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1. शरीर

(28-842)

शरीरके परिचयसे पहले आरोग्य किसे कहते हैं, यह समझ लेना ठीक होगा । आरोग्यके मानी हैं तन्दुरुस्त शरीर । जिसका शरीर व्याधि-रहित है, जिसका शरीर सामान्य काम कर सकता है, अर्थात् जो मनुष्य बगैर थकानके रोज दस-बारह मील चल सकता है, जो बगैर थकानके सामान्य मेहनत-म़जदूरी कर सकता है, सामान्य खुराक पचा सकता है, जिसकी इन्द्रियां और मन स्वस्थ हैं, ऐसे मनुष्यका शरीर तन्दुरुस्त कहा जा सकता है । इसमें पहलवानों या अतिशय दौड़ने-कूदनेवालोंका समावेश नहीं है । ऐसे असाधारण बलवाले व्यक्तिका शरीर रोगी हो सकता है । ऐसे शरीरका विकास एकांगी कहा जायगा ।

इस आरोग्यकी साधना जिस शरीरको करनी है, उस शरीरका कुछ परिचय आवश्यक है ।

प्राचीन कालमें कैसी तालीम दी जाती होगी, यह तो विधाता ही जाने या शोध करनेवाले लोग कुछ जानते होंगे । आधुनिक तालीमका थ़ेडा-बहुत परिचय हम सबको है ही । इस तालीमका हमारे दिन-प्रतिदिनके जीवनके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता । शरीरसे हमें सदा ही काम पड़ता है, मगर फिर भी आधुनिक तालीमसे हमें शरीरका ज्ञान नहीं-सा होता है । अपने गांव और खेतोंके बारेमें भी हमारे ज्ञानके यही हाल हैं । अपने गांव और खेतोंके बारेमें तो हम कुंछ भी नहीं जानते, मगर भूगोल और खगोलको तोतेकी तरह रट लेते हैं । यहाँ कहनेका अर्थ यह नहीं है कि भूगोल और खगोलका कोई उपयोग नहीं है, मगर हरएक च़ीज अपने स्थान पर ही अच्छी लगती है । शरीरके, घरके, गांवके, गांवके चारों ओरके प्रदेशके, गांवके खेतोंमें पैदा होनेवाली वनस्पतियोंके और गांवके इतिहासके ज्ञानका पहला स्थान होना चाहिये । इस ज्ञानके पाये पर खड़ा दूसरा ज्ञान जीवनमें उपयोगी हो सकता है ।

शरीर पंचभूतका पुतला है । इसीसे कविने गाया है :

पवन, पानी, पृथ्वी, प्रकाश और आकाश,

पंचभूतके खलसे बना जगतका पाश ।


(29-8-42)

इस शरीरका व्यवहार दस इन्द्रियों और मनके द्वारा चलता है । दस इन्द्रियोंमें पांच कर्मेन्द्रियाँ हैं, अर्थात् हाथ, पैर, मुंह, जननेन्द्रिय और गुदा । ज्ञानेन्द्रियाँ भी पांच हैं- स्पर्श करनेवाली त्चचा, देखनेवाली आंख, सुननेवाला कान, सूंघनेवाली नाक और स्वाद रसको पहचाननेवाली जीभ । मनके द्वारा हम विचार करते हैं । कोई कोई मनको ग्यारहवीं इन्द्रिय कहते हैं । इन सब इन्द्रियोंका व्यवहार जब सम्पूर्ण रीतिसे चलता है, तब शरीर पूर्ण स्वस्थ कहा जा सकता है । ऐसा आरोग्य बहुत ही कम देखनेमें आता है ।

