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मानव से महात्मा गांधीजी |
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गांधीजी ने 1914 में दक्षिण अफ्रीका छोड़ा। वह एक व्यावसायिक फर्म के सहायक वकील की हैसियत से 105 पौण्ड वार्षिक मेहनताने पर वहां गए थे। फिर वहीं रुक गए और चोटी के वकील बन कर पांच हजार पौण्ड वार्षिक की वकालत जमा ली और उसे स्वेच्छा से छोड़ भी दिया। वकालत शुरू करने के पहले दिन बम्बई की अदालत में एक मामूली से मुकदमे में जिरह करते समय उनके हाथ-पैर ढीले पड़ गए थे; दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने एक नया राजनैतिक संगठन बना डाला और एक अनुभवी नेता की सी कुशलता से उसे चलाया भी। वहां के गोरे अधिकारियों और कूटनीतिज्ञों के द्वेष भाव तथा भारतीय व्यापारियों और मजदूरों की असहाय अवस्था ने उनके अन्तस्थ शौर्य और साहस को जगा दिया था। कोई बड़ा पुरस्कार तो उन्हें मिलना न था, उल्टे खतरे बहुत बड़े थे, वकालत का धंधा चौपट होने से लेकर जान से मार दिए जाने तक। लेकिन दक्षिण अफ्रीका में वकालत और सार्वजनिक कार्य आरम्भ करना उनके लिये सौभाग्यपूर्ण ही सिद्ध हुआ। भारत में महान नेताओं और धुंधर वकीलों के सामने उन्हें कौन पूछता। अपने देश में नेतृत्व का गुण और पहल करने की प्रतिभा शायद ही उनमें विकसित हो पाती। 25 वर्ष की उम्र में जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में नेटाल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की तो यह क्षेत्र बिल्कुल खाली पड़ा था। अतः वह उन विचारों पर पूरी आजादी से अमल कर सके, जिनकी किसी भी सुव्यवस्थित राजनैतिक संगठन में खिल्ली उड़ाई जाती।
सत्य और
प्रतिज्ञाओं का भला राजनीति से क्या सम्बन्ध? बाद में यही प्रश्न बार-बार
भारत में भी उठा और यदि गांधीजी विचलित नहीं हुए तो इसका कारण यही था कि
दक्षिण अफ्रीका में काफी समय पहले वह राजनीति से इनका सम्बन्ध जोड़ चुके थे
और इसकी पुष्टि भी कर चुके थे। ऐसी जगह काम शुरू करना जहां न तो पेशेवर
राजनीतिज्ञ थे और न राजनीतिक जंजीरों का कोई बंधन अवश्य ही उस व्यक्ति के
लिए लाभदायक था जिसे राजनीतिशास्त्र का ज्ञान नहीं था और जिसके सिद्धान्त
आचरण पर ही आधारित होते थे। नेटाल और ट्रंसवाल भारत के छोटे-से-छोटे प्रदेश
से बड़े नहीं हैं। गांधीजी द्वारा भारत की आजादी की लड़ाई बहुत बड़े पैमाने
पर लड़ी गई और यहां की समस्याएं भी बहुत बड़ी थप, लेकिन ऐसे बहुत से अवसर
आए जब उन्हें दक्षिण अफ्रीका के अनुभवों से प्रेरणा मिली।
लियो टाल्स्टाय, जिनके विचारों का गांधीजी पर गहरा असर पड़ा । गांधीजी की राजनीतिक नीतियों ने ही नहीं, उनके व्यक्तित्व ने भी दक्षिण अफ्रीका में रूपाकार प्राप्त किया। उनके जीवन के निर्माण काल का अधिकांश समय भी वहीं बीता। नैतिक और धार्मिक प्रश्नों में उनकी रुचि तो बचपन से ही थी, लेकिन इनके विधिवत अध्ययन का अवसर उन्हें दक्षिण अफ्रीका में ही मिला। प्रिटोरिया के क्वेकरङ मित्र उन्हें ईसाई तो न बना सके, पर धर्मसम्बन्धी अध्ययन की उनकी स्वाभाविक जिज्ञासा अवश्य ही तीव्र हो गई। उसके बाद तो अपने धर्म के