने-अपने टुच्चे स्वार्थ और सीमित घेरे हमारे विस्तार को अवरुद्ध करते दिखायी देते हैं। फलस्वरूप युवा-पीढ़ी की ऊर्जस्वी चेतना विकास का आकाश न पाकर दमित, अवदमित और कुंठित होती जा रही है। यह अवदमन उसके संस्कारों में विकृतियों का प्रवेश करवाता है। हम कारण न देखकर युवाओं की प्रवृत्ति को कोसने में अपना बड़प्पन मान लेते हैं। कुबेरनाथ राय आज की भयावह स्थिति में साहित्य और साहित्यकार के दायित्व को विशेष महत्त्व देते हैं, क्योंकि वे प्रेमचंद के समान ही मानते हैं कि ''लेखक केवल मज़दूर नहीं, बल्कि और कुछ है - वह विचारों का आविष्कारक और प्रचारक भी है।'' वे लेखक को 'द्रष्टा' या 'ऋषि' की भूमिका में ग्रहण करते हैं।

गाँधीजी तो साधारण राजनीतिक कार्यकर्ता तक के लिए 'सत्याग्रही' होने की शर्त रखते हैं, फिर कवि या साहित्यकार के लिए तो सत्य से अलग राह ही नहीं है। उनके अनुसार सच बोलना ही सर्वोत्तम कविता है। गाँधीजी की दृष्टि में साहित्यकार का दायित्व भी यही है कि वह सत्य के प्रति ईमानदार रहे और सत्य के लिए एक सांस्कारिक और मानसिक वातावरण तैयार करे। जिससे मनुष्य को 'अभय' की उपलब्धि हो तथा मनुष्य में अन्तर्निहित आत्मिक क्षमताओं का विकास हो।

गाँधीजी की मान्यताओं को आज के समय में भी कसौटी पर कस कर परखा जाना चाहिए। गाँधीजी ने अपने जीवन को स्वयं ही 'सत्य प्रयोग' कहा है। वे कर्मयोगी थे। उनकी सारी विचारधारा उनके आजीवन व्यापी क्रियायोग में कार्य के रूप में अभिव्यक्त हुई है। साहित्यकार की प्रतिबद्धता किसी मंच, दल या विचारधारा से होने पर भी उसका केन्द्राय स्थान 'मनुष्य' ही होगा। जिसे हम जन, जनता और सामान्य आदमी कहते हैं, कभी जब सचाई उसके विरुद्ध हो - तब साहित्यकार किसका साथ दे? श्री राय के अनुसार गाँधीजी का भी यही उत्तर होगा कि सच का साथ दिया जाये, क्योंकि जन को उसके भोलेपन के कारण संबंधित स्वार्थ बहका सकते हैं।

श्री राय रवीन्द्रनाथ को गाँधीजी के पूरक के रूप में देखते हैं, क्योंकि दोनों का मौलिक उद्देश्य था जीवन को बढ़ती हुई यांत्रिक जटिलता, असहजता से मुक्त करके उसे पुन: सहज, सरल और निर्मल रूप में प्रतिष्ठित करना। स्वयं रवीन्द्रनाथ ने कहा था, 'महात्माजी तपस्या के पैगम्बर हैं और मैं हूँ आनन्द का कवि।'

गाँधी-चिंतन की संपूर्णता और भारत की आत्मा को सही-सही और पूरा उद्घाटित करने वाली कविता श्री राय की राय में रवीन्द्रनाथ की वह कविता है, जिसका प्रारम्भ होता है, 'चित्त जेथा भयशून्य' शब्द से।

कविता का हिंदी अनुवाद है -

''जहाँ चित्त भयशून्य है, शीश ऊँचा है, ज्ञान मुक्त है, जहाँ वाक्य हृदय के उत्स से जन्म लेते हैं, जहाँ देश-देशान्तर दिशा-दिशा में कर्मधारा सहस्र स्रोतों में चरितार्थ हो रही है, जहाँ तुच्छ विधि-निषेधों और आचार कर्मकाण्ड की मरुभूमि में विचारों का स्रोत-पथ लुप्त नहीं हो गया है, जहाँ पौरुष सौ टुकड़ों में बँटकर व्यर्थ नहीं जाता है, जहाँ सारे कर्म, चिंतन और आनंद की ओर ले जाने वाले (नेता) तुम ही हो।

ये पंक्तियाँ हमारी अतीत श्रद्धा, वर्तमान पुरुषार्थ और उत्तरकालीन आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करती हैं। कविता रवीन्द्रनाथ की है, पर इसकी पंक्ति-पंक्ति में गाँधीजी की आत्मा उतर आयी है।

यद्यपि गाँधीजी का दिया हुआ समाधान बड़ा कठिन है, परन्तु लक्ष्य जितना बड़ा है - मनुष्य के मंगल का स्थायी समाधान - तो साधन भी उतना ही कठिन होगा।

गाँधी-चिंतन के व्यावहारिक सूत्र आज ही अपनी परिणति तक नहीं पहुँचेंगे। परंतु उस समय तक के लिए हमें मनुष्य के हाथों को, उसकी चेतना को इच्छित शैली में प्रशिक्षित करते रहना ज़रूरी है। श्री राय पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि एक दिन ऐसा आयेगा कि सभी को सर्वोदय और गाँधीजी की ज़रूरत अनिवार्य लगेगी। सच तो यह है कि इस शताब्दी में गाँधीवादी चिंतन जैसा सुलझा हुआ क्रमबद्ध और पूर्णांग चिंतन अभी तक आया ही नहीं।

गाँधी-चिंतन को व्यक्त कर श्री राय ऋषि-ऋण से मुक्त होने और भारतीय रचनाकार की दायित्व-चेतना से जुड़ने का अनुभव करते हैं। आधुनिक जीवन की यांत्रिकता, जड़ता और उलझी मनोवृत्ति का मूल कारण अर्थ और काम को प्रभुत्व, लगभग एकतरफ़ा साम्राज्य प्राप्त होना है। श्री राय का दृढ़ विश्वास है कि समाधान में गाँधीवादी चिंतन के बहुत से सूत्र सहायक होंगे। उनका कहना है, ''21वीं शती के दो-तीन दशकों के बाद ही मनुष्य को बाध्य होकर राजनीति और अर्थनीति को 'मनुष्य केन्द्रित' करना ही होगा। इस 20वीं शती को तब इतिहासकार 'अंधकार-युग' की संज्ञा देंगे और 'मनुष्य केन्द्रित' राजनीति और अर्थनीति का उदय ही मनुष्य जाति के इतिहास का 'दूसरा पुनर्जागरण युग' कहा जायेगा।''

एक द्रष्टा कवि व मनीषी की भविष्यवाणी के प्रकट होने का समय निकट है। 

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