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गांधी की हत्या
: सत्य का वध
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रमेश ओझा

बचपन से ही मेरे मन में नाथूराम गोडसे नाम के आदमी के लिए एक अजीब-सा
कौतूहल था। गांधीजी जैसे महात्मा का इस आदमी ने खून क्यों किया
? यह प्रश्न मन में उठता था। मुम्बई में,
कॉलेज में पढते समय मेरे एक हिन्दुत्ववादी मराठी मित्र ने
नाथूराम गोडसे की लिखी
'पन्नास कोटीचे बली'
1पचास करोड की बलि1 और उसके भाई
गोपाल गोडसे की लिखी
'गांधी हत्या आणि मी'
'गांधी
हत्या और मैं',
ये दो पुस्तकें मुझे पढने के लिए दी थी । 'पन्नास कोटीचे बली'
नाथूराम का अदालत में दिया हुआ बचावनामा है, और
'गांधी आणि मी' गोपाल गोडसे की,
आजीवन कैद की सजा होने के बाद लिखी गयी पुस्तक है। ये
दोनों पुस्तकें पढने के बाद मुझे महसूस हुआ कि नाथूराम गोडसे धर्मजनूनी
जरूर था, मगर पागल
नहीं था। हम जिसको सिरफिरा कहते
हैं, ऐसा तो वह हरगिज
नहीं था।
नाथूराम और उसके साथियों ने जान-बूझकर,
षड्यंत्रपूर्वक ठण्डे कलेजे से गांधीजी की हत्या की थी। इन
लोगों ने गांधीजी की हत्या क्यों की, इस प्रश्न के
जवाब की तलाश में धीरे-धीरे गांधीजी की राजनीति और हिन्दुत्ववादियों की
राजनीति के बीच का फर्क मुझे समझ में आने लगा। मुसलमानों ने भारत का विभाजन
करवाया, फिर भी मुसलमानों,
उनके संगठन मुस्लिम लीग तथा नवनिर्मित पाकिस्तान के प्रति गांधीजी ने नरम
रुख अपनाया था, ऐसी दलीलें उन पुस्तकों में तथा
अन्यत्र भी हिन्दुत्ववादी देते रहे हैं। उनकी नजर में,
तब तो हद ही हो गयी, जब गांधीजी ने
पाकिस्तान को, उसके हिस्से के,
55
करोड रुपये देने की जिद की, और
उपवास की धमकी तक दे डाली। पाकिस्तान में हिन्दुओं पर अत्याचार तथा कश्मीर
पर हमला करनेवालों को
55
करोड रुपये देने की बात से उनेजित होकर नाथूराम गोडसे ने
गांधीजी की हत्या की थी, ऐसा उन पुस्तकों में कहा
गया है। आम तौर पर गांधीजी की हत्या के सम्बन्ध में,
आम लोगों की भी धारणा ऐसी ही है। अनेक इतिहासकार और
पत्रकार भी ऐसा ही मानते हैं। इतिहास की पाठय़पुस्तकों में भी हत्या का यही
कारण बताया जाता है।
गोडसे-बन्धुओं की पुस्तकों को पढने के बाद हत्या का सही कारण जानने के लिए
मैंने अन्य अनेक ग्रन्थों का अध्ययन किया। प्यारेलाल लिखित
'द लास्ट फेज', गांधी हत्या का केस
जिनकी अदालत में चला था उन न्यायमूर्ति खोसला की लिखी पुस्तक,
ग्वालियर के बचाव पक्ष के वकील एडवोकेट इनामदार के संस्मरण,
और गोडसे- बन्धुओं का प्रतिवाद करनेवाली कई दूसरी पुस्तकें
पढने के बाद मुझे यकीन हो गया कि गांधीजी की हत्या
55
करोड रुपये के प्रकरण से उनेजित होकर
