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शिशु

गांधी कथा

एक लड़का था। उसका नाम मोहन था। वह राजकोट की एक पाठशाला में पढ़ता था। पढने में तेज नहीं होने पर भी दूसरी पुस्तकें पढने का उसे काफी शौक था। एक बार एक पुस्तक उसके हाथ में आई। पुस्तक में पितृभक्त श्रवण की वार्ता थी। श्रवण अपने बूढ़े मातापिता को कांवर में बिठाकर तीर्थ कराने के लिए ले जाता है। इसे पढ़कर मोहन को लगा कि मुझे भी मातापिता की सेवा करनी चाहिए और श्रवण के जैसा बनना चाहिए।

उन्हीं दिनों उसने एक नाटक देखा। नाटक राजा हरिश्चंद्र अपना राज्य छोड़ देते हैं और काफी कष्ट भोगते हैं। यह पढ़कर मोहन की आंखें में आंसू आ गए। राज के समय सपने भी उसे हरिश्चंद्र के ही आने लगे। उसने निश्चय किया कि चाहे जितने कष्ट उठाने पड़ें तो भी हरिश्चंद्र की ही तरह सदा सत्य बोलूंगा।

बालक मोहन अंधेरे मे कहीं जाते हुए डरता था। घर में भी भूत, प्रेत, चोर और सांप से वह डरता था। इसलिए रात के समय भी दीया जला रखकर ही वह योया करता था। उसके घर में रंभा नामकी एक नौकरानी थी। उसने मोहन को इस प्रकार डरते हुए देखकर एक दिन कहाः 'राम का ना ले। जो राम का नाम लेता है, उसका बाल भी बांका नहीं होता है। राम जिसके साथ हैं, उसे डर किस बात का? मोहन के मन में यह बात जम गई। वह राम का नाम जपने लग गया।

बड़े होने पर गांधीजी मे राम के प्रति श्रध्दा इतनी बढ़ गई कि जीवन के अंतिम समय में भी राम का नाम उनकी जीभ पर था।

गांधीजी के पिता करमचंद गांधी को लोग कबा गांधी कहते थे। कबा गांधी पहले पोरबंदर के राजा के यहां दीवान थे। फिर वे राजकोट के राजा के दीवान बने। राजकोट में उनके यहा उनके मुसलमान और पारसी मित्र आया करते थे और अपने-अपने धर्म की बातें किया करते थे। बालक मोहन पिता की सेवा में रहता था और धर्म की बातें सुना करता था। इसी कारण सभी धर्मो के प्रति उसके मन में प्रेम पैदा हुआ।

एक बार मोहन की पाठशाला का निरीक्षण करने के लिए एक बड़े अधिकारी आए। उन्होंने कक्षा के लड़कों को कई अंग्रेजी शब्द लिखवाए। मोहन ने एक शब्द की वर्तनी गलत लिखी इसलिए उसके शिक्षक ने उसे चुपके से इशारा किया कि वह पास के लड़के की स्लेंट में देखकर अपनी गलती सुधार ले: पर मोहन ने ऐसा नहीं किया। फल यह हुआ कि दूसरे लडकों के सभी शब्द सही निकले और मोहन अकेला ही ठोट साबित हुआ। मोहन ने मन में सोचाः 'गलती आए तो भले आए; पर चोरी कैसे की जा सकती है?'

ऐसा था मोहन सत्य का प्रेमी। उसका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। उसका जन्म गुजरात के समुद्र के किनारे पोरबंदर नाम के नगर में संवत् 1925, भाद्रपद कृष्ण द्वादशी, दो अक्टूबर सन् 1869 के दिन हुआ था। बड़े होकर उन्होंने ऐसे उत्तम काम किए कि आज भी सारी दुनिया भगवान् इसु और बुध्द की भांति 'महात्मा गांधी' कहकर उन्हें याद करती है!

गांधीजी हमारे भारत के राष्ट्रपिता हैं। चर्खाद्वादशी के नाम से हम आज भी गांधीजी का जन्मदिन मनाते है।

उन दिनों हमारे देश पर अंग्रेज राज्य करते थे। एक दिन एक लड़के ने मोहन से कहाः 'अंग्रेज मांस खाते हैं, इसलिए इतने जबरदस्त हैं और हमारे ऊपर शासन कर रहे हैं। हम भी मांस खाएं तो इन्हें हरा सकते हैं।

मोहन को यह बात ठीक लगी: पर उसके घर में तो सभी शुध्द शाकाहारी थे। इस कारण उसने छिपकर मांस खाया। पहले उसने यह बात गुप्त रखी; पर बाद में उसका मन उसे कचोटने लगा कि ऐसा करके मैं अपने माता-पिता के साथ ही कपट कर रहा हूं। माता-पिता से कपट करने के लिए पूठ बोलना पड़े, यह तो मोहन के लिए बहुत खराब बात थी। इस कारण उसने मांस खाना छ़ेड दिया।

कुसंगति के कारण बीड़ी पीने की लत का भी मोहन शिकार हो गया था; पर बीड़ी और मांसाहार के लिए पैसों की जरूरत पड़ती थी। इसके लिए या तो चोरी करनी पड़े या फिर उधार लेना पड़े। इस तरह पच्चीस रुपयों का कर्ज हो गया। फिर मोहन ने अपने बड़े भाई के हाथ के सोने के कड़ें में से टुकड़ा काटकर और उसे बेचकर कर्ज चुकाया।

कर्ज तो चुका दिया; पर मोहन के मन में उद्वेग बना रहा। उसने एक पत्र लिखकर अपने पिता को दिया। जिसमें उसने अपने अपराधें के प्रति पश्चाताप प्रकट किया था। पिता उन दिनों बीमार थे। पत्र को पढ़कर वे कुछ भी बोल न सके और एक लंबे निश्वास के साथ उन्होंने पत्र फाड़ डाला।

यह देखकर मोहन फूट-फूट कर रो पड़ा। रोने से उसका दिल साफ हो गया। उस दिन से ही उसका सच बोलने का निश्चय और भी अधिक दृढ़ हो गया।

फिर उसी दिन से मोहन ने पिता की सेवा-चाकरी करनी शुरू की; पर पिता अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहे।

मोहन को केवल सोलह वर्ष का छोड़कर उन्होंने सदा के लिए आंखें बंद कर लीं।

इसके बाद मोहन ने मेट्रिक की परीक्षा पास की और कुछ समय तक वह भावनगर के कॉलेज में पढ़ा। फिर उसके बड़े भाई ने उसको विलायत पढ़ने के लिए भेजने का निश्चय किया। उस समय मोहन की माता पुतली बाई ने मोहन से कहाः 'तू मेरे सामने प्रतिज्ञा कर 'मै मांस नहीं खाऊंगा, मदिरा नहीं पीऊंगा और सुसंगति में पड़कर गलत मार्ग नहीं अपनाऊंगा।' मोहन ने इसी तरह की प्रतिज्ञा की। फिर माता ने उसे विलायत जाने की आज्ञा दी।

गांधीजी विलायत गए। उस समय उनकी उम्र उन्नीस वर्ष की थी। विलायत में उनको खाने-पीने की तकलीफ पड़ी, पर गांधीजी ने इसकी कोई परवाह नहीं की। वहां रहकर उन्हेंने लेटिन और फ्रेंच भाषाएं पढ़ीं और फिर तीन वर्ष के बाद बेरिस्टर बनकर वे वापस भारत लौट आए। बंबई में जहाज से नीचे भारत की धरती पर कदम रखते ही उनका मन हर्ष से भर उठा। वे सोच रहे थे कि मैं माता से कहूंगाः 'मां, मैंने तेरे सामने जो प्रतिज्ञा की थी, उसका मैंने अच्छी तरह पालन किया है।' पर वहां तो उनको सबसे पहला समाचार माता की मृत्यु का ही सुनाया गया! उनकी आंखें में आंसू छलछला आए; पर उन्होंने अपने मन को मजबूत रखा।

फिर गांधीजी ने राजकोट में वकालत शुरू की। इसी बीच ई. सन् 1893 में दक्षिण अफ्रीका में बहुत बड़ा व्यापार करनेवाली एक गुजरात की मुसलमान फर्म की तरफ से गांधीजी को वकील बनकर मुकदमा लड़ने का निमंत्रण मिला।

दक्षिण अफ्रीका के गोरे अंग्रेज लोग भारतीयों को 'कुली' कहते थे और बात-बात में उनका अपमान किया करते थे। कुछ ही दिनों में गांधीजी को भी इसका अनुभव हो गया। वे एक दिन रेल के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठकर डरबन से प्रिटोरिया जा रहे थे। वहां रास्ते में एक अंग्रेज उस डिब्बे में चढ़ा। डिब्बे में भारतीय को देखकर उसने शिकायत की कि इस कुली को इस डिब्बे में बिठाओ।

गांधीजी के पास प्रथम श्रेणी का टिकट था, फिर भी रेल के सिपाहियों ने उनका सामान बाहर निकालकर और धक्के मारकर उनको नीचे उतार दिया। रात भर गांधीजी सर्दी में ठिठुरते हुए वहीं बैठे रहे। उन्होंने सामान की भी छुआ तक नहीं।

इस एक घटना ने गांधीजी के जीवन की दिशा को ही बदल दिया। उन्हेंने निश्चय किया कि भारतीयों पर गोरे लोग जो अत्याचार करते हैं, चाहे प्राण ही क्यों न चले जाएं, इसका डटकर हमें मुकाबला करना चाहिए। गांधीजी के इसी निश्चय में से आगे चलकर क्रान्ति के एक नये प्रकार 'सत्याग्रह' ने जन्म लिया।

दूसरे दिन सबेरे गांधीजी ट्रेन से चार्ल्स टाउन आए। वहां से वे जोहानिसबर्ग जाने के लिए शिकरम नाम के एक वाहन में बैठे पर गोरों ने उनको शिकरम के बाहर वाहन हांकनेवाले के पास बिठाया। शिकरम आधे रास्ते पहुंचा होगा कि एक गोरे ने कहाः 'यहां से उठ और मेरे पैरों के पास यह गंदा थेला पड़ा है, उस पर बैठ।' गांधीजी ने बैठने से इनकार कर दिया तब अंग्रेज गोरे ने गांधीजी को तमाचे मारन शुरू किया और फिर हाथ से खींचकर उन्हें उठाने लगा। उस समय शिकरम में बैठे हुए अंग्रेज गोरे बीच बचाव के लिए आए, तब कहीं जाकर उसने गांधीजी को छोड़ा और उनको अपनी जगह पर बैठा रहने दिया।

दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की कैसी खराब हालत थी, इसका पूरा खयाल अब गांधीजी को आ चुका था। उन्होंने प्रिटोरिया में भारतीयों की एक सभा आमंत्रित की और उसमें उन्होंने सभी को संगठित होने के लिए कहा गांधीजी का यह सबसे पहला सार्वजनिक भाषण था।

