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प्रथम महायुद्ध

भारत लौटने पर उन्होंने देखा कि राष्ट्रवादी, युद्ध में बिना शर्त सहायता देने का विरोध कर रहे है। युद्ध में सहायता देना राजभक्ति का लक्षण माना जाता था। बिना शर्त राजभक्ति का परिचय देना राजनैतिक पिछड़ेपन का लक्षण और सरकारी पिट्ठुओं का काम था, देशभक्तों का नहीं। लेकिन गांधीजी का मत था कि युद्ध में सरकार से सहयोग करने की कोई कीमत नहीं मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा "हमने सरकार के संकटकाल में उसकी वफादारी की, इससे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि हम स्वराज्य के योग्य हो गए। राजभक्ति स्वतः कोई बड़ी बात नहीं है; यह तो दुनिया भर में नागरिकता की एक अनिवार्य शर्त है।"

1916-18 में गांधीजी ने राजनीति में कोई सक्रिय भाग नहीं लिया। उनके आदर्श और कार्यप्रणाली, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दोनों प्रमुख दलों से बिल्कुल ही मेल नहीं खाते थे। नरम दल उनके सत्याग्रह के संविधानेतर तरीके पसन्द नहीं करता था। गरम दल, महायुद्ध में अंग्रेज सरकार के प्रति, उनके द्वारा जानबूझ कर अपनाये गए सहानुभूतिपूर्ण ष्टिकोण को नापसन्द करता था। अतः गांधीजी ने न तो होम रूल (स्व-शासन) आंदोलन में भाग लिया और न समझौते की उस बातचीत में, जिसके फलस्वरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ समझौता हुआ। वह भारतीय राजनीति की प्रमुख धारा से विलग मालूम पड़ते थे। उस समय राष्ट्रीय मंच पर गांधीजी नहीं किन्तु ऐनी बेसेण्ट और लोकमान्य तिलक ही छाए हुए थे और सरकार के निकट भी उन्हप दोनों का महत्व था। ब्रिटेन के aaa के एक सदस्य एडविन माण्टेगू ने, जो 1917 में भारत आये थे, अपनी डायरी में लिखा था कि "उस समय शायद तिलक ही भारत में सबसे शक्तिशाली व्यक्ति थे।" गांधीजी के बारे में माण्टेगू की राय थी : "वह निरे समाज-सुधारक हैं। जनता के कष्टों को जानने और दूर करने की उनमें बड़ी तीव्र अभिलाषा है और वह यह कार्य अपनी प्रसिद्धि के लिए नहीं, देशवासियों की दशा सुधारने की शुभ निष्ठा से करते हैं। कुलियों जैसे कपड़े पहनते हैं, स्वयं किसी तरह का लाभ उठाने की नाममात्र भी इच्छा नहीं करते, करीब-करीब हवा पी कर जीवन-निर्वाह करते है और शुद्ध कल्पना के जगत में विचरते हैं।"

यद्यपि गांधीजी ने  दृढ़ निश्चय कर लिया था, कि महायुद्धे के समय में वह किसी राजनैतिक संघर्ष में भाग नहीं लेंगे, वह ऐसे कष्ट दूर करने के प्रयत्न से अपने को न रोक सके जिसे करना न्यायसंगत था और जिसमें देरी नहीं की जा सकती थी। 1917 की ग्रीष्म ऋतु में वह बिहार प्रदेश के चम्पारन जिले में गए, जहां नील की खेती होती थी और वहां गोरे बागान-मालिकों के खिलाफ किसानों की ओर से आवाज उठाई। उसी साल उन्होंने अहमदाबाद की कपड़ा-मिलों में मजदूरों की हड़ताल का नेतृत्व किया। अगले वर्ष जब खेड़ा जिले में वर्षा न होने से खेतों को नुकसान पहुंचा तो उन्होंने भूमि-कर घटाने के लिए संघर्ष किया। स्थानीय अधिकारी गांधीजी के इन कार्य़ों से घबड़ा गए लेकिन सरकार जल्दी में आकर बल-प्रयोग नहीं करना चाहती थी। गांधीजी इन झगड़ों को सीमित ही रखना चाहते थे और राष्ट्रीय स्तर पर संकट पैदा किए बिना ही इन समस्याओं का ऐसा समाधान चाहते थे, जिससे मजदूरों और किसानों को किसी हद तक न्याय प्राप्त हो जाए।

1918 में जब ब्रिटेन और उसके मित्र राष्ट्रों की हालत खराब थी और पीिचमी मोर्चे पर जर्मनों के जोरदार आक्रमण की आशंका थी, तो वाइसराय ने युद्ध में सहायता देने के प्रश्न पर विचार करने के लिए दिल्ली में भारतीय नेताओं का सम्मेलन बुलाया। गांधीजी ने सम्मेलन में भाग लेकर, रंगरूट भरती करने के प्रस्ताव का, हिन्दी में एक ही वाक्य कह कर समर्थन कियाः "अपने दायित्व का पूरा ध्यान रख कर मैं प्रस्ताव का समर्थन करता हूं।" फिर तो वह तन-मन से रंगरूट-भरती के काम में लग गए। यूरोप के मोर्चे पर लड़ने वाली ब्रिटेन की भारतीय फौज के लिए गुजरात के गांवों में रंगरूट भरती करने के लिए जाना अहिंसा के पुजारी गांधीजी के लिए एक तरह से हास्यास्पद ही था। गुजरात के गांवों में यात्रा के लिए बैलगाड़ी तक न मिलने पर गांधीजी और उनके साथियों को अक्सर एक दिन में बीस-बीस मील तक पैदल चलना पड़ता था। गांधीजी इन कष्टों को सहन न कर सके और भयंकर पेचिश से पस्त हो गए।

इसी बीच युद्ध समाप्त हो गया और गांधीजी को पता चला कि राजौाsह समिति रिपोर्ट प्रकाशित हो गयी है और नागरिकों की स्वतंत्रता पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए सरकार विधेयक पेश करने जा रही है। भारतीय नेताओं में शायद अकेले गांधीजी ने ब्रिटेन की संकट की घड़ी में बिना किसी शर्त के सहयोग देने का आग्रह किया था क्योंकि उन्हें आशा थी कि युद्ध की समाप्ति पर ब्रिटेन की ओर से सद्भावना का उचित प्रदर्शन होगा। अब उन्हें लगा कि रोटी के बदले पत्थर मिले हैं। युद्ध-काल में किसी भी तरह के संघर्ष से दूर रहने का उन्होंने हर संभव प्रयत्न किया था। अब शान्ति-काल में जो अन्याय किया गया, उसके विरोध में लड़ने के लिए वह तड़प उठे।


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