अतिरिक्त उन्होंने ईसाई तथा दूसरे धर्म़ों का भी गंभीर अध्ययन किया। अफ्रीका-प्रवास के प्रथम वर्ष में उन्होंने करीब अस्सी पुस्तकें पढ़प, जिनमें बहुत सी धर्म-सिद्धान्तों पर थप। इनमें से एक थी टालस्टाय की पुस्तक 'द किंगडम आफ गाड इज विदिन यू' (वैकुंठ तुम्हारे हृदय में है)। टालस्टाय की पुस्तकों पर वह मुग्ध हो गए और आने वाले वर्ष़ों में उन्होंने 'गास्पेल्स इन ब्रीफ' (संक्षिप्त सुसमाचार), 'व्हाट टु डू' (क्या करें?), 'स्लेवरी आफ अवर टाइम्स' (हमारे जमाने की गुलामी), 'हाऊ शैल वी एस्केप?' (हम कैसे भागें?), 'लेटर्स टु ए हिन्दू' (एक हिन्दू को लिखे पत्र), और 'द फर्स्ट स्टेप' (पहला कदम) पढ़ डाले। टालस्टाय के निर्भीक आदर्शवाद और स्पष्टवादिता ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया। ईसाई-विौाsही टालस्टाय ने संस्थागत धर्म के प्रति उनकी आस्था को दूर कर दिया। नित्यप्रति के जीवन को नैतिक सिद्धान्तों के अनुरूप बनाने पर जो बल टालस्टाय ने दिया था, उससे उन्हें अपने में सुधार के प्रयास को समर्थन मिला। शायद ही कुछ लोगों ने इतना कम पढ़ कर उससे इतना लाभ उठाया हो। पुस्तकें उनके लिए घड़ी भर का मनबहलाव नहीं, अनुभवों का संचित कोष होती थप। पुस्तकों के विचारों से सहमत होते तो उन्हें आत्मसात कर लेते और तदनुसार आचरण भी करते, असहमत होते तो उन्हें छोड़ देते। रस्किन की पुस्तक 'अण्टू दि लास्ट' से इतने प्रभावित हुए कि नेटाल की राजधानी छोड़ कर जूलूलैंड के जंगल में जा बसे। स्वेच्छा से गरीबी को गले लगाया और अक्षरशः पसीने की कमाई खाने लगे। गांधीजी को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली पुस्तकों में टालस्टाय की पुस्तकें भी थप। आंख मूंद कर अनुकरण करने का तो उनका स्वभाव ही नहीं था, लेकिन यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि टालस्टाय की कृतियों के अध्ययन से ही उनके अपरिपक्व विचारों को प्रौढ़ता मिली। आधुनिक राज्य की संगठित या प्रच्छ़ हिंसा, नागरिक सविनय अवज्ञा अथवा असहयोग के अधिकार-सम्बन्धी अपने विचारों का समर्थन गांधीजी को टालस्टाय की पुस्तकों में मिला। आधुनिक सभ्यता और औद्योगीकरण से लेकर यौन-सम्बन्धों और शिक्षा आदि अनेक विषयों पर टालस्टाय की मीमांसा से गांधीजी सहज ही सहमत थे। दोनों में हुए पत्र-व्यवहार से यह बात स्पष्ट होती है कि जीवन की देहरी पर खड़े युवा गांधी में टालस्टाय के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता थी। वयोवृद्ध टालस्टाय गांधीजी के विचारों से विस्मित और प्रफुल्लित हुए। टालस्टाय ने गांधीजी को लिखा था कि, "और इसलिए हमें ऐसा लगता है कि ट्रंसवाल में तुम्हारा कार्य संसार में आजकल होने वाले कार्य़ों में सबसे अधिक आवश्यक और महत्वपूर्ण है और उसमें न केवल ईसाई राष्ट्र किन्तु पूर्ण संसार के सभी राष्ट्र निस्सन्देह भाग लेंगे।" ईसाई तथा इस्लाम धर्म़ों की पुस्तकें तो दक्षिण अफ्रीका में आसानी से मिल जाती थपा लेकिन हिन्दू धर्म की पुस्तकें उन्हें भारत से मंगानी पड़ती थप। धार्मिक विषयों पर वह अपने मित्र रायचन्द भाई के साथ पत्र-व्यवहार भी करते थे। गांधीजी के