गांधीजी जिस मुकदमे के लिए अफ्रीका गए थे, उसका उन्होंने आपस में समझौता करवा दिया। इस कारण उनकी प्रतिष्ठा बढ़ गई। इसी प्रकार उन्होंने कई और लोगों को भी सहायता प्रदान की। इस तरह अफ्रीका में उनको तीन वर्ष बीत गए।

सन् 1896 में गांधीजी भारत आए। भारत आकर उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की कैसी दयनीय स्थिति है, इसकी चर्चा की। फिर अपनी पत्नी कस्तूरबा और पुत्रों को लेकर वे वापस अफ्रीका गए। इस बार गोरे अंग्रेज पहले से ही गांधीजी के विरुध्द रोष से भरे हुए थे। उन्होंने समाचार पत्रों में इस प्रकार छपवाया था कि गांधी ने भारत में हमको बुरी तरह बदनाम किया है। इससे उन्होंने यह निश्चय कर रखा था कि गांधी को अफ्रीका की धरती पर कदम ही नहीं रखने देना। यदि कदम रखे भी तो उसे बराबर मजा चखाना।

डरबन के बदरगाह पर गांधीजी जैसे ही जहाज पर से उतरे वैसे ही कई बदमाश गोरों ने उन पर हमला कर दिया और उनको लातों और मुक्कों से मारना शुरू किया। गांधीजी गोरों की मार से मूर्च्छित जैसे हो गए और जमीन पर गिरते-गिरते उन्होंने एक पास के घर की खिड़की की जाली पकड़ ली।

इसी बीच एक पुलिस के बडे अधिकारी की पत्नी उधर से होकर गुजर रही थी। वह गांधीजी की सहायता के लिए दौड़ पड़ी और अपने छाते को खोलकर उसने गांधीजी की रक्षा की।

अफ्रीका की सरकार ने उन बदमाश गोरों को दंड देना चाहा; पर गांधीजी ने किसी के भी विरुध्द शिकायत करने से इनकार कर दिया। गोरे अंग्रेजों पर गांधीजी की इस सहिष्णुता का अच्छा प्रभाव पड़ा।

सन् 1906 मे ट्रान्सवाल की सरकार ने यह नियम बनाया कि सभी भारतीय स्त्री-पुरुष और बच्चे अपने दोनों हाथों की दसों अंगुलियों की छाप देकर सरकारी कार्यालय में अपना नाम लिखवाएं और फिर अधिकार-पत्र को सभी भारतीय हमेशा अपने साथ रखें; नहीं तो उन्हें दंड, जेल या देश-निकाले की सजा दी जाएगी!

गांधीजी ने कहाः दसों अंगुलियों की छाप तो अपराधियों की ली जाती है। ऐसा कहीं नियम हो सकता है? सभी इस 'काले कानून' का विरोध करो। ऐसा करने पर सरकार हमारे ऊपर अत्याचार करे तो भी हमें शांत रहना चाहिए और प्रतिकार में हिंसा नहीं करनी चाहिए! बड़ी प्रसन्नता के साथ जेल जाना चाहिए और जेल में तनत़ेड मेहनत मजदूरी कराएं तो भी करनी चाहिए। किसी से भी डरना नहीं चाहिए और सत्य के मार्ग पर डटे रहना चाहिए।

इसीको 'सत्याग्रह-संग्राम' कहते हैं। लोगें ने गांधीजी की बात मान ली। वे रजिस्टर में अपना नाम लिख्वाने नाहीं गए। सरकार ने गांधीजी को और उनके साथ और भी कई लोगों को जेल में डाल दिया; पर उससे लढ़ाई बंद नहीं हुई। अंत में सरकार ने गांधीजी के साथ समझौता किया कि यदि भारतीय एकबार अपनी इच्छा से नियम के अनुसार अपने नाम आदि लिख्वा देगे तो सरकार इस कानून को रद्द कर देग।

यह समझौता कई लोगों को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने गांधीजी को डरपोक कहा। उनमें मीर आलम करके एक पठान था। बादे के मुताबिक गांधीजी सरकारी कार्यालय में अपनी अंगुलियों की छाप देने के लए जा रहे थे, वहां रास्ते में उसने गांधीजी के सिर पर लाठी का प्रहार किया। गांधीजी लाठी की मार से मूर्च्छित होकर गिर पड़े। उनकी जब मुर्च्छा दूर हुई तब वे एक जनजान अंग्रेज के घर में पड़े थे। मूर्च्छा दूर होते ही उन्होंने सब से पहले मीर आलम के समाचार पूछे और कहाः मूझे अस पर अभियोग नहीं लगाना है। मैं उसे क्षमा करता हूं।'

फिर उन्होंने सरकारी अधिकारी को बुलाकर अपनी अंगुलियों की छाप देकर अधिकार पत्र निकलवाया।

इस तरह गांधीजी ने स्वयं को आपत्ति में डालकर भी समझौते की शर्त का पालन किया; पर सरकार अपने वचन से मुकर गई। उसने 'काला कानून' रद्द करने से इनकार कर दिया।

गांधीजी ने घोषणा कीः 'सत्याग्रह फिर शुरू! अधिकार-पत्र जलाकर खाक कर दो।

हजारों अधिकार पत्र खुले आम जला दिए गए। गांधीजी को डरपोक कहनेवाले अब उन्हें बहादुर कहने लगे।

दक्षिण अफ्रिका की सरकार ने अपने यहां बसनेवाले हर भारतीय पर कर लगा दिया था। इस तरह के सभी इत्याचारों को दूर करने के लिए ही गांधीजी ने सत्याग्रह प्रारंभ किया था।

गांधीजी को फिर सरकारने जेल में डाल दिया। जेल में उनको प्रतिदिन नौ घंटो तक कठोर मजदूरी करनी पड़ती थी। हाथों में छाले पड़ जाते थे और उनसे पानी बहने लगता था। ऐसी तनतोड मेहनत भी वे बड़ी प्रसन्नता के साथ करते थे। सिपाही उनसे सामान उठवाते और न्यायालय में ले जाते समय हथकड़ियां पहनाते थे।

सत्याग्रह संग्राम काफी लंबे समय तक चला। इसके लिए गांधीजी को बार बार जेल में जाना पड़ता था। इस कारण उन्होंने वकालत छोड़ दी और तभी से उन्होंने अपना सारा जीवन लोक सेवा के लिए ही समर्पित कर दिया।

कोट, पेंट और टाई पहनना छोड़कर उन्होंने लुंगी और सादा कुर्ता पहनना और नंगे पांव ही रहना शुरू कर दिया। उन्ही दिनों सरकार ने यह घोषणा की कि हिंदू, मुसलमान और पारसी विधि के अनुसार हुए विवाह नियमानुसार नहीं माने जाएंगे। यह सुनकर कस्तूर बा ने गांधीजी से कहाः 'इसके विरुध्द सत्याग्रह करना ही होगा। सत्याग्रहियों में मेरा नाम सबसे पहले लिख लिजिए।

सत्याग्रहियों की पहली टुकड़ी का नेतृत्व कस्तूर बाने किया और वे इस कारण जेल में गईं। उनके साथ और भी कई स्त्रियां जेल में गई थीं।

दसों अंगुलियों की छाप देकर अधिकारपत्र प्राप्त करना जरूरी था। उसकें बिना ट्रान्सवाल में प्रवेश करना मना था। उस मानाई हुक्म का भंग करके गांधीजी ने ट्रन्सवाल में कूच करने की घोषणा कर दी। सत्याग्रह की उस कूच में कुल मिलाकर छ हजार स्त्री-पुरुष और बालक थे। सभी बिना अधिकार पत्रवाले थे। सभी के शरीर पर केवल साधारण वस्त्र थे और ओढने के लिए केवल एक कंबल था। जब सभी एक साथ निकल पड़े तब लोग उन्हें चकित होकर देखते ही रह गए। सबसे पहले गांधीजी को गिरप्तार किया गयाः पर इससे कूच रूकी नहीं। सत्यार्ग्राहयों पर लाठियां बरसाई गईं, उन्हें खूब मारा गया; पर इससे तो सत्याग्रहियों का जोश और भी अधिक बढ़ गया और देखते ही देखते सरकार की जेलें भर गईं। सरकार बेचैन हो उठी। अंत में भारतीय अहिंसक सत्याग्रहियों की विजय हुई। सरकार ने हर एक व्यक्ति पर जो कर लगाया था, उसे तथा उसके साथ ही 'काले कानून' को भी रद्द कर दिया गया।

भारतीय विवाहों को नियमानुसार मान्यता दी गई और इसी तरह भारतीयों की दूसरी भी कई मांगे सरकार ने स्वीकार कर लीं।

अफ्रिका के जेल-जीवन के बाद कस्तूर बा बीमार पड़ गई थीं। अस्पताल के डॉक्टर ने कहा कि इन्हें मांस का सोरबा देना जरूरी है, नहीं तो ये मर जाएंगी। इसके लिए जब कस्तूर बा से पूछा गया तब उन्होंने साफ इनकार कर दिया। गांधीजी ने उनका समर्थन किया। तब डॉक्टर ने गुस्से होकर कहाः ' तो निकल जाओ यहां से ! यहां रहना हो तो मैं कहूंगा वैसा करना होगा!'