नहीं की गयी थी। भारत
का विभाजन और
55
करोड रुपये का प्रश्न खडा हुआ,
उसके बहुत पहले ही इस टोली ने गांधीजी की हत्या करने का निश्चय कर लिया था
और कई बार गांधीजी की हत्या करने के प्रयास भी किये गये थे।
गांधी-हत्या केस के आरोपियों में से गोपाल गोडसे और मदनलाल पाहवा अभी जीवित
हैं।
आजादी की स्वर्ण-जयन्ती तथा गांधीजी की
50
व
पुण्य-तिथि के निमिन गत वर्ष गोपाल गोडसे के साथ मैंने लम्बी बातचीत की थी।
आठ घण्टे की लम्बी बातचीत में उनके साथ बहुत दलीलें हुइऔ। एक बार मदनलाल
पाहवा के साथ भी बातचीत हुई। बातचीत के दौरान मदनलाल पाहवा ने ठण्डे कलेजे
से कहा था कि उसने गांधीजी की हत्या करने के लिए नहीं,
बल्कि चेतावनी देने के लिए बम फेंका था। गोडसे-बन्धु की
पुस्तक में भी यही कहा गया है। गोपाल गोडसे के पास अधिकांश प्रश्नों के उनर
नहीं हैं। दूसरे की बात सुनी-अनसुनी करके वे अपनी ही बात कहते रहते हैं।
पीछे पडो, तो प्रश्नों का जवाब देने के बदले
उलटे-पुलटे बहाने बनाकर टालने का प्रयास करते हैं। अविश्वसनीय उलटी-सीधी
दलीलें करते हैं। स्वयं कितने देशभक्त हैं, यही
साबित करने की कोशिश बारगबार करते हैं। नाथूराम कितना बडा विद्वान और
चरित्रवान था, इसका बखान करते हैं।
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झूठ का प्रचार
गोपाल गोडसे और मदनलाल पाहवा से मिलने के बाद मुझे यकीन हो गया कि ये लोग
बिलकुल झूठ बोलते हैं। तथ्यों की तोड-मरोड करते हैं। वे पहले दर्जे के
धूर्त लोग हैं।
'हा! आर. स. स. की तुलना में हिन्दू महासभा वाले मुझे कुछ
कम धूर्त लगते हैं1। हिन्दुत्ववादियों में फरेबियों
के सभी लक्षण दिखाई देते हैं। गुजराती में
'गांधी
विरुद्ध गोडसे' नाटक आ रहा है,
इसकी जानकारी उन्होंने मुझे दी थी। गांधी की हत्या के विषय
में हिन्दुत्ववादी अपनी बात अलग-अलग तरीके से घोंट-घोंटकर लोगों को पिलाने
की कोशिश करते रहते हैं।
'असत्य'
को अलग-अलग स्थानों में, अलग-अलग
तरीकों से, बारगबार कहते रहने पर एक दिन वह
'असत्य'-'सत्य'
हो जायेगा, ऐसी
'गोबेल्स
थियरी' में इन फासीवादियों की श्रद्धा है। इसीलिए
ये लोग तीन 'मिथ'
प्रस्थापित करने की लगातार कोशिशें कर रहे हैं। पहला
'मिथ'
यह है कि गांधीजी मुसलमानों तथा पाकिस्तान के पक्षपाती थे।
दूसरा 'मिथ' यह है कि
गांधीजी की हत्या
55
करोड रुपयों के कारण की गयी थी। तीसरा
'मिथ'
यह है गांधी की हत्या करनेवाले बहादुर,
देशभक्त और प्रामाणिक व्यक्ति थे। परन्तु सत्य यह है कि ये
तीनों 'मिथ' बिलकुल गलत
हैं।
गांधीजी क्या मुसलमानों के तरफदार और पक्षपाती थे
? क्या देश के विभाजन के लिए गांधीजी जिम्मेदार थे? गांधे की हत्या के सम्बन्ध में हिन्दुत्ववादियों की