क्वेकर मित्र यह समझते थे कि वह ईसाई धर्म स्वीकार करने वाले हैं, लेकिन रायचन्द भाई के प्रभाव से ही अन्तिम रूप से उनकी श्रद्धा हिन्दू धर्म में –ढ़ हो गई। धर्म़ों के तुलनात्मक अध्ययन, धर्म-ग्रन्थों के पाठ और विद्वानों के सत्संग और पत्र-व्यवहार से गांधीजी इस नतीजे पर पहुंचे कि सत्य बुद्धि से उतना ग्राह्य नहीं है जितना हृदय से और अक्षरशः आचरण में पालन किया जाना ही सत्य में विीवास का प्रमाण है। इन्हप वर्ष़ों में गांधीजी की जीवन पद्धति में परिवर्तन हुआ। 'भगवद्गीता' से, जिसे उन्होंने अपना 'आध्यात्मिक कोश' कहा था, उन्होंने 'अपरिग्रह' के आदर्श को आत्मसात किया, जिससे वह स्वेच्छा से गरीबी के मार्ग पर चल पड़े। दूसरा आदर्श था 'निष्काम कर्म', जिससे उन्हें सार्वजनिक जीवन के लिए आवश्यक अद्भुत सहन शक्ति प्राप्त हुई। एक धर्मार्थ चिकित्सालय में नुस्खों से दवाइयां बनाने और वितरित करने का भार उठा कर उन्होंने अपने को इस काम के लिए प्रशिक्षित किया, जिससे कि वह उन गिरमिटिया मजदूरों की सेवा कर सकें जो दक्षिण अफ्रीका के सबसे गरीब भारतीय थे। डरबन के निकट फोनेक्स में और जोहान्सबर्ग के निकट टालस्टाय फार्म पर उन्होंने छोटी-छोटी ऐसी बस्तियां बनाइऔ, जहां स्वयं वह और उनके आदर्श़ों को अपनाने वाले लोग, नगरों की गर्मी और धूल तथा आदमी के लोभ और द्वेष से दूर हट कर शान्ति पा सकें। गांधीजी के उस काल का व्यक्तित्व-चित्रण उनके पहले जीवनी-लेखक जोहान्सबर्ग के श्रद्धेय जोसेफ जे. डोक ने अपनी पुस्तक में किया है। वह लिखते हैः "एक छोटा, दुबला-पतला पर फुर्तीला व्यक्ति मेरे सामने खड़ा था और मेरी ओर देखने वाले उस व्यक्ति के चेहरे से सुसंस्कृति और उत्साह की झलक मिलती थी। उसकी त्वचा का रंग सांवला और आंखें काली थप, लेकिन उसके चेहरे को आलोकित करने वाली मुस्कराहट और उसकी सीधी निर्भय दृष्टि सामने वाले के दिल को बरबस जीत ले रही थी। उसकी उम्र के बारे में मेरा अनुमान बिल्कुल सही निकला। वह करीब 38 वर्ष का था। वह बहुत अच्छी अंग्रेजी बोल रहा था जिससे यह प्रकट ही था कि वह सुसंस्कृत व्यक्ति था। ...इस भारतीय नेता की ओर जिस बात ने मुझे तत्काल आकर्षित किया, वह थी आत्मविीवास की दृढ़ता, हृदय की महानता और निष्कपट सत्यवादिता। हमारे इस भारतीय मित्र का वैचारिक और आध्यात्मिक स्तर अधिकांश लोगों से बहुत ऊंचा है। मेरी आफ वैथेनीङ की तरह उसके काम भी ऐसे होते हैं कि लोग उसे गलत समझते हैं और अक्सर सनकी कह बैठते हैं। जो उससे परिचित नहीं हैं वह उसकी दुनियादारी के पूर्ण अभाव के पीछे कोई-न-कोई बुरा हेतु अथवा पूरबवासियों की 'मक्कारी' ही देखते हैं। लेकिन उसे जानने वाले उसके आगे शर्म से पानी-पानी हो जाते हैं। मेरे विचार में रुपये का उसे जरा भी लोभ नहीं है। उसके देशवासी भी उसकी अद्भुत निःस्वार्थपरता पर आश्चर्य करते हैं और उन्हें इस कारण क्रोध भी आता है। पर साथ ही वे उसे प्यार भी करते हैं; ऐसा प्यार जो उनके विश्वास और गर्व का द्योतक है। वह उन असाधारण व्यक्तियों में से है जिनके सत्संग से ज्ञान की वृद्धि होती है... और परिचय मात्र से जिसके प्रति सहज प्रेम उत्प़ हो जाता है।" |