कस्तूर बा का शरीर सूखकर कांटा हो गया था। स्टेशन दूर था। वर्षा हो रही थी। गांधीजी का आश्रम उस जगह से काफी दूर जंगल में था। कुछ दूर रिक्षा में, कुछ दूर खुद पीठ पर उठाकर तो कुछ दूर झोले में लिटाकर गांधीजी कस्तूर बा को अपने आश्रम ले गए। इस बीमारी में गांधीजी ने कस्तुरबा को नमक और दालें छोड़ देने के लिए कहा। इसके उत्तर में कस्तूरबाने कहाः 'दाले और नकम छोंड़ने के लिए आपको भी कहा जाए तो आप भी इन्हें नहीं छोड़ सकेंगे।

तुरंत ही गांधीजी ने कहाः ' तो आज से ही मोने एक वर्ष के लिए दोनों छोड़ दिए।'

फिर कस्तूर बा को काफी पछतावा हुआ। उन्होंने रोते हुए कहाः 'मैं छोड़ रही हूं। आप नाहीं छोड़ें। पर गांधीजी अपने वचन पर अटल रहे। एक नहीं, पर दस वर्ष तक उन्होंने अपनी इस प्रतिज्ञा का पालन किया।

इसके बाद कस्तूरबा का स्वास्थ्य धीरे-धीरे अच्छा होता गया और फिर वे पूरी तरह स्वस्थ हो गईं।

अफ्रीका में इक्कीस वर्ष बिताकर गांधीजी जब 1915 में भारत लौटे तब उन्हें बबई में 'गेट वे ऑफ इण्डिया' के सामने जहाज से उतारा गया। ऐसा सम्मान केवल वायसराय को ही दिया जाता था। बारह महिनोंतक गांधीजी देश में चारों तरफ घूमे। एक बार एक वकील ने आकर कहाः 'मेरे योग्य कोई काम हो तो कहें!' गांधीजी उस समय रसोई घर में अनाज साफ कर रहे थे। उन्होंने कहाः 'लिजिए, यह अनाज साफ कीजिए!' वकील समझ गए कि ये नेता कुछ और ही तरह के हैं।

वकील इकठ्ठे हों तब गांधीजी के विचित्र रहन-सहन का मजाक उड़ाएं।

इसके बाद गांधीजी ने अहमदाबाद में आश्रम की स्थापना की। आश्रम का नाम रखा गया 'सत्याग्रह-आश्रम'। सभी के साथ गांधीजी भी आश्रम में छोटा बड़ा कैसा भी काम हो, किया करते थे।

उनमे से एक वकील बहुत तेज था; पर बना कुछ ऐसा कि कुछ ही समय में वह गांधीजी की बहादुरी देखकर इस तरह मुग्ध हो गया कि वह उनका अनुयायी हो गया। फिर तो गांधीजी के नेतृत्व में भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में वह कई बार जेल में गया और सारी दुनिया में प्रसिध्द हो गया। वह वकील और कोई नहीं पर स्वयं सरदार वल्लभ भाई पटेल थे।

ई. 1916 का वर्ष था । काशी में 'बनारस हिंदूविश्वविद्यालय' के शिलान्यास के समय भव्य समारोह का आयोजन किया गया। दिल्ली से बड़े लाट (वायसरॉय) साहब पधारे हूए थे। कई राजा-महाराजा हीरे-मोतियों के हार पहनकर बैठे हुए थे। सभी ने भारत की गरीबी के गीत गाए और गरीबों के उध्दार की बातें कीं। उस अवसर पर गांधीजी ने भारत के विषय में अपना पहला भाषण दिया और वह भी अंग्रेजी में। पहले ही वाक्य ने जैसे बारूद में आग डाल दी होः 'यह बड़े शर्म की बात है कि मुझे अपने ही देशवासियों के सामने विदेशी भाषा में बोलना पड़ रहा है।'

फिर बारूद में और आग डालते हुए कहाः 'राजा-महाराजा, आप एक ओर तो गरीबी दूर करने की बातें करते हैं और दूसरी ओर हीरे-जवारात और ठाठ-माठ को पसंद करते हैं! पर आप लोग जब तक इस ठाठ-माठ और हीरेजवाहरातों के ट्रस्टी नहीं बन जाएंगे तब तक देश का उध्दार नहीं होगा!'

इस तरह फिर और लगातार बारूद में आग डालते ही गए।

'देश किसानों के द्वारा ही मुक्त हो सकेगा, नाहीं कि धनवान सेठ-साहुकारो या वकीलों द्वारा। हम केवल इwश्वर का ही डर रखे। फिर राजा-महाराजा या वायसरॉय या राजा ज्योर्जभी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे।'

और फिर आग में घी की अंतिम पूर्णाहुति देते हूए बोलेः 'भारत के हित के लिए मुझे अंग्रेजों को यहां से हटाना उचित लगेगा तो उन्हें यहां से चले जाने को कहते हुए मैं एक पल की भी देर नहीं करूंगा और इस बात को लेकर मरना पड़े तो भी हंसते-हसते सबसे पहले मैं अपनी बलि दूंगा।

देश में एक नई हवा फैल गई। लकवे के मरीज को मानों नई शक्ति मिल गई हो। लोगों लगा कि हमारा सहायक आ गया है।

अहमदाबाद के आश्रम मे एक अछूत परिवार रहने के लिए आया। गांधीजी ने एक अछूत की लक्ष्मी नाम की लड़की को अपनी पुत्री की तरह माना।

इस कारण रूढिचुस्त हिन्दुओं में भारी हलचल मच गई। लोगों ने आश्रम को सहायता देना बंद कर दिया। गांधीजी ने कहाः 'मैं आश्रम बंद करके अछूतों के बीच जाकर रहूंगा।'

इसी बीच एक अनजान आदमी ने आश्रम में आकर गांधीजी को तेरह हजार रुपये दिए। जिससे आश्रम बंद होते-होते बच गया।

बिहार के किसानों से वहां के अंग्रेज जबरदस्ती नील की खेती करवाते थे और बदले में उनकों पूरा मुआवजा भी नहीं देते थे। किसानों ने गांधीजी से यह बात कही। गांधीजी इसकी जांच के लिए चंपारन गए तो गोरे कलेक्टर ने उन्हे आदेश दिया 'आज ही तुम यहांसे चले जाओ, नहीं तो तुमको सजा दी जाएगी।'

गांधीजी ने कहाः 'मैं वापस नहीं जाऊंगा। सजा करनी हो तो खुशी से करो!'

सरकारी आदेश का विनय भंग अर्थात् सत्याग्रह की यह पहली घटना थी। सारा देश स्तब्ध हो गया! सभी ने कहाः 'यही एक सच्चा आदमी निकला, जिसने गोरे कलेक्टर को भी सुना दिया। कि तुझमे जो हो सो कर ले! मैं अपने ही देश में अपने ही देशबंधुओं के सूख-दुःख के समाचार जानने के लिए जा रहा हूं। बीच में रोकनेवाला तू कौन होत है?

दूसरी ओर कलेक्टर घबराया, गवर्नर घबराया। किसानों की विजय हुई। सारा देश एक नये उत्साह से भर गया। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि अजेय अंग्रेज सरकार को भी ललकारा जा सकता है!

गांधीजी पूरे भारत में घूम चुके थे। उन्होंनें जगह-जगह पर भयंकर गरीबी देखी थी। एक बार एक छोटे से गांव में स्त्रियों के मैले कुचैले कपड़े देखकर कस्तूर बा से कहाः 'इन लोगो को कपडे धोना और साफ रहना सिखाओ!'

कस्तुर बाने उन स्त्रियों से इस बारे में बातचीत की। तब एक स्त्री उन्हें अपनी पोंपड़ी में ले गई और बोलीः 'देखिए, कहीं है, संदूक या अलमारी? मेरे पास पहनने के लिए जो कुछ पुंजी है, वह यही एक साड़ी है जो मैने पहन रखी है। मैं इसे कैसे घो सकती हूं।'

कस्तूर बाने गांधीजी से यह बात कही, तब गांधीजी हा हृदय वेदना से भरा उठा। गांधीजी की वेश-भूषा सादी ही थी। अफ्रीका से आए थे तब काठियावाड़ी साफा और बंडी पहनते थे।

फिर खादी का पब्बा, टोपी और धोती पहनने लगे। फिर इनको भी छोड़कर उन्होंने केवल एक घुटनों से भी ऊंची धोती पहननी शुरू की। भारत के प्रत्येक व्यक्ति को जब तक अपने पूरे अंग ढंकने के लिए वस्त्र न मिल जाएं तब तक वे कैसे पूरे शरीर को ढंक सकें, उतने वस्त्र पहन सकते हैं।'

अहमदाबाद में वस्त्र की कई मिलें हैं। उनमें हजारों मजदूर काम करते हैं; पर उनका वेतन उन दिनों कम था। इस कारण मजदूरें ने वेतन बढ़ाने की मांग की और गांधीजी के नेतृत्व में हड़ताल की घोषणा कर दी। मिल मालिक अपने निश्चय पर अड़े रहे। हड़ताल लंबी चली। मजदूर भूखें मरने लगे। गांधीजी को लगा कि मजदूर अपनी प्रतिज्ञा से विचलित हो जाएंगे, इसलिए उन्होंने उनकी प्रतिज्ञा को सुदृढ़ करने के लिए उपवास शुरू किए। जिससे तीन दिनों में ही मिलमालिक और मजदूरों के बीच समझौता हो गया।

यूरोप में प्रथम विश्वयुध्द पूरे ज्वार पर था। पहले जब कभी सरकार पर आपत्ति आई तब गांधीजी ने उस सहायता दी थी। इस तरह की सहायता के बदले सरकार ने गांधीजी को सम्मान के साथ कई पदक भी प्रदान किये थे। इस बार भी गांधीजी ने गांवों में घूम-' घूमकर लोगों को सेना में भर्ती होने के लिए प्रेरित किया। इसके लिए वे गांवों में इतने घूमे कि वे बचेंगे नहीं। दूध पीना जरूरी था, पर गायों की सम्हाल अच्छी तरह से नहीं रखी जात है, इस कारण कई दिनों से उन्होंने गाय का दूध पीना छोड़ दिया था। अंत में इस बीमारी में उन्होंने बकरी का दूध पीना स्वीकार कर लिया।

प्रथम विश्वयुध्द समाप्त हुआ। जर्मनी हारा और अंगेज जीते। गांधीजी ने सोचा कि अब अंग्रेज सरकार भारत को स्वतंत्रता देने की दिशा में आगे बढ़ेगी; पर सरकार ने तो एकदम इसके विरुध्द आचरण किया। उसने भारतीयों के दमन के लिए नया नियम बनाया।

गांधीजी का स्वास्थ्य अच्छा नहीं था तो भी वे मद्रास गए। वहां उन्हें एकाएक स्वप्न में ऐसा लगा कि इस काले नियम के विरोध में पूरे देश को चाहिए कि वह एक दिन की हड़ताल करे और उपवास करे। इसके लिए दिन भी निश्चत हो गया छ; अपैंल सन् 1919। एकाएक मानों पूरा देश जाग उठा हो। किसी ने कभी न सुनी हो वैसी पूरे देश में हड़ताल पड़ी दुकाने कारखाने कार्यालय सभी उस दिन बंद रहे!