'थिसिस' में कितना झूठ भरा पडा है,
यह समझने के लिए सर्वप्रथम उक्त तीनों बातों की तह में
जाना और समझना जरूरी है।
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तिलक महाराज की मर्यादा
9
जनवरी,
1915
को गांधीजी जब हिन्दुस्तान वापस आये,
तब कांग्रेस का नेतृत्व लोकमान्य तिलक कर रहे थे। लोकमान्य
तिलक की रुझान हिन्दुत्ववादी, ब्रांणवादी और
रूढिवादी सनातनी-जैसी थी। गोपालकृष्ण गोखले की अस्वस्थता के कारण प्रगतिशील,
सुधारवादी शक्तिया कमजोर पड गयी
थी। उस समय लोकमान्य
तिलक के नेतृत्व में कुछ हिन्दुत्ववादी कांग्रेसी खुला आन्दोलन चला रहे थे,
तो कुछ विनायक दामोदर सावरकर-जैसे हिन्दुत्ववादी क्रान्तिकारी
लोग भूमिगत रहकर हिंसक आन्दोलन की तैयारी कर रहे थे। इन दोनों प्रकार के
आन्दोलनों की कुल ताकत कितनी थी वह समझ लेना जरूरी है।
लोकमान्य तिलक ने घोषणा की कि
'स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।'
इसमें स्वराज्य शब्द आता है। उस समय इसका अर्थ पूर्ण
स्वराज्य नहीं था। लोकमान्य के मन में
'स्वराज्य'
का आशय था ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वायनता
'होमरूल' और,
यही उनकी मा!ग थी। यह लोकमान्य तिलक के प्रति पूरा
सम्मान-भाव रखते हुए लेकिन हिन्दुत्ववादी राजनीति की मर्यादाए! बताने के
लिए लिखना पड रहा है। हिन्दुत्ववादी-ब्रांणवादी
दृष्टिकोण
के कारण तिलक महाराज कांग्रेस के प्रभाव का विस्तार
नहीं कर सके थे। उधर
महाराष्टं तथा अन्य प्रान्तों में ब्रांण-विरोधी आन्दोलन जोर पकडने
लगा था,
जिसने कांग्रेस के हिन्दुत्ववादी नेतृत्व को प्रभावहीन बना
दिया था।
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.....और,
क्रान्तिकारी क्या कर पाये ?
भारत में गेरिबाल्डी और मेजिनी जैसे
क्रान्तिकारी बनने का ख्वाब देखनेवाले
गेरिबाल्डी और मेजिनी द्वारा किये गये कामों का शतांश काम भी यहा!
नहीं कर
सके थे। भूमिगत रहकर हिंसक
क्रान्ति करने का इरादा रखनेवाले भारत की
वास्तविकताओं से बिलकुल अनभिज्ञ थे। वैसे भी भूमिगत आन्दोलन की एक मर्यादा
होती है। सौ वर्ष बाद भी भूमिगत-आन्दोलनवाले आयरलैण्ड का प्रश्न हल
नहीं कर
सके थे,
अभी हाल में बातचीत के द्वारा समस्या का समाधान हो पाया
है। भारत एक बहु-अस्मितावाला देश है। हर समाज दूसरे को शंका की नजर से
देखता है। कांग्रेस के नेताओं का झुकाव ब्रांणवादी होने के कारण बहुजन-समाज
कांग्रेस तथा स्वराज-आन्दोलन से अलग रहता था। और,
जहा! बहुजन-समाज साथ न हो, वहा! तो भूमिगत-आन्दोलन
की विफलता अवश्यम्भावी होती है। अधिकतर
क्रान्तिकारी एकादी छोटी-मोटी घटनाए!