शरीरके अन्दरके विभाग हमें चकित कर देते हैं । शरीर जगतका एक छोटासा मगर सम्पूर्ण नमूना है । जो शरीरमें नहीं है, वह जगतमें भी नहीं है । और जो जगतमें है, वह शरीरमें है । इसी परसे यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे' यह महत्त्वपूर्ण कथन निकला है । इसलिए अगर हम शरीरको पूर्णतया पहचान सकें, तो जगतको पहचान सकते हैं । मगर जब बड़े-बड़े डॉक्टर, वैद्य और हकीम भी इसे पूरी तरह नहीं पहचान पाये, तो हमारे जैसे सामान्य प्राणी भला किस गिनतीमें हैं? आज तक ऐसे किसी यन्त्रकी शोध नहीं हो पाई, जो मनको पहचान सके । शरीरके अन्दर और बाहर चलनेवाली क्रियाओंका विशेषज्ञ लोक आकर्षक वर्णन दे सके हैं । मगर ये क्रियायें कैसे चलती हैं, यह कोई बता सका है? मौत क्यों आती है, वह कब आयेगी, यह कौन कह सका है? अर्थात् मनुष्यने बहुत पढ़ा, विचार किया और अनुभव लिया, मगर परिणाममें उसको अपनी अल्पज्ञताका ही अधिक भान हुआ है ।

शरीरके अन्दर चलनेवाली अद्भुत क्रियाओं पर इन्द्रियोंका स्वस्थ रहना निर्भर करता है । शरीरके सब अंग नियमानुसार चलें, तो शरीरका व्यवहार अच्छी तहरसे चलता है । एक भी अंग अटक जाय, तो गाड़ी चल नहीं सकती । उसमें भी पेट अपना काम ठीक तरहसे न करे, तो शरीर ढीला पड़ जाता है । इसलिए अपच या कब्जियतकी जो लोग अवगणना करते हैं, वे शरीरके धर्मको जानते ही नहीं । इन दो रोगोंसे अनेक रोग उत्पन्न होते है ।

अब हमें सह विचार करना है कि शरीरका उपयोग क्या है?


(30-8-42)

हर एक च़ीजका सदुपयोग और दुरुपयोग हो सकता है । शरीरका उपयोग स्वार्थके लिए, स्वेच्छाचारके लिए दूसरोंको नुकसान पहुंचनेके लिए किया जाय, तो वह उसका दुरुपयोग होगा । किन्तु यदि उसी शरीरका उपयोग सारे जगतकी सेवाके लिए किया जाय और इस हेतुसे संयमका पालन किया जाय, तो वह उसका सदुपयोग होगा । आत्मा परमात्माका अंश है । उस आत्माको पहचाननेके लिए अगर हम इस शरीरका उपयोग करते हैं, तो शरीर आत्माके रहनेका मन्दिर बन जाता है ।

शरीरको मल-मूत्रकी खान कहा गया है । एक तरहसे इस उपमामें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है । परन्तु यदि शरीर केवल मल-मूत्रकी खान ही हो, तो उसकी संभालके लिए इतने प्रयत्न करना कोई अर्थ नहीं रखता । परन्तु इसी नरककी खान' का सदुपयोग हो, तो उसे साफ-सुथरा रखकर उसकी संभाल करना हमारा धर्म हो जाता है । हीरे और सोनेकी खान भी ऊपरसे देखने पर तो मिट्टीकी खान ही लगती है । पर उसमें हीरा और सोना है, इसलिए मनुष्य उस पर करोड़ों रुपये खर्च करता है और उसके पीछे अनेक शास्त्रज्ञ अपनी बुध्दिका उपयोग करते हैं । तब आत्माके मन्दिर-रूपी शरीरके लिए तो हम जितना भी करे उतना कम है ।

हम इस जगतमे जन्म लेते हैं जगतके प्रति अपना "ण चुकानेके लिए, अर्थात् उसकी सेवाके लिए । इस दृष्टिबिन्दुको सामने रखकर मनुष्य अपने शरीरका संरक्षक बनता है । इसलिए शरीरकी रक्षाके लिए हमें ऐसा यत्न करना चाहिये, जिससे वह सेवाधर्मका पालन पूरी तरहसे कर सके ।

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