बंबई में हजारों लोगों ने समुद्र में स्नान करके गांधीजी के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला। 'वंदेमातरम्' और 'भारतमाता की जय' की गर्जना से आसमान गूंज उठा। गांधीजी ने 'हिन्द स्वराज' नाम की पुस्तक लिखी थी। उसे भी सरकार ने जप्त कर रखी थी। उस पुस्तक को भी उस दिन मुक्त रूप से बेचकर और खरीदकर लोगों ने सरकारी आदेश का सविनय भग किया।

इसके दूसरे ही दिन गांधीजी पंजाब के लिए निकल पड़े। वहां रास्ते के बीच में ही सरकार ने उन्हें रोक लिया।

इस खबर के फैलने के साथ ही लोग काफी उत्तेजित हो उठे, अहमदाबाद में भारी दंगा हो गया। गांधीजी तुरंत अहमदाबाद आए और उन्होंने लोगों को फटकारा और कहा कि ऐसे सत्याग्रह नहीं होता है। इसके प्रायश्चित के रूप में गांधीजी ने तीन दिन के उपवास किए।

उन दिनों पंजाब की हालत सबसे ज्यादा खराब थी। अमृतसर के जलियांनावाला बाग में एक सार्वजनिक सभा थी। हजारों स्त्री-पुरुष और बालक सभा में हाजिर थे। उस समय गोरा अफसर जनरल डायर सेना लेकर आ पहुंचा। बाहर निकलने का एक ही रास्ता था। उसे ही रोककर वह खड़ा हो गया। उसने सेना को गोली चलाने का आदेश दे दिया। जब तक सेना के पास गोलियां रहीं तब तक गोलीबार चालू ही रहा। इसमें 379 लोग मारे गए और 1137 घायल हुए। इस निर्दोष हत्याकांड से चारों ओर भय और आतंक फैल गया। गांधीजी वहां जा पहुंचे। उनको देखकर लोगें मे फिर हिम्मत आ गई।

स्वतंत्रता के लिए लड़नेवाली देश की संस्था का नाम था ' इंडियन नेशनल कांग्रेस' अर्थात् 'भारतीय राष्ट्रीय महासभा'।

कर्मवीर गांधीजी अब 'महात्मा गांधी' के नाम से प्रसिध्द हो चुके थे। देश के वे सर्वोच्च नेता थे। अब गांधीजी ने स्वराज्य संग्राम की घोषणा कर दी। उन्होंने कहाः 'सरकार के साथ असहकार करो और सविनय कानून भंग करो। सरकारी नौकरियां छोड़ दो, कार्ट छ़ेड दो, सरकारी उपाधियां वापस कर दो, विदेशी वस्त्र की होली करो, सरकार को कर भरने से इनकार कर दो और ऐसा करते हुए जेल जाना पड़े तो मर जाओ!

जगह जगह पर सभाएं होने लगीं। जुलूस निकलने लगे 'और-विलायती कपड़ों की होलयां सुलगाई जाने लगीं। विदेशी वस्त्राW के स्थान पर काथ से काते हुए सुत की, हाथ से बुनी हुई खदी आई। खदी की टोपी देशभक्ति का प्रतीक बन गई। वकीलों ने वकालत करना छोड दिया। सरकारी स्कूलों के स्थान पर राष्ट्रीय पाठशालाएं खुलीं। लोग आपस के पगड़े अपने घरों में ही निबटाने लगे।

उन दिनों विलायत के युवराज भारत आए हुए थे। लोगों ने उनका बहिष्कार किया। वे जहां बए वहां हड़ताल! सड़के सुनसान, गलियां सुनसान! सरकार मारे गुस्से के पागल हो उठी। उसने राष्ट्रीय नेताओं को जेल ठंस दिया।

गांधीजी सुरत जिले के बारडोली तहसील से पूरे देश में सत्याग्रह का प्रारंभ करनेवाले थे। पूरा देश मारें उत्साह के थिरक रहा था। उन्हीं दिनों उत्तर प्रदेश के चौरीचौरा गांव में पुलिस उकसाने से गुस्से हुए लोगों ने उपद्रव मचाकर कई पुलिसवालों को जीवित ही जला दिया। इससे गांधीजी को बहुत दु:ख हुआ। उन्हें लगा कि लोग अभी तक सत्याग्रह के लिए योग्य नहीं है। इसलिए उन्होंने सत्याग्रह-संग्राम बंद करने की घोषणा की और प्रायश्चित्त के लिए पांच दिन का उपवास किया।

इसके बाद सरकार ने गांधीजी को गिरप्तार कर लिया। अहमदाबाद के न्यायालय में अंग्रेज न्यायाधीश के सामने गांधीजी पर अभियोग चलाया गया। गांधीजी जब न्यायालय में आए तब सभी ने खड़े होकर उनका सम्मान किया। गांधीजी ने स्वयं को किसान और बुनकर बताकर कहा: 'में अपराधी होना स्वीकार करता हूं; पर सरकार की दष्टि से जो अपराध है, वह मेरे लिए धर्म है। मेरे इस अपराध के लिए मुझे सरकार चाहे जो दंड दे!

न्यायाधीश ने उनको छ: वर्ष की जैल की सजा दी। गांधीजी फिर वहां से यरवडा की जेल में भेजे गए। यह घटना सन् 1922 की है।

दो वर्ष के बाद गांधीजी जेल में बीमार हो गए इस कारण सरकार ने उनको छोड़ दिया।

गांधीजी ने बाहर आकर देखा, देश पर निराशा के बादल छाये हुए थे। हिन्दु-मुसलमानों के बीच दुश्मनी और अविश्वास की दीवारें खड़ी हो गई थी। इस लिए किसी साधारण-सी बात को लेकर भी प्राय: kाढाwमी दंगे हो जाया करते थे। लोगों की शान ठिकाने लगाने के लिए गांधीजी ने दिल्ली में इक्कीस दिन के उपवास किए। रात और दिन उनके प्रत्येक रोम से प्रार्थना के स्वर फुटते रहे:

'रघुपति राघव राजा राम,

पतित पावन सीताराम!

इसके बाद गांधीजी ने जगह-जगह घूम कर हिंदू-मुसलमानों की एकता के लिए, अस्पफश्यता निवारण के लिए, अछूतोद्धार के लिए और खादी-चर्खे के प्रचार के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया।

विलायत की अंग्रेज सरकार इतना तो समझ चुकी थी कि किसी न किसी तरह भारत को संतुष्ट करना ही होगा किंतु भारत उनके अधिकार से निकल जाए यह भी उसे पसंद नहीं था। इसलिए उसने विलबनीति अपनाई और हिंदू-मूसलमानों के बीच चलनेवाले पगड़े से भी लाभ उठाना शुरू किया। क्या करना चाहिए? इसकी जांच-पड़ताल के लिए उसने एक समिति बनाई; पर उसमें भी एक भी भारतीय को नहीं रखा गया। इस समिती को 'साइमन कमिशन' नाम दिया गया।गांधीजी ने कहाः 'नहीं चाहिए ऐसी समिति! हम इसका बहिष्कार करेंगे।

बस फिर क्या था! पूरे देश में हड़ताल और काले पंडे का दौर शुरू हो गया। सारे देश ने बुलंद आवाज से कहाः 'साइमन, वापस नौट जा! '

हुआ भी ऐसा ही। यह कमिशन कुछ भी नहीं कर सका।

इसी वर्ष सरकार ने बारडोली में गलत ढंग से लगान बढ़ा दिया था। इस कारण सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेवृत्व में लोगें ने किसानों की मांगे स्वीकार कर लीं। इस विजय से लोगों में फिर से उत्साह जाग उठा। बारडोली के सरदार अब देश के भी सरदार बन गए।

गांधीजी ने सरकार को बारह महिनों की नोटिस दी कि भारत को किस रूप में स्वराज्य देना है, इसकी स्पष्ट घोषणा की जाए, नाहीं तो हम पूर्ण स्वराज्य की मांग करेंगे। सरकार ने टालमटूल करना शुरू किया। इस कारण लाहोर में पंडित जवाहरलाल नेहरु की अध्यक्षता में कांगेस ने पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया और 31 दिसंबर सन् 1929 के दिन आधीरात के समय स्वतंत्रता का पंडा फहराया गया। फिर गांधीजी ने 26 जनवरी का दिन 'स्वतंत्रता दिन' के रूप में मनाने का आदेश दिया और सत्याग्रहतथा सविनय नियम-भंग के लिए लोगो को तैयार किया।

26 जनवरी का दिन पूरे देश ने बड़े उत्साह से मनाया। जगह-जगह पर प्रतिज्ञाएं ली गई कि 'पूर्ण स्वराज्य' प्राप्त किए बिना हम चैन नहीं लेंगे। उसी दिन से प्रति वर्ष 26 जनवरी का दिन हम आज भी 'प्रजातंत्र' के रूप मे मनाते आ रहे हैं।

फिर गांधीजी ने वायसराय को पत्र लिखाः 'नमक गरीबें की खुराक है, इसलिए नकम पर लगे हुए कर को रद्द कर दे।'

सरकार ने साफ इनकार कर दिया, तो गांधीजी ने फिर से सरकार को लिखाः मैं ब्रिटिश करकार को अभिशाप रूप मानता हूं। मैं नकम का कानून सविनय भंग करना चाहता हूं। मुझे पकड़ना चाहें तो आप पकड़ सकते हैं पर मेरे बाद मेरे पीछे इस काम का भार उठाने के लिए लाखें लोग तैयार हैं।'

12 मार्च, सन् 1930 के दिन जल्दी सबेरे 78 साथियों के साथ गांधीजी ने अहमदाबाद के आश्रम से दांडी नाम के स्थान के लिए पैदल कूच की। उनके हर कदम में हिमालय जैसी दृढ़ता थी। उन्होंने प्रतिज्ञा कीः 'स्वराज्य प्राप्त किए बिना मो आश्रम में फर से कभी कदम नहीं रखूंगा।'

सारा देश की नही, किंतु सारी दुनिया चकित होकर दांडी-कूच को देखती ही रह गई! हजारों स्त्राr-पूरुष गांधीजी के पीछे पीछे चलने लगे।

5 एप्रैल को चौबीसवें दिन 241 मील की दूरी तय कर के गांधीजी सुरत के पास दांडी के समुद्र के किनारे पहुंचे। सारी रात उन्होंने प्रार्थना में बिताई। सबेरे समुद्र में स्नान किया और फिर समुद्र के किनारे से कुदरती नमक उठाया बस, यही नमक का कानून तोडना था इस तरह सारे देश में चारों ओर सविनय कानून भंग के संग्राम का श्रीगणेश हो गया। सारा भारत क्रांन्ति के गगन-भेदी नारों से गूंज उठाः

'भारत माता की जय! '

'इन्कलाब जिन्दाबाद! '

'महात्मा गांधी की जय! '

 

 

 

दांडी से गांधीजी ने सारे विश्व को संदेश भेजाः

'बलवान के साथ सत्य के इस संग्राम में मैं विश्व की सहानुभूति की याचना करता हूं।'

दांडी दि. 5-4-1930 मा. क. गांधी

इसके बाद गांधीजी ने वायसरॉय को चेतावनी दी कि अब हम धारासणा के नमक के सरकारी गोदाम लूटने वाले हैं।

सरकार ने उसी रात गांधीजी को गिरपतार कर लिया। पर इससे धारासणा की योजना अटकी नहीं।

स्वयंसेवकों की टुकड़ियां एक के बाद दूसरी और फिर तीसरी नमक को लूटने के लिए निकलती ही रहीं। पुलिस ने खूब लाठियों की वर्षा की; पर एक भी स्वयं सेवक ने अपने बचाव के लिए मारना तो दूर रहा; पर हाथ तक ऊंचा नहीं उठाया। किसी का सिर फटा, किसी के हाथ-पैर टूटे, कोई मर तक गया! पहली टुकड़ी उसके स्थान पर जा डटी, फिर तीसरी फिर चौथी। एक दिन में ही दो स्वयं सेवक मारे गए और तीन सौ बीस घायल हुए। सारे विश्व के पत्रकार इस अद्भुत संग्राम को देखने के लिए आए थे। सभी चकित होकर देखते ही रह गए।