करने के बाद पकड लिये जाते थे। अलीपुर बम-केस में,
अरविन्द घोष जैसे नेता भी, कोई योजना बनायें,
उससे पहले ही पकड लिये गये थे।
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सावरकर को जानें-समझें
ये लोग जिसको
'क्रान्तिवीर' के विशेषण से नवाजते
हैं, वह विनायक दामोदर सावरकर लन्दन में रहकर
'अभिनव भारत'
पत्रिका निकालते थे। भाषण तथा लेख की प्रभावी शैली होनेके के कारण कुछ युवक
उनकी तरफ आकर्षित हुए थे। उनके अनुयायियों ने भूमिगत रहकर तोडफोड की कुछ
कार्रवाइया! की थी,
परन्तु अंग्रेजों के खिलाफ व्यापक वोंह वे
नहीं कर सके थे।
अन्ततः परिस्थिति ऐसी बनी कि,
'वी.डी. सावरकर खुद
कोई जोखिम नहीं उठाते!' ऐसा असन्तोष उनके
अनुयायियों में पनपने लगा। यदि अब भी कुछ
नहीं किया,
तो 'अभिनव भारत'
पत्रिका बन्द हो जायेगी, ऐसी आशंका
उन्हें होने लगी थी। तब उन्होंने जिन्दगी में पहली बार,
और अन्तिम बार, एक छोटा-सा साहस कर
दिखाया। उन्हें जब ब्रिटेन से भारत लाया जा रहा था तब फ्रान्स की सीमा में
उन्होंने समुं में कूद कर भागने की कोशिश की थी। लेकिन मात्र
10
मिनट में ही सावरकर पकड लिये गये थे। हकीकत तो यह है कि
सावरकर फ्रान्स की सीमा में भागने का गुनाह करके फ्रांसिसे सरकार के
गुनहगार बनना चाहते थे, ताकि अंग्रेज सरकार की सजा
से बच जाय। बाद में सावरकर माफीनामा लिखकर अण्डमान की जेल से रिहा हुए थे।
अंग्रेज सरकार द्वारा निर्धारित मुद्दत तक वे रत्नागिरी जिले की सीमा से
बाहर नहीं जायेंगे, ऐसा लिखित शर्तनामा उन्होंने
अंग्रेजों को दिया था। वी. डी. सावरकर की इस
'महान क्रान्ति' के बाद तीन दशक तक भारत की आजादी के किसी भी
आन्दोलन में उन्होंने भाग लिया हो या आजादी के लिए स्वयं कोई एक भी
आन्दोलन
उन्होंने चलाया हो, इसका कोई प्रमाण
नहीं मिलता।
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गांधीजी को आम जनता का सहयोग
यह थी देश की राजनीतिक स्थिति,
जब
9
जनवरी,
1915
के दिन गांधीजी बम्बई के बन्दरगाह पर उतरे। उस समय के
अधिकांश नेता भारत की सामाजिक वास्तविकताओं से अनभिज्ञ थे,
यह एक हकीकत है। भारत में पैर रखने के साथ ही,
कांग्रेस के हिन्दुत्ववादी-ब्रांणवादी झुकाव तथा
भूमिगत-आन्दोलन की मर्यादाए! गांधीजी की समझ में आ गयी
थी। गांधीजी ने
कांग्रेस को व्यापक जन-संगठन में परिवर्तित करने का काम आरम्भ कर दिया।
पहली बार, दलित, आदिवासी,
पिछडे वर्ग के लोग,महिलाए!
कांग्रेस को अपना समझने लगम्। राष्टं की राजनीति में हमारा भी कोई स्थान है,
ऐसा विश्वास शोषित जनता के मन में सबसे पहले गांधीजी ने
पैदा किया।
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कांग्रेस की कायापलट
गांधीजी ने कांग्रेस नाम की संस्था को लोक-आन्दोलन में परिवर्तित कर दिया।
जब समग्र जनता आन्दोलित होती है तब भूमिगत
क्रान्ति की कोई प्रासंगिकता ही
नहीं रह जाती। चम्पारण से पहले,
देश के किसी भी जिले में, किसी
मुद्दे को लेकर जिला-व्यापीगजन-आन्दोलन
नहीं हुआ था। सम्पूर्ण देश में आम
हडताल हो सकती है इसकी कल्पना तक, गांधीजी से पहले
के कांग्रेसी नेता
नहीं कर पाये थे।
खिलाफत-आन्दोलन को समर्थन देकर मुसलमानों को साथ लेने का
प्रयास गांधीजी ने किया। पृथक्-पृथक् संकुचित अस्मिताओं की जगह राष्टींय
अस्मिता गांधीजी ने ही पैदा की। यदि गांधीजी ने यह राष्टींय अस्मिता
नहीं
पैदा की होती, तो देश अभी तक आजाद
नहीं हुआ होता।
गांधीजी के सर्वसमावेशक उदार राष्टंवाद ने यह जादू कर दिखाया। गांधीजी को
हिन्दू होने का गर्व था, मगर वे हिन्द के बापू थे।
इसीलिए हिन्दुत्ववादियों के अनेक अनुयायी तथा भूमिगत- आन्दोलनवाले गांधीजी
के उदार राष्टंवाद से प्रेरित होकर उनके साथ जुड गये थे,
गांधीवादी बन गये थे।
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कितनी देशहित में हैं हिन्दू सम्प्रदायवाद की प्रवृत्तिया!
