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सांप्रदायिकता की लपटें

जब तनाव बढ़ रहा था तो केंौ में स्थिर और दृढ़ सरकार का होना बहुत जरूरी था। कैबिनेट मिशन अंतरिम राष्ट्रीय सरकार बनाने में असफल रहा। जुलाई, 1946 में लार्ड वेवेल ने पुनः इस दिशा में प्रयत्न आरंभ किया और जवाहरलाल नेहरू को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया। नेहरू ने जिन्ना को अंतरिम सरकार में सम्मिलित करना चाहा लेकिन उन्होंने न केवल सहयोग देने से इनकार कर दिया, बल्कि बड़ी ही कटु आलोचना की और यह भी घोषणा की कि मुस्लिम लीग 16 अगस्त को "सीधी कार्रवाई दिवस" मनाएगी। उस दिन कलकत्ता में ऐसा भीषण दंगा, खून-खराबा और मारकाट हुई जिसकी मिसाल नहीं मिल सकती। "कलकत्ता के भयंकर नरमेध" की प्रतिक्रिया हुई और पूर्व बंगाल, बिहार और पंजाब में सांप्रदायिक ज्वाला की लपटें उठने लगी।

जब गांधीजी को बंगाल के उपौवों की सूचना मिली, उन्होंने अपना सारा कार्यक्रम रद्द कर दिया और दंगाग्रस्त क्षेत्रों में जाने का निश्चय किया। उन्होंने देखा कि पूर्वी बंगाल के गांवों में भय, घृणा और हिंसा का बोलबाला था। गांव-गांव में जाकर उन्होंने लोगों की दशा अपने आंखों से देखी। गांधीजी ने इस बात की कोशिश की कि लोग शांति स्थापना को, राजनीति से अलग कर, शुद्ध मानवता का प्रश्न समझें। उन्होंने आग्रह किया कि भारत का भावी नक्शा चाहे जो भी हो, सभी राजनीतिक दलों में इस बात पर पूर्ण सहमति होनी चाहिए कि सभ्य जीवन के मानदण्डों की अवहेलना नहीं होगी।

गांधीजी उपस्थिति से पूर्वी बंगाल के संतप्त गांवों में कुछ शांति आयी। तनाव ढीले पड़ गये, क्रोध शांत हुआ और मनःस्थिति में सुधार हुआ। मार्च, 1947 में वह बिहार गए जहां हिन्दू किसानों ने पूर्वी बंगाल में मुसलमान बहुसंख्यकों द्वारा किए गए अत्याचारों का भयंकर बदला लिया था। बिहार को भी गांधीजी ने वही संदेश दिया, जो पूर्वी बंगाल को दिया था। बहुसंख्यकों को कृत्यों के लिए पश्चातापकर, अपनी भूल सुधार कर, क्षति की पूर्ति करनी चाहिए, और अल्पसंख्यकों को क्षमा-दान द्वारा नया जीवन शुरू करना चाहिए। दुर्घटनाओं के लिए वह कोई भी बहाना सुनने को तैयार न थे। लेकिन उन्होंने उन लोगों को फटकारा, जो बिहार में हुए दंगे का इस आधार पर समर्थन करते थे, कि वे पूर्वी बंगाल की घटनाओं की प्रतिक्रिया थे। दूसरे चाहे जो भी करें, सभ्य व्यवहार हर व्यक्ति और समुदाय का अपना कर्तव्य है।
देशव्यापी अराजकता से बुरी तरह घबरा कर, लार्ड वेवेल ने लीग को भी अंतरिम सरकार में सम्मिलित कर लिया। लेकिन इस संयुक्त मंत्रिमंडल से राजनीतिक वादविवाद समाप्त होने के बजाय तेजी से बढ़ा। 9 दिसम्बर, 1946 से संविधान सभा की बैठक होने वाली थी। मुस्लिम लीग ने इसमें भाग लेने से इनकार कर दिया। वैधानिक संकट इतना गहरा हो गया कि नवम्बर, 1946 के अंतिम सप्ताह में ब्रिटिश सरकार ने दोनों दलों में समझौता कराने के लिए वाइसराय, नेहरू, जिन्ना, लियाकत अली खां और सरकार बलदेव सिंह को बातचीत के लिए लंदन बुलाया। वहां की बातचीत भी निष्फल रही लेकिन सरकार ने विवादास्पद बातों पर अपने
दृष्टिकोण या स्पष्टीकरण करते हुए एक वक्तव्य निकाला। इससे लीग की बहुत सी आपत्तियों का निराकरण हो गया, लेकिन फिर भी वह संविधान सभा में भाग लेने को राजी न हुई।

1947 के आरम्भ में देश के राजनैतिक क्षितिज पर घनघोर काली घटा छायी हुई थी। स्थिति को अराजकता की ओर बढ़ते देख कर ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेण्ट एटली इस नतीजे पर पहुंचे कि एक नयी नीति की जरूरत है और एक नया वाइसराय ही उसे कार्य रूप दे सकेगा। 20 फरवरी, 1947 को, उन्होंने हाउस आफ कामंस में घोषणा की कि "ब्रिटिश सरकार ने जून, 1948 तक भारत छोड़ने का पक्का इरादा कर लिया है और यदि उस समय तक भारतीय राजनैतिक दल अखिल भारतीय संविधान के विषय में एकमत न हो सके तो ब्रिटिश भारत में किसी तरह की केंौाhय सरकार को या कुछ क्षेत्रों की तत्कालीन प्रांतीय सरकारों को सत्ता हस्तांतरित कर दी जाएगी।" साथ ही यह भी घोषणा की गयी कि लार्ड वेवल के स्थान पर लार्ड माउण्टबेटेन भारत के वाइसराय होंगे।

20 फरवरी के वक्तव्य में अंग्रेजों के भारत छोड़ने के निश्चय और उसकी तारीख दोनों की घोषणा कर दी गई थी। लार्ड माउण्टबेटेन मार्च में भारत पहुंचे। उनका पहला काम था गांधीजी को बातचीत के लिए आमंत्रित करना। बिहार में अपना शांति स्थापना कार्यक्रम रद्द करके गांधीजी दिल्ली पहुंचे। अगले कुछ सप्ताहों में यह स्पष्ट हो गया कि भारत के विभाजन द्वारा ही राजनैतिक गतिरोध दूर किया जाएगा। .  जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग पाकिस्तान की अपनी मांग पर अड़ी रही। विभाजन के प्रति कांग्रेस के ष्टिकोण में भी कुछ परिवर्तन हुआ। अभी तक कांग्रेस इस बात पर अड़ी थी कि यदि बंटवारा होना ही है तो वह स्वाधीनतागप्राप्ति के बाद हो, पहले नहीं "शादी पहले, तलाक उसके बाद।" लेकिन अंतरिम सरकार में कुछ महीने मुस्लिम लीग के साथ काम करके और उसके विचारों को बदलने की जी तोड़ कोशिश को बेकार जाते देख चुकने के बाद, नेहरू, पटेल और दूसरे कांग्रेसी नेता मुस्लिम लीग के साथ किसी तरह के गहरे मेलगमिलाप या एकता की आशा छोड़ चुके थे। 1947 के फरवरी-मार्च में हालत यह हो गई कि उनके सामने एक ही विकल्प था - अराजकता या विभाजन। अराजकता की जो विभीषका पूरे देश का संहार करने जा रही थी, उससे तीन चौथाई देश को बचाने के लिए उन्होंने कलेजे पर पत्थर रख कर विभाजन स्वीकार कर लिया।

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