सारे भारत में जगह-जगह हड़तालें पड़ीं, सभाएं ओर सविनय नियम-भंग के कार्यक्रम तीव्रगति से चलते रहे। सत्याग्रहियों पर घोड़े दुड़वाए जाते थे, लाठीचार्ज और ओलियां तक बरसाई जात थीं। एक लाख व्यक्ति जेल में जा चुके थे। उन्हें रखने के लिए जेलों में जगह तक नहीं थी।

इसलिए बाहर खुले में तार की बाड़ें बनाकर नई जेलें बनवाई गई थीं।

उन दिनें भारत को कितनी सत्ता दी जाए, इस बारे में लंदन में परिषद् बुलवाई थी। जिसका नाम था 'गोलमेज-परिषद् ' पर गांधीजी के बिना सब कुछ सूना था! इसलिए सरकार ने गांधीजी को जेल से मुक्त कर दिया और वायसरॉय ने उनके साथ एक टेबल पर बैठकर संधि की। संधि की शर्त के अनुसार सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया। सभी गिरप्तार व्यक्ति मुक्त कर दिए गए और अंग्रेज सरकार के आदरणीय अतिथि के रूप में गांधीजी विलायत गए। उनके साथ भारत कोकिला सरोजिनी नायडू और पंडित मदनमोहन मालवीय भी 'गोलमेज परिषद्' में भाग लेने के लिए गए थे।

गांधीजी लंदन में सरकार के अतिथि थे, फिर भी उन्होंने एक गरीब मजदूरें के मुहल्ले में मुकाम किया और मजदूरों के साथ खूब हिलमिलकर रहे।

विलायत में भी गांधीजी ने अपनी वेश-भूषा नहीं बदली। ठंडा देश था, फिर भी उन्होंने घुटनों से भी ऊंची धोती और अपने शरीर पर एक ही वस्त्र ओढे रखा। विलायत के राजा और रानी के निमंत्रण पर भी वे इसी वेश भूषा में गए। किसी ने आलोचना के स्वर में कहा कि गांधीजी आप इसी वेशभूषा में ब्रिटन के राजा से मिले थे? पूरे वस्त्र भी पहन कर नहीं गए? तो इसके उत्तर में हंसते हुए गांधीजी ने कहाः 'हम जैसे दो लोग पहन सकें, उतने कपड़े अकेले राजा ने ही पहन रखे थे।'

चाहे कितने भी थके हुए क्यों न हों, आधी रात क्यों न बीत चुकी हो, फिर भी गांधीजी विलायत में भी प्रतिदिन निश्चत चर्खा कातते थे क्योंकि नियम का मतलब है नियम!

84 दिन गांधीजी विलायत में रहे, पर 'गोलमेज परिषद्' का कुछ भी अच्छा पराम नहीं आया। भारत को वास्तव में स्वराज्य देने की सरकार की दानत थी ही नहीं जब-तब हिन्दू-मुसलमान के मतभेद को आगे करके सरकार भारत कें कौमी तनाव बढ़ाती ही रही। आखीर में गांधीजी ने सरकार को साफ शब्दों में सुना दियाः 'आप मुझे अपने घर को स्वामी बनाने को कहते अवश्य हैः पर तिजोरी की चाभी आप अपने पास ही राते हैं और मेरे घर पर सिपाही बिठाए रखते हैं।'

विलायत के बच्चों ने गांधीजी को भारत के बच्चों के लिए ढ़ेर सारे खिलौने दिए थे। गांधीजी वहां सें और कुछ भी नहीं लाए। केवल वे खिलौने ही भारत लेकर आए। गांधीजी को बच्चे बहुत प्यारे थे।

गांधीजी विलायत थे तब सरकार ने भारत में दमन का दौर चलाया था। जवाहरलाल नेहरु जैसे बड़े नेता जेल में थे। इस प्रकार सरकार ने संधि का वचन भंग किया था इसलिए गांधीजी ने फिर से सत्याग्रह शुरू करने की घोषणा कर दी; पर वे सत्याग्रह शुरू करें इसके पहले ही उनको सरकार ने गिरप्तार करके यरवडा की जेल में डाल दिया। गांधीजी के गिरप्तार होने से सत्याग्रह का संग्राम रुका नाहीं, पर वहा और दुगुनी ताकत से आंधी और तूफान की तरह चारों ओर फेला गया।

हिन्दू-मुसलमान विरोध की ही तरह सरकार ने अब अछूत-हिन्दू विरोध खड़ा करके की गंदी योजना बनाई। उसने घोषणा कीः 'अछूतों को हिन्दुओं से अलग गिना जाएगा।'

गांधीजी ने देखा कि यदि ऐसा हो गया तो भारत से अछूत प्रथा कभी दूर नहीं होगी। इसलिए उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाकर घोषणा कीः 'सरकार अपनी इस गंदी योजना को नहीं बदलेगी तो मैं उपवास करके अपनी बलि दे दूंगा।

ठीक निश्चित दिन जेल में गांधीजी ने उपवास शुरू किए। तीन दिन में तो गांधीजी की हालत बड़ी गंभीर हो गई।

पाचवे दिन अछूतो के सबसे बड़े नेता श्री भीमराव आंबेडकर के साथ समझौता हो गया। इस साझौते को सरकार ने भी स्वीकार कर लिया और फिर गांधीजी ने भी उपवास छ़ेड दिए।

फिर गांधीजी ने अछूतों की सेवा के लिए 'हरिजन सेवक संघ' की स्थापना की; पर इस काम को चाहिए उतनी गति नहीं मिली। इस कारण गांधीजी फिर बेचैन हो उठे। इन्ही दिनों एक दिन आधीरात के समय गांधीजी को एक दिव्य स्वर सुनाई दियाः 'उपवास कर! '

गांधीजी ने पूछाः 'कितने दिनके? ' उत्तर मिलाः 'एक्कीस दिन के! '

दूसरे ही दिन सबेरे गांधीजी ने उपवास शुरू कर दिए। यह देखकर सरकार ने उनको छोड़ दिया।

उपवास बिना किसी खास तकलीफ के पूरे हुए। इसका देश पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ा। अस्पृश्यता को देश निकाला मिला। अछूतों के लिए हिन्दुओं के घर और मंदिर खुल गए।

गांधीजी ने फिर वर्धा के पास सेवाग्राम नाकम गांव में एक नये आश्रम की स्थापना की। खादी और चर्खा तो था ही, पर इनके साथ साथ घानी का तेल, हाथ से धानकुटाई करके तैयार किए गए चावल मारे हुए नहीः पर मरे हुए पशुओं के चमड़े के अहिंसक जूते, ऐसी और भी ग्रामोद्योग की कई प्रवृत्तियें का वर्धा के आश्रम में गांधीजी ने श्री गणेश करवाया। शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने उद्योग को अनिवार्य बना दिया। गो-सेवा के लिए उन्होंने 'गा-सेवासंघ ' की स्थापना की और सारे देश में शराब बंदी करने की हिमायत की।

एक दिन सांझ के समय आश्रम में रक्तपित्त के एक रोगी आए। ऐसे रोगी से सभी डरें और उससे दूर-दूर भागें; पर गांधीजी ने उन्हें बड़े आदर के साथ आश्रम में रखा और फिर सेवाशुश्रूषा की और फिर सेवाशुश्रूषा भी कैसी ? गांधीजी स्वयं अपने हाथों से रोगी का रक्त और पीब साफ करें और पट्टी बांधे रोगी की सेवा करते समय हंसी-मजाक भी करें और इस तरह उसका दुःख हलका करें।

चाहे कैसा भी बड़ा काम हाथ में क्यों न हो, उसे छ़ेडकर गांधीजी ऐसे रोगियों की सेवा किया करते थे। एक बार वायसरॉय ने उन्हें बात करने के लिए बुलाया। बात पूरी हुई कि गांधीजी ने कहाः 'अब मुझे आज्ञा दीजिए। मेरे रोगी का समय बरबाद हो रहा है! '

गांधीजी ऐसे करुणामूर्ति थे।

गांधीजी फिर देश में चारो ओर आंधी की तरह घूमने लगे और लोंगो को `िहन्दु मुसलमान, एकता, ' अछूत-सेवा ग्रमोंद्योग, 'शराब- बंदी आदि के बारे में समझाने लगे।

भारत की पश्चिम उद्रार सीमा पर पठानों की बस्ती है। श्री अब्दुल-गफारखान वहां के नेता थे। वे पक्के अहिंसावादी और गांधीजीके भक्त थे। वे आज 'सरहद के गांधी' के नाम से प्रसिध्द हैं। वे गांधीजी को अपने सीमाप्रांत में ले गए।

पठान लड़ाकू कौम है। इसलिए कोई गांधीजी पर हमला न कर बैठे, इस डर से अब्दुलगफार खानने गांधीजी जहां सो रहे थे, उनके आसपास सशस्त्र सिपाही तैनात कर दिए। गांधीजी को जब इस बात का पता चला तब उन्होंने कहाः 'मुझे ये सिपाही नहीं चाहिए। मेरा सिपाही ईश्वर है!'