जो अन्दर से पक्के सम्प्रदायवादी थे उनको गांधी कभी खुले रूप में स्वीकार्य
नहीं थे। लेकिन गांधीजी के उदार राष्टंवाद के सामने संकुचित
हिन्दू-राष्टंवाद टिक सके,
ऐसा भी सम्भव
नहीं था। इन्हम् परिस्थितियों में
गांधी-विरोधी प्रवृनियों का आरम्भ हुआ था। कुछ लोग हिन्दू महासभा से जुड
गये थे, तो कुछ ने
1925
में राष्टींय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की। क्या किया इन
महानुभावों ने ? जिन्दगी भर सिर्फ गांधीजी को तथा
मुसलमानों को गालिया! देने का काम किया है इन्होंने। इन महान राष्टंवादियों
ने आजादी के एक भी आन्दोलन में कभी भाग
नहीं लिया। उनको गांधीजी का नेतृत्व
मान्य नहीं था। लेकिन गांधीजी तथा कांग्रेस से अलग,
स्वतंत्र रूप से कोई एक भी आजादी का आन्दोलन इन लोगों ने
नहीं चलाया।
विराटगआन्दोलन की तो बात ही क्या कहें, कोई
छोटागसेगछोटा आन्दोलन भी चलाने की इन देशाभिमानियों ने कभी हिम्मत
नहीं की।
सावरकर के अलावा मातृभूमि के इन लाडलों में से किसी ने समाज-सुधार का काम
भी नहीं किया। अरे, काम तो क्या,
इसके लिए विचार-प्रचार तक
नहीं किया। गुरु गोलवलकर की
लिखीगश्अवर नेशनहुड डिफाइन्ड' शीर्षक पुस्तक तो
हिटलर की भी तारीफ करने वाली एक गन्दी पुस्तक है। यद्यपि आर.एस.एस. ने इस
पुस्तक का प्रकाशन अब बन्द कर दिया है, लेकिन इस
पुस्तक में व्यक्त विचारों में संघ की आस्था अब
नहीं रही,
ऐसी
घोषणा आर. स. स. ने आज तक
नहीं की है।
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पाकिस्तान का निर्माण किसने किया
?
