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शिमला सम्मेलन

1945 की गर्मियों में वाइसराय लार्ड वेवेल ने शिमला में एक सम्मेलन का आयोजन किया। भारतीय नेताओं के परामर्श से अपनी कार्यकारी कौंसिल का पुनर्गठन करने के प्रश्न पर ब्रिटिश मंत्रिमण्डल की स्वीकृति लेकर वह हाल ही में इंग्लैंड से लौटे थे। गांधीजी सम्मेलन में प्रतिनिधि के रूप में नहीं बुलाए गए, यद्यपि वाइसराय और कांग्रेस कार्य-समिति दोनों ने ही उनकी राय ली। जब जिन्ना साहब इस बात पर अड़ गये कि कौंसिल के सभी मुसलमान सदस्यों को मनोनीत करने का एकमात्र अधिकार मुस्लिम लीग को होना चाहिए तो सम्मेलन को भंग कर देना पड़ा। कांग्रेस अपने राष्ट्रीय स्वरूप और ष्टिकोण के कारण इस मांग को कभी स्वीकार नहीं कर सकती थी।

शिमला सम्मेलन में गतिरोध नहीं हटा लेकिन सम्मेलन के बाद की दो महत्वपूर्ण घटनाओं के कारण एक नयी पहल करना संभव हो सका। 15 अगस्त, 1945 को, जापान ने हथियार डाल दिए और द्वितीय महायुद्ध समाप्त हो गया। ब्रिटेन में मजदूर दल ने नया मंत्रिमण्डल बनाया। लार्ड वेवेल इंग्लैंड गए और भारत लौटने पर 19 सितम्बर, 1945 को उन्होंने घोषणा की कि सरकार अभी भी 1942 के "क्रिप्स प्रस्तावों की भावना" से प्रेरित है और उनका इरादा संविधान निर्मात्री परिषद बनाने का है। यह घोषणा की गई कि केन्द्रीय और प्रान्तीय विधानमण्डलों के चुनाव कराए जाएंगे। ये चुनाव तो बहुत पहले हो जाने चाहिए थे। चुनाव की बात से भारतीय राजनीति में बड़ी खलबली मच गई और अत्यधिक उत्तेजना, समझौते की अंतहीन बातचीत और कटु वादविवाद का वातावरण पैदा हो गया। 

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