बहादुर पठानों पर इसका अच्छा प्रभाव पड़ा। सभी बोलेः 'वाह! इस आदमी को खुदा पर कितना भरोसा है! '

गांधीजी ने बिना रक्षकों के सारे प्रांत का दौरा किया और लोगों को अहिंसा तथा सत्य का संदेश सुनाया।

उन दिनों भारत में अनेक छोटी-बड़ी देशी रिसायते थीं। इन देशी रियासतों के राजा अंग्रेजी सरकार के खूंटे से बंधे हुए थे और खूंटे के बल बछड़ा नाचे वैसे मनमानी कर रहे थे।

इन्हीं दिनों राजकोट के ठाकुर ने सरदार वल्लभभाई के साथ एक करार किया और फिर करार को भंग कर दिया

इस बात को लेकर राजकोट में आंदोलन शुरू हुआ। कस्तूर ब ाने कहाः 'राजकोट तो मेरा जन्मस्थान है!' ऐसा कहकर वे राजकोट गई तो ठाकुर ने उनको भी गिरप्तार कर लिया। इसके बाद आंदोलन और भी तेज हो गया। गांधीजी खुद वहां गए और समझौते के लिए प्रयत्न किएः 'पर ठाकुर टस से मस नहीं हुआ। तब गांधीजी ने आमरण उपवास पर उतरने की घोषणा की। गांधीजी का स्वास्थ्य पहले से ही खराब तो था ही; पर उपवास के कारण और भी खराब हो गया। अंत में वायसरॉय ने मध्यस्थी की। जिससे ठाकुर मान गया और गांधीजी ने उपवास छोड़ दिए; पर इसके बाद फिर से करार भंग करके ठाकुर ने गांधीजी की प्रार्थना- सभा में अपने गुंडे भेजकर मारपीठ करवाई।

गांधीजी ने बड़ी निडरता के साथ उन गुंडों को भी अपना मित्र बना लिया । फिर उन गुंडों के ही कंधों का सहारा लेकर गांधीजी प्रार्थना सभा से अपने मुकाम पर वापस लौटे।

सन् 1939 के सिंतबर में फिर से जर्मनी और इंग्लैंट के बीच युध्द की आग भडक उठी। इसी को दूसरा विश्व युध्द कहते हैं। अंगेज सरकार ने भारत को भी इस युध्द की आग में लपेट लिया।

गांधीजी की इच्छा युध्द में भाग लेने की नहीं थी, किंतु कांग्रेस नक एक प्रस्ताव पारित किया कि हम सरकार को युध्द में सहायता करने का तैयार हैं, पर एक गुलाम देश के रूप में नहीं, किंतु एक स्वतंत्र देश के रूप में! अंग्रेज सरकार ने इस बात के लिए इनकार कर दिया। जब गांधीजी के नेतृत्व में व्यक्तिगत सत्याग्रह शुरू हुआ। इसके सबसे पहले सत्याग्रही थे संत आचार्य विनोबा भावे।

इस प्रकार तीस हजार सत्याग्रही जेल में ठूंस दिए गए; पर सरकार ने गांधीजी को गिरफतार नहीं किया।

सन् 1940 में गांधीजी और कस्तूर बा कविवर रविन्द्रनाथ टेगोर के 'शांतिनिकेतन' नामक आश्रम में गए। 'शांतिनिकेतन' अर्थात् 'विश्वभारती विश्वविद्यालय'। यह पंद्रह वर्ष के बाद गांधीजी की कवि रवीन्द्रनाथ टेगोर के साथ मुलाकात थी। रवि बाबू ने अपने हाथों से माला और चंदन अर्पित करके कहाः 'गांधी महाराज, आप हमारे हैं, क्योंकि आप सारे विश्व के हैं।

गांधीजी कविवर को गुरुदेव कहते थे। गांधीजी ने कहाः 'मैं तो यहां गुरुदेव का आशीर्वाद लेने आया हूं।'

ऐसा था उन दो महापुरुषों का एक-दूसरे के प्रति प्रेम ।

दूसरे दिन विदा के समय रवि बाबू ने गांधीजी के हाथ में एक बंद पत्र दिया। गाड़ी में बैठने के बाद गांधीजी ने उस पत्र को पढ़ा, तो उसमें लिखा थाः इस `विश्वभारती' संस्था को मैं आप को समर्पित करता हूं, आप इसे सम्हालें! ''

गांधीजी ने उत्तर में लिखाः 'मैं इसका उत्तरदायित्व स्वीकार करता हूं।

रवि बाबू को अपनी वृध्दावस्था में `विश्वभारती, 'की काफी चिंता थी, वह अब दूर हो गई।

आज देश स्वतंत्र होने के पश्चात् गांधीजी के आदेश से भारत सरकार ने `विश्वभारती ' का भार अपने सिर ले लिया है।

विश्व युध्द अपने ज्वार पर था। अमेरिका अंग्रेजों के पक्ष में हो गया था और जापान जर्मनी के पक्ष में मिलकर मलाया और बर्मा को अपने पेट में उतारकर भारत की ओर बढ़ने लगा था। उन दिनों चर्चिल ब्रिटन का प्रधान मंत्री था। वह गांधीजी को 'नंगा फकीर' कहकर गालियां देता था और घमंड में कहा करता थाः 'भारत को स्वतंत्रता देकर मैं ब्रिटिश राज्य को समाप्त नहीं करना चाहता! ' पर उस समय वह मुसीबत की ऐसी गिरप्त में आ गया कि उसने अपने एक साथी सर फ्रेडरिक क्रिप्स को बातचीत करने के लिए भारत भेजा। क्रिप्स गांधीजी से मिला; पर गांधीजी इतनी आसानी से पकड़ में आ जाएं, वैसे कच्चे आदमी नहीं थे। उन्होंने क्रिप्स को साफ शब्दों में सुना दियाः 'आप यदि भारत को सही माने में स्वतंत्र नहीं करना चाहते हों तो आप जैसे आए थे, वैसे ही दूसरे हवाईजहाज से वापस अपने देश को सिधारिए'

दूसरे भी किसी ने क्रिप्स को मुंह नहीं लगाया। आखीर हारकार वह वापस विलायत लौट गया।

अब गांधीजी को पूरा भरोसा हो गया कि जब तक अंग्रेजों को हम भारत से वाहर नाहीं खदेड़ देंगे तब तक ये देश की छाती रोंदते ही रहेंगे। इसलिए उनके नेतृत्व में बंबई में दि. 8.8.1942 के दिन मौलाना अबुलकलाम आझाद की अध्यक्षता में काँग्रेस ने एक प्रस्ताव पारित करके अंग्रेजों को साफ शब्दों में सुना दियाः `िक्वट् इण्डिया।' भारत छोड़ो।' अपने बोरी- बिस्तर समेटकर यहां से चुपचाप चले जाओ! तुम्हारा यहां अब कोई काम नहीं है!

कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर आदोलन शुरू करने का निश्चय किया और गांधीजी को अपना मार्गदर्शक बनाया। गांधीजी को अपना मार्गदर्शक बनाया। गांधीजी ने एक विराट् मानव मेदिनी के सामने घोषणा कीः 'मैंने कांगेस ने मुझे दाव पर रखा है। अब तो जीवन और मौत का खेल है! इस पार या उस पार! करेंगे या मरेंगे!'

उसी रात को सरकार ने गांधीजी और दूसरे सभी बड़े-बड़े नेताओं को गिरप्तार कर लिया। सबेरा होते- होते तो इस कोने से उस कोने तक सारा भारत एक स्वर से ललकार उठाः ' करेंगे या मरेंगे! '

लोगों में जिसे जैसा ठीक लगा वैसे लड़ना शुरू कर दिया। अहिंसा को माननेवाले भी उसमें आ घुसे। हड़ताल, तोड़-फोड़ और आग! सरकार ने निहत्थों पर कोड़े लाठियां और गोलियों की वर्षा की! सरकारी जुल्म ने हद कर दी! चार महिनें में तो पुलिस ने 470 बार और सेना ने 68 बार निहत्थी प्रजा पर गोलियां बरसाईं ! साठ हजार आदमियों को गिरप्तार कर लिया गया।

सरकार ने गांधीजी को उनकी पत्नी कस्तूर बा और मंत्री महादेव भाई देसाई के साथ पूना के आगाखान महल में कैद कर लिया। वहीं कुछ दिनों के बाद महादेव भाई पर हृदय रोग का आग्रमण हुआ और उनका अवसान हो गया। गांधीजी के दुःख का क्या कहना! पर उन्होने कहाः 'इस बलिदान से हमें स्वराज जल्दी मिलेगा! '

हर गांव में हिंसा की जो भीषण आग सुलग उठी थी- उसमें सरकार ने अपनी स्वयं की दमन नीति का काई दोष नहीं देखा; पर इसका दोषी गांधीजी को ही ठहराया। और इस तरह के विनाश् का उत्तरदययित्व उनके सिर पर ही डाल दिया गया। इस नीच आक्षेप के सामने गांधीजी ने जेल में ही 21 दिन के उपवास किए। सात दिनों में ही गांधीजी की हालत बड़ी चिंता जनक हो गई। कई बड़े-बड़े अंग्रेजों ने भी सरकार को सलाह दी कि वह गांधीजी को छोड़ दे; पर चर्चिल् ाने कहाः 'नहीं।'

ईश्वर की कृपा से उपवास भी पुरे हुए और गोधीजी भी बच गए। यह घटना सन् 1943 की है।

कुछ समय बाद कस्तूर बा बीमार पडीं। दो बार उन पर हृदय रोग का आक्रमण हुआ। आखिर दि. 22.2.1944 के दिन राम-धुन सुनते-सुनते गांधीजी की गोद में सिर- रखकर उन्होंने देह त्याग किया। अस समय उनकी उम्र में उन्होंने गांधीजी के साथ विवाह किया था। गांधीजी भी विवाह के समय तेरह वर्ष के ही थे और हाईस्कूल में पढ़ते थे। बासठ वर्ष का वैवाहिक जीवन आज समाप्त हुआ।

आगाखान महल के आंगन में कस्तुर बा के देह का अग्निसंस्कार किया गया। उस स्थान पर आज भी उनकी और महादेवभाई की समाधियां मौजूद हैं।

गांधीजी कहा करते थेः 'कस्तूर बा बहादुर स्त्राr हैं। मुझे इनका साथ मिला है, इसलिए मैं भी इससे शेभित हुआ हूं।'

कस्तूर बा कई बार जेल में गई थीं वे सहनशीलता की मूर्ति थीं और भारत की एक आदर्श सन्नारी थीं।

इसके बाद गांधीजी भी जेल में बीमार पड़ गए। इस बार सरकार घबरा उठी। उसने गांधीजी को छोड़ दिया।

गांधीजी की यही अंतिम जेलयात्रा थी। दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने 249 दिन और भारत में 2081 दिन जेल में काटे थे।

स्वास्थ्य ठी होते ही गांधीजी फिर से देश सेवा के काम में जूट गए। सारी जिंदगी उन्होंने हिन्दु-मुसलमान एकता के लिए काम किया, पर आज वही प्रश्न उन्हें थका रहा था।

मुसलमानों की सबसे बड़ी संस्था थी 'मुस्लिमलीग'। महमदअली जिन्हा उसके अध्यक्ष थे। गांधीजी की तरह वे भी गुजराती थे। गांधीजी ने उनको गुजराती में ही पत्र लिखा था। जिसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार हैः

भाई जिन्हा,

आपकी इच्छा हो वहां मैं आप से मिलूं। मुझे इस्लाम का या भारत के मुसलमानों का दुश्मन न समझना। मैं तो हमेशा आपका और मानवमात्र का मित्र और सेवक रहा हूं। मुझे निराश न करना

आपका भाई.