1937
में हिन्दू महासभा के अहमदाबाद-अधिवेशन में खुद सावरकर ने
द्विराष्टंवाद के सिद्धान्त का समर्थन किया था। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान
के लिए प्रस्ताव किया, उससे तीन वर्ष पूर्व ही
सावरकर ने हिन्दू और मुसलमान, ये दो अलग-अलग
राष्टींयताए! हैं, यह प्रतिपादित किया था। जब दो
साम्प्रदायिक ताकतें एक-दूसरे के खिलाफ काम करने लगती हैं,
तब दोनों एक ही लक्ष्य की ओर अग्रसर होती हैं,
और वह होता है आत्मविनाश का। हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने
ऐसा करके अंग्रेजों और भारत-विभाजन चाहने वाले मुसलमानों को फायदा ही
पहु!चाया था। इन महान देशप्रेमियों ने
1942
की आजादी के आन्दोलन में तो भाग
नहीं ही लिया था,
उल्टे ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर यह जानकारी भी दी थी कि
हम आन्दोलन का समर्थन
नहीं करते हैं। गांधीजी आये,
उसके पहले राष्टींय राजनीति का नेतृत्व उनके पास ही था। लेकिन तब भी
उन्होंने उन दिनों कोई बडा पराव्म
नहीं किया था, यह
हम सबकी जानकारी में है ही। गांधी के आने के बाद भी इन लोगों ने राष्टंहित
में कोई मामूली काम करने की भी जहमत
नहीं उठाई। गुरु गोलवलकर ने ऐडाल्फ
हिटलर का अभिनन्दन किया, फिर भी अंग्रेजों ने उनको
गिरफ्तार नहीं किया। कारण यह कि अंग्रेज मानते थे कि ये दो कौडी के निकम्मे
लोग हैं। ये लोग तो तला पापड भी
नहीं तोड सकते
!
अंग्रेजों का यह आकलन था उनकी ताकत के बारे में।
भारत-विभाजन के लिए जितने जिम्मेदार मुस्लिम लीग तथा अंग्रेज हैं,
उतने ही ये
मूर्ख हिन्दुत्ववादी भी जिम्मेदार हैं। आजाद भारत में
हिन्दू ही हुकूमत करेंगे, ऐसा शोर मचाकर
हिन्दुत्ववादियों ने विभाजनवादी मुसलमानों के लिए एक ठोस आधार दे दिया था।
ये विभाजनवादी लोग कहम् मुहम्मद अली जिन्ना, कहम्
सावरकर, हेडगेवार, गोलवलकर
और श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि का भय दिखाकर उनका चालाकीपूर्वक उपयोग करते
थे। हिन्दुत्ववादी अभी भी अपनी बेवकूफियों पर गर्व का अनुभव करते हैं।
अंग्रेजों को जिन्हें कभी जेल में रखने की जरूरत ही
नहीं पडी,
उन गोलवलकर की अदृश्य ताकत का उपयोग
अंग्रेज गांधीजी के खिलाफ करते थे। शहाबुद्दीन राठौड की भाषा में कहें तो
उस समय की राष्टींय राजनीति में यो लोग जयचन्द थे। भारत का विभाजन गांधी के
कारण नहीं हुआ है, इन लोगों के कारण हुआ है।
गांधीजी ने तो अन्त तक भारत विभाजन का विरोध किया था। गांधीजी ने अन्तिम
समय तक इसके लिए जिन्ना के साथ
क्रमबद्ध मंत्रणाए! कीं। गांधीजी ने
पाकिस्तान को स्टेट माना था।
(देखें प्यारेलाल
लिखित 'लास्ट फेज') गांधीजी
सर्वसमावेशक उदार राष्टंवादी थे। इसीलिए उन्होंने सब कौमों को अपनाया था,
मात्र मुसलमानों को ही
नहीं। प्रत्येक छोटी अस्मिता व्यापक
राष्टींयता में मिल जाय, यह चाहते थे गांधीजी। एक
राष्टींय नेता की यह दूरदृष्टि थी। महात्मा
का यह
वात्सल्य-भाव था सबके प्रति। बदनसीबी से हिन्दू राष्टंवादी यह समझना ही
नहीं चाहते थे।
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सुभाषबाबू को भी सताया इन्होंने
सुभाष बाबू बंगाल-विभाजन के विरोधी थे। विभाजन न हो,
इसके लिए सुभाष बाबू शहीद सुहरावर्दी के साथ समझौते की
हिमायत करते थे।
'हमारे कलकना'
में बैठक कर कोई मुसलमान
'भं
बंगालियों' पर राज करे,
यह हिन्दुत्ववादियों को स्वीकार्य नहीं था। प्रान्तीय कांग्रेस में
एकतावादी सुभाषचन्द्र बोस को इन लोगों ने पराजित कर दिया। बंगाल में हिन्दू ऐसी
संकीर्णता प्रदर्शित करें, और उसके पडोसी संयुक्त
प्रान्त के मुसलमान विशाल और उदार मन रखें, क्या यह
सम्भव था ?