म.क.गांधी

इस तरह गांधीजी कई बार स्वयं प्रयत्न करके सामने से उनसे मिलने के लिए गए; पर जिन्हा साहब ने कहाः 'कांग्रेस केवल हिन्दुओं का प्रतिनिधित्व करनेवाली और मुस्लिम लीग देश के तमाम मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करनेवाली संस्था है। ऐसा पहले स्वीकार करो।' गांधीजी ने कहाः 'ऐसा नहीं है। कांग्रेस सारे देश का प्रतिनिधित्व करती है। देखिए मौलाना अबुल कलाम आझाद जैसे पाक मुसलमान इसके अघ्यक्ष हैं।'

पर जिन्हा साहब ने कहाः 'नहीं! ' हम मुसलमान अलग प्रजा हैं। हमको अलग राज्य चाहिए। भारत के दो टुकड़े कर दो। एक आप रखो, दूसरा हमको दे दो। आपका हिन्दुस्तान, हमारा पाकिस्तान! '

विश्वयुध्द समाप्त होने पर ब्रिटन में नये सिरे से पार्लामेंट का चुनाव हुआ। उनमें ब्रिटन का घमंडी प्रधान मंत्री चर्चिल हार गया और उसके स्थान पर मजदूर पक्ष के एटली साहब ब्रिटन के प्रधान मंत्री बने। उन्होंने भारत कें स्वतंत्रता प्रदान करने की घोषणा की और अपने मंत्रिमंडल के तीन साथियों को भारत में भेजा। जिसे 'केबिनेट मिशन ने आते ही सबसे पहले गांधीजी से संपर्क स्थापित किया। दिल्ली में गांधीजी का मुकाम 'भंगीवास' में था।

एकबार एक विदेशी पत्रकार ने गांधीजी से पूछाः 'यदि आपको एक दिन के लिए भारत का शासन सौंप दिया जाए तो आप क्या करेंगे?

गांधीजी ने कहाः पहील बात तो यह कि इस प्रकार का पद मैं स्वीकार ही नहीं करूंगा और संभव है एकदिन के लिए स्वीकार कर भी लूं तो उस दिन मैं दिल्ली के भंगियों की पोपड़ियां साफ करूंगा।'

अछूतों के प्रति गांधीजी की ऐसी पवित्र भावना थी।

'केबिनेट मिशन ' ने हिन्दू-मुज्ञिलम मतभेद को दूर करने के अनेक प्रयत्न किए; पर सफलता नहीं मिली। कांग्रेस ने हर तरह से मुस्लिम लीग के पलड़े को वजनदार रखा; पर जिन्हा साहब एक ही बात पर अड़े रहे कि देश के दो टुकड़े कर दो!

फिर सत्ता को छेड़ने के प्रथम चरण के रूप में वायसरॉय ने कामचलाऊ सरकार बनाने की घोषणा की; जिन्हा साहब ने उसमें भाग लेने से साफ इनकार कर दिया। इस कारण वायसरॉय ने अपनी अध्यक्षता में नई कामचलाऊ सरकार बनाई । पं. जवाहरलाल नेहरु इसके उपाध्यक्ष बने।

इसके विरुध्द मुस्लिम लीग ने यह घोषणा की कि पाकिस्तान के लिए हम जिहाद (धर्मयुध्द) शुरू करेंग्र। जिहाद के कारण कलकत्ता में तीन दिन तक भयंकर हत्याकांड हुआ। पांच हजार से भी ज्यादा आदमी मारे गए और पंद्रह हजार से भी अधिक लोग घायल हो गए। इसके उत्तर में दो-तीन महीनों के बाद उसी कलकत्ता में हिन्दुओं ने मार-काट मचाई। इसमें भी काफी खून बहा। इसकी प्रतिक्रिया में बंगाल के नो आखली और तिप्पेरा विस्तार में मुसलमानों ने हिंदुओं के घर-बार लूट लिए और फिर मनमाना कत्ले आम का दौर चलाया। नो आखली के हत्याकांड के जवाब में बिहार में हिन्दुओं ने मार-काट शुरू की। ऐसे हुल्लड़ और भी कई जगह हुए। वैर से वैर कभी शांत नहीं होता, यह बात उस समय किसी के भी समझ में नहीं आ रही थी। देश मानों एक जबरदस्त आंतरिक विध्वंस के किनारे खड़ा था। अपना सारा काम-काज छ़ेडकर सबसे पहले गांधीजी नो आखली गए।

अमतुस्सलाम नाम की एक मुस्लिम महिला गांधीजी की अनुयायी थीं। उन्हें गांधीजी ने नोआखली के एक के गांव में रखा था। दो कौमों के बीच शांति स्थापित करने के प्रयत्न में मुसलमानों का चाहिए उतना साथ नहीं मिल पा रहा था। ऐसा लगने पर उन महिला ने उपवास शुरू किए थे। गांधीजी उस गांव में गए तब उन महिला के पच्चीस दिन के उपवास पूरे हो चुके थे। गांव में घुसते ही मुसलमानों ने गांधीजीसे कहाः 'कौमी एकता और शांति के लिए हम आपका विश्वास दिलाते हैं। आप इन्हें उपवास छ़ुडवा दीजिए। सभी तरह से जांच-पड़ताल करने पर गांधीजी को वहां के नेताओं की बात पर भरोसा हो गया इसलिए उन्होंने कहाः ' आप लोग अपनी प्रतिज्ञा का पालन नहीं करेंगे तो मुझे उपवास करने पडेंगे! '

मुसलमानों ने लिखित रूप में अपनी स्वीकृति दी। आखिर में अमतुस्सलामने गांधीजी के हाथ से फलों का रस लेकर उपवास छोड़ा इस घटना का उस प्रदेश पर अच्छा प्रभाव पड़ा।

नोआखली की इस यात्रा में एक बार मनुबहन को एकाएक बचपन में पारेरबंदर के किसी मंदिर में सुनी हुई एक धुन याद हो आई और उन्होंने गाना शुरू कयाः

'ईश्वर उल्ला तेरे नाम,

सब को सम्मति दे भगवान् ! '

गांधीजी को यह धुन इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने कहाः 'ईश्वर ने ही तुझे इस धुन की याद दिलाई है। इसे सुनकर तो ईश्वर पर मेरी श्रध्दा और भी बढ़ गई है।'

इसके बाद गांधीजी की सभाओं में यही धुन गाई जाने लगी और आज तो सारे भारत में यह गाई जाने लगी है।

एक दिन एकाएक गांधीजी बीमार हो गए और उनके हाथ-पैर ठंडें हो गये। मनुबहन ने घबराकर डॉक्टर को बुलाने के लिए पत्र लिखा। इतने में गांधीजी ने आंखें खेलीं और कहाः राम का नाम लो! मरा सच्चा डॉक्टर तो राम ही है। उसकी इच्छा होगी वहां तक वह मंझे जीवित रखेगा। आज मेरी परीक्षा हो चुकी है! यदि राम का नाम मेरे दिल में सच्चे रूप में बस गया तो मैं बीमार होकर भी नहीं मरूंगा।' उसी समय मनुबहन ने उस पत्र को फाड़ डाला।

गांधीजी बगाल के 56 गांवों में घुमें और 116 मील लंबी यात्रा उन्होंने नंगेपाव पैदल चलकर ही पूरी की। उस बड़ी उम्र में भी गांधीजी ने बंगाली भाषा सीखना प्रारंभ किया और उसका 'क ख ग' घोटना शुरू किया। बंगाल के गांवों मे मुसलमान के घरों में जाकर भी उनसे मिला करते थे और प्राय वे मुसलमानों के घरों में ही मुकाम किया करते थे। एक बार एक मुसलमान ने एक पेड़ की हरी शाखा लाकर कहाः 'देखिए, इस पर दो पत्ते हैं और दोनों ही अलग-अलग जाति के हैं! ऐसा क्यों होता है, बापूजी?

गांधीजी ने हंसते हुए कहाः 'कुदरत की लीला है' हिन्दु मुसलमानों का भी ऐसा ही है। दोनों एक ही शाखा के दो पत्ते हैं। दोनों का भाग्य भी एक है।' यह सुनकर सभी को आनंद हुआ।

अधिक चलने से कई बार गांधीजी के पैरों में से खून निकलने लगता और मरहम-पट्टी करनी पड़ती थी; पर इस से उनकी यात्रा रुकती नहीं थी। शरीर से वे जब काफी थक जाते जब उनको पालकी में बिठाकर ले जान पड़ता था। सोमवार के दिन गांधीजी मौन रखते थे।

इस दिन वे लिखकर संदेश देते और संदेश में केवल एक ही बात लिखा करते थे: 'ईश्वर हिन्दू-मुसलमान दोनों के दिल को शुध्द करे, ऐसी हम प्रार्थना करें।

अत्याचार में बीहार नोआखली से किसी भी अंशी में कम नहीं था। मनुष्य जानवर बन जाता है, फिर क्या शेष बचता है? एक बाघ, दूसरे बाघ को नहीं खाता है; पर एक आदमी दूसरे आदमी को खा जाता है! कई गांवों में तो सभी घर जमींदोज कर दिए गए थे। दिल पर पत्थर रखकर गांधीजी सभी ओर घूमे। प्रतिदिन वे प्रार्थना सभा में अपने हृदय की व्यथा को पगकट करते थे।

मरुस्थल में मीठे पानी के परने हों वैसे कई उत्तम दृश्य भी गांधीजी के सामने आए। सैकड़ों मुसलमानों को हिन्दुओं ने ही हिन्दुओं के आक्रमणों से बचाया था।

एक गांव में बिफरे हुए कुछ लोगों ने एक मुसलमान का घर सुलगा दिया! इतने में एक क्षत्रिय की लड़की वहां दौड़ आई। उसने उन लोगों को काफी समझाया कि वे वापस लौट जांए पर वे लोग हटे नहीं, तब उने कहाः 'तो आप लोग मेरी ही बलि लीजिए। मैं इसी सुलगते हुए घर में कुद पड़ती हूं! '

इस बात का उन लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ा और वे लोग वापस लौट गए।

गांधीजी ने कहाः 'ऐसा सब ओर होना चाहिए।'

फिर गांधीजी बीहार के गांवों में पहुंचे। नोआखली में जिस तरह की प्रतिज्ञा की थी, ठीक वैसी ही प्रतिज्ञा गांधीजी ने यहां भी कीः 'शांति की स्थापना नहीं होगी, वहां तक मैं यहां से हटूंगा नहीं।'

एक दिन सबेरे गांधीजी घूमकर वापस लौट रहे थे, उस समय रास्ते में एक अंधा भिखारी उनकी इन्तजार में खड़ा था। बेचारा देख भी नहीं सकता था इसलिए उसने गांधीजी के पैर पकड़ लिए और अपनी भीख के सारे पैसे उसने गांधीजी के चरणों में रखकर कहाः 'बापू, मुसलमानों के लिए इनको खर्च करना। 'गांधीजी का हृदय हर्ष से भर गया। उन्हेंने पैसे ले लिए। कुल मिलाकर चार आने थे। उन्होंने कहाः 'ये चार आने मेरे लिए चार करोड़ से भी ज्यादा हैं क्योंकि इसने आपनीसारी पूंजी मुझे दे दी है।'

फिर उन्होंने उस अंधे भिखारी का कंधा थप थपाकर कहाः आज से तू अब भीख न मांगना। तू कर सके, ऐसे काम की मैं व्यवस्था कर देता हूं।'