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विभाजन रोकने के लिए इन लोगों ने क्या किया
?
अब अन्तिम बात। गांधीजी को भारत-विभाजन रोकना चाहिए था,
यह मा!ग ये लोग किस मु!ह से करते हैं ?
गांधीजी को विभाजन रोकने के लिए उपवास करना चाहिए था,
ऐसी अपेक्षा करने का इनको क्या नैतिक-अधिकार है ?
जिसको आप देश के लिए कलंक समझते हैं,
जिसका वध करना जरूरी मानते हैं,
उसी से आप ऐसी अपेक्षाए! भी रखते हैं? आपने क्यों
नहीं विभाजन को रोकने के लिए कुछ किया ? सावरकर,
हेडगेवार, गोलवलकर ने विभाजन के
विरुद्ध क्यों
नहीं आमरण उपवास किया ? क्यों
नहीं
इसके लिए उन्होंने हिन्दुओं का व्यापक आन्दोलन चलाया ?
जिसको गालिया! देते हों, उसी से
देश बचाने की गुहार भी लगाते हो ? और जब गांधीजी
अकेले पड जाने के कारण देश का विभाजन रोक
नहीं पाये,
तब आप उनको राक्षस मानकर उनका वध करने की साजिश रचते हो
? इसको मर्दानगी कहेंगे या नपुंसकता ?
मैंने गोपाल गोडसे तथा अन्य दूसरे अनेक हिन्दुत्ववादी विद्वानों के समक्ष
ऐसे सवाल उठाये हैं,
लेकिन किसी के पास इसका कोई उनर
नहीं है। इन सबके बावजूद
भी ये अपनी डम्ग हा!कने से बाज
नहीं आते हैं। सत्य को जानते हुए भी जो
असत्य का प्रचार करे, उसको धूर्त ही कहेंगे।
हिन्दुत्ववादी पहले
दर्जे के धूर्त हैं।
ये हिन्दुत्ववादी लगातार जो तीन झूठ बोल रहे हैं,
उसमें से इस पहली झूठ की हकीकतों को हमने देखा।
भारत-विभाजन के लिए गांधीजी जिम्मेदार
नहीं थे। भारत-विभाजन के लिए कई
ऐतिहासिक तथा सामयिक तन्व एवं ताकतें जिम्मेदार
थी। ब!टवारा चाहने वाले
मुसलमान जिम्मेदार थे,
अंग्रेज जिम्मेदार थे तथा उनके कारनामों के
लिए अनुकूल राह
बनाने-दिखाने वाले मूर्ख हिन्दुत्ववादी जिम्मेदार थे।
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हिन्दू राष्टंवादियों को पहचानें
गांधी-द्वेष और मुस्लिम-द्वेष से ये हिन्दू राष्टंवादी इतने पीडित थे कि
राष्टंहित किसमें है यह उनकी समझ में ही
नहीं आता था। उनके पेट में दर्द तो इस बात का था कि गांधीजी के आने के बाद
नेतृत्व उनके हाथ से चला गया था। इतना ही नहीं,
उनकी 'हिन्दूगब्राण्ड राजनीति'
भी कालबाह्य हो चुकी थी। ब्रांणवादी राष्टंवाद की जगह ले
ली थी उदार गांधीवादी राष्टंवाद ने। जाति-पा!ति,
पंथ, लिंग आदि भेदभावों को भूलकर जनता गांधीजी के
पीछे चलने लगी थी। राजनीति की बुनियाद से साम्प्रदायिकता को हटाकर,
गांधीजी ने उसकी जगह अध्यात्म को प्रस्थापित कर दिया था।
अध्यात्म की बुनियाद पर मानवतावादी राजनीति की इस नयी धारा ने गांधीजी को
महात्मा बना दिया और हिन्दुत्ववादी क्षीण होतेगहोते हासिये पर चले गये थे।
जो बहुत महन्वाकांक्षी
नहीं थे ऐसे कई साम्प्रदायिक लोग राजनीति से अलग हो
गये। जनूनी और महन्वाकांक्षी सम्प्रदायवादियों की हालत पतली हो गयी। वे
गांधीजी के साथ जा
नहीं सकते थे और जनता उनके साथ आने के लिए तैयार
नहीं
थी।
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गांधी-हत्या की प्रेरक शक्तिया!
जिस व्यक्ति के कारण अपने अस्तित्व पर संकट आता है,
वह व्यक्ति का!टे की तरह चुभने लगता है और तब उस का!टे को
निकलाने का प्रयत्न होता है। हिन्दुत्ववादी समाचार-पत्रों में गांधीजी की
कटु आलोचनाए! छपती
थी। गांधीजी को अभं गालिया! देने वाली छोटीगछोटी
पत्र-पत्रिकाए!, प्रचारगपुस्तिकाए! तो इतनी छपवाते
थे कि यदि उनका संग्रह किया जाता तो एक कमरा ही भर जाता। कुछ महान देशभक्त
तो इतने शूरवीर थे कि अपना नाम भी छापने की उनकी हिम्मत
नहीं होती थी।
गांधीजी सबकी पीठ पर हाथ फेरकर अपना स्नेह व्यक्त करते हैं,
मात्र हमारी पीठ पर ही हाथ क्यों
नहीं फेरते,
इसका उन्हें दुख था। गांधीजी एक बार रत्नागिरी में सावरकर
से मिले थे और वर्धा में आर.एस.एस. के स्वयंसेवकों को एक बार सम्बोधित किया
था, इन दो घटनाओं का लाभ उठाने में हिन्दुत्ववादी
कभी कोई कसर नहीं छोडते। जिन्हें दिन-रात गालिया! देते हो,
सपने में भी जिसका चेहरा देखकर जल-भुन जाते हो,
उसकी एक मधुर स्मृति इतनी मूल्यवान
!
हिन्दुत्ववादियों की आ!ख में गांधीजी किरकिरी की तरह खटकते थे।
55
करोड रुपयों की तो बात ही क्या,
पाकिस्तान किसी के सपने में
नहीं था, तब से ये
गांधीजी की हत्या करने के प्रयास में जुट गये थे। दुखद तथ्य यह है कि भारत
में गांधीजी की हत्या के जो प्रयास हुए हैं, उनमें
सबमें अधिक पूना के लोग ही शामिल थे। इस प्रकार के तीन प्रयासों में,
और अन्त में हत्या में, खुद
नाथूराम गोडसे शामिल था।
55
करोड रुपये का प्रश्न तो
12
जनवरी,
1948
को यानी गांधीजी की हत्या के
18
दिन पहले प्रस्तुत हुआ था। इससे पहले,
चार बार गांधीजी की- हत्या के प्रयास
हिन्दुत्ववादियों ने
क्यों किये थे, इसका उनर उनको देना चाहिए।
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गांधी-हत्या के प्रयास 1934 से ही !
गांधीजी भारत आये उसके बाद उनकी हत्या का पहला प्रयास
25
जून,
1934
को किया गया। पूना में गांधीजी एक सभा को सम्बोधित करने के
लिए जा रहे थे, तब उनकी मोटर पर बम फेंका गया था।
गांधीजी पीछे वाली मोटर में थे, इसलिए बच गये।
हत्या का यह प्रयास हिन्दुत्ववादियों के एक गुट ने किया था। बम फेंकने वाले
के जूते में गांधीजी तथा नेहरू के चित्र पाये गये थे,
ऐसा पुलिसगरिपोर्ट में दर्ज है।
1934
में तो पाकिस्तान नाम की कोई चीज क्षितिज पर थी नहीं,
55
करोड रुपयों का सवाल ही कहा! से पैदा होता ?
गांधीजी की हत्या का दूसरा प्रयास
1944
में पंचगनी में किया गया