गांधीजी की वाणी मानव के दिल को किस तरह बड़े गहरे तक छू लेती थी, इसका यह एक ज्वलंत उदाहरण है।

फिर हर गांव के मुखिया खुद सामने से चलकर आने लगे और गांधीजी को लिख-लिखकर देने लगेः 'ईश्वर को साक्षी रखकर हम घोषित करते हैं कि जो कुछ हो चुका है, उसके लिए हमें अतीव दुःख है और फिर से ऐसा नहीं होगा, इसका हम आपका विश्वास दिलाते हैं। हम अब मुसलामानों को अपना सगा भाई मानेंगे। हमें अपने पापों के लिए आप क्षमा करें।'

वायसरॉय की कामचलाऊ सरकार में पहले तो मुस्लीम लीग ने सम्मिलित होने से इनकार कर दिया था पर बाद में वह सम्मिलित हो गई थी। पर दुःख के साथ लिखना पड़ता है कि सम्मिलित होने के बाद उसने किसी को भी चैन में काम नहीं करने दिया। फिर अंत में असलियत का पता चला कि यह तो सारी चालबाजी वायसरॉय की ही थी। उसके स्थान पर लॉर्ड माउंटबेटन वायसरॉय बनकार भारत आए। आने के साथ ही उन्होंने घोषित कियाः ''मैं ब्रिटिश सत्ता को यहां से उठा लेने के लिए आया हूं।''

उन्होंने गांधीजी को दिल्ली बुलाया। गांधीजी बिहार से दिल्ली पहुंचे। अब तो स्वराज्य स्वयं सामने आकर खड़ा था। परिस्थिति कुछ इस प्रकार से नाजुक थी कि पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, आदि बड़े नेताओं को ऐसा लगा कि मुस्लीम लीग की मांग को स्वीकार किए बिना किसी भी स्थिति में काम चल नहीं सकेगा। नेहरुजी ने गांधीजी से कहाः '' बापू, पकिस्तान देना ही पड़ेगा।'

गांधीजी ने कहाः 'दूसरा और कोई रास्ता नहीं है? '' अखंड भारत की कोई आशा नहीं है? ''

नेहरुजी ने हताश होकर कहाः ''नहीं, इस के बिना यह भयानक हत्याकांड का बवंडर शत नहीं होगा।'' गांधीजी की वेदना का क्या कहना।

दि. 3.6.1947 के दिन विलायत की सरकार ने भारत के दो टुकड़े करने की घोषणा कर दी। गांधीजी को भारत के टुकड़े कर देना मंजूर नहीं था, फिर भी हृदय को कठोर करके उन्होंने देश को इसे स्वीकार कर लेने की सलाह दी।

लगभग दो सौ वर्षो से भारत में घर करके बैठी अंग्रेजी सत्ता समाप्त हुई। दि. 15.8.1947 के दिन हमारा भारत स्वतंत्र हुआ हौर भारत तथा पाकिस्तान इस तरह अखंड भारत के दा टुकड़े हो गए।

पंडित नेहरु स्वतंत्र भारत के पहले प्रधान मंत्री हुए, सरदार वल्लभ भाई पटेल उप प्रधान मंत्री बने। सारा देश आनंद के साग्रर में डुब गया। दिल्ली में मुगल बादशाहों के लाल किले पर सन् 1947, पंद्रह अगस्त के दिन तिरंगा पंडा फहराया और राष्ट्रगीत गाया गयाः

'जनगणमन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता !

पंजाब सिंध गुजरात मराठा, दविड उत्कल बंगाल,

विन्ध्य हिमाचल यमुना-गंगा उच्छल जलधि तरंगा !

तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशिष मांगे,

गाहे तव जयगाथा !

जन गण मंगलदायक जय हे, भारत भाग्य विधाता

जय हे! जय हे! जय जय जय जय हे!'

उस समय गांधीजी कहां थे? दिल्ली में थे? नहीं, वे कलकत्ता में थे। कलकत्ता में फिर से कौमी दंगे की आग भड़क उठी थी। वे आग की ज्वालाओं के बीच जाकर खड़े हो गए। वे गरीबों के मुहल्लों में, गरीबों के बीच जाकर रहते और वहीं जमीन पर बिस्तर करके सो जाते और शांति स्थापित करने के लिए कलकत्ता की गली-गली और घर-घर घूमते थे। उनके दुःख का पार नहीं था। आखिर में उन्होंने उपवास शुरू किए। लोगों पर उनके उपवास का प्रभाव पड़ा दोनों कौमों के नेताओं ने गांधीजी को यह विश्वास दिलायाः हम सभी लोगों को समझा-बुझाकर काबू में ले लेंगे। आप उपवास छ़ेड दीजिए।'' ठीक, पर इस वचन का भंग हो जाएगा तो मैं ऐसे उपवास पर उत्तर जाऊंगा कि फिर मृत्यु तक कभी नहीं छोडूंगा नहीं।

दूसरी ओर पकिस्तान में हिन्दुओं और सिक्खों को जीवन असुरक्षित हो गय ा। उन पर अमानवीय अत्याचार होने लगे। उनका माल-असबाब लूट लिया गया। उनकी स्त्रियें को अपहरण किया गया। हजारों कत्ल कर Sि गए। अपना माल-असबाब, घरबार छोड़कर सात लाख से भी ज्यादा हिंदू निर्वासित की स्थिति में भारत आए। यहां के मुसलमानों की वही हालत हुई। इतनी ही संख्या में मुसलमान भी अपना घरबार छोड़कर भारत से पाकिस्तान में चले गए।

सारी दिल्ली तो कौमी जुनून में गर्क हो गई। गांधीजी दिल्ली के लिए दौड़ पड़े। प्रार्थना सभाओं में उन्होंने अपने अंतकरण की व्यथा को प्रकट करना शुरू कियाः हे प्रभु, मुझे बल दो! ''

परस्पर धिक्कार और अविश्वास दूर हो, इसके लिए गांधीजी ने उपवास शुरू किए। दिन. 13-1-1948 के दिन वे 78 वर्ष की उम्र के थे। इतनी बड़ी उम्र में उपवास ! शरीर एकदम शिथिल हो चुका था। सारा देश चिंता में डूब गया। सारी दुनिया स्तब्ध हो कर देखती ही रह गई।

छट्ठे दिन सभी कौमों के नेताआंs ने प्रतिज्ञापूर्वक मुसलमानों के जान-माल-इज्जत की रक्षा का उत्तरदायित्व अपने सिर पर लिया, तभी गांधीजी ने उपवास छोड़ा। फिर सारा कलुषित वातावरण दूर हो गया।

पर कुछ हिंदूओं की बलि देकर मुसलमानों का हित चाहते हैं। ऐसे एक आदमी ने दि. 20 के दिन गांधीजी पर बंब फेंका, पर बंब निशाने पर नहीं लगा। बंब धड़ाके के साथ गिरा और उससे एक दीवार टूट गई। वे अपनी प्रार्थना में तल्लीन ही रहे किसी ने कहाः '' बापू, यहां बंब गिरा है ।

बापू ने कहाः 'भले गिरा! '

दि. 18.1.1948 के दिन गांधीजी ने एक पत्र में लिखा थाः मृत्यु हमारा सच्चा मित्र है। हमारा ज्ञान ही हमको दुःख देता है।'

गांधीजी का यह अंतिम पत्र है। इस घटना के दो दिन बाद दि. 30.1.1948 के दिन पांच बजे गांधीजी प्रार्थना सा में जा रहे थे, उस समय एक युवक उनसे आशर्वाद लेने के लिए आता है, इस तरह से उनके सामने आया और उसने गांधीजी की छाता पर तीन गोलियां चलाईः

'हे राम! ' के उच्चारण के साथ ही गांधीजी धरती पर गिर पड़े।

गांधीजी की हत्या के समाचार सुनकर सारी दुनिया स्तब्ध हो गई! सारी दुनिया पर शेक का वातावरण छा गया।

शोक संतप्त दुनिया ने गांधीजी की प्रशंसा में कहाः 'गांधीजी अमर है! '

दूसरे दिन गांधीजी की भव्य स्मशान यात्रा निकली। यमुना के किनारे उनका अग्निसंस्कार किया गया। उस स्थान को राजघाट कहते हैं। वहां उनकी समाधि है। आज भी सारी दुनिया से लोग इस समाधि के दर्शन करने के लिए आते हैं।

गांधीजी की अस्थियां भारत की सभी नदियों और तीर्थस्थानों में पधराई गई हैं। जगह-जगह उनके स्मारक बनवाए गए हैं। भारत में शायद ही कोई जगर ऐसा हो, जहां 'गांधी मार्ग' न हो। पर ये सभी गांधीजी के सच्चे स्मारक नहीं हैं। गांधीजी ने कहा थाः 'मेरा जीवन ही मेरा संदेश है। हम उनके इस संदेश को न भूलें। यही उनका सच्चा समारक होगा।

नेहरुजी ने दुःख से कातर होकर कहाः ''हमारे जीवन में से प्रकाश चला गया है और चारों ओर अंधकार छा गया है। हमारे व्यारे बापू अब हमारे बीच नहीं हैं ... मैंने कहा कि प्रकाश चला गया हैं, पर नहीं ! वह प्रकाश कोई साधारण प्रकाश नहीं था। जिस प्रकाश ने इतने वर्षों तक लगातार हमारे देश को प्रकाशित किया, वह अभी अनेकानेक वर्षों तक हमारे देश को प्रकाशित करता रहेगा और हजारों वर्षों के बाद भी वह प्रकाश हमारे देश में दिखाई देगा और दुनिया उसे देखेगी। असंख्या हृदयों को वह प्रकाश आश्वस्त करेगा।

विश्व विख्यात वैज्ञानिक आलबर्ट आइन्स्टाइन ने कहाः 'आनेवाली पीढ़ियां शायद ही इस पर विश्वास करे कि ऐसा कोई पुरुष मनुष्य देह से इस पृथ्वी पर विचरण कर गया हो! '

पूज्य बापू के अंतिम दर्शन

अंतिम-यात्रा की तैयारी 31 जनवरी, प्रातकाल

पूज्य बापू की नश्चर देह का अग्निसंस्कार

चित्र पूज्य बापू के अस्थि-कुंभ को गंगा-यमुना के संगम- स्थान (प्रयाग) पर पधराने के लिए ले जान।

पूज्य बापू की अस्थियों को गंगा-यमुना के पवित्र जल में विसर्जित करना

पूज्य बापू की दैनिक उपयोग में आनेवाली वस्तुं भोजन के लिए काष्ठ के बरतन और चमचे, तीन बंदरों की मूर्ति, दैनिक डायरी, प्रार्थना की पुस्तक, ऐनक, घड़ी, चंपल इत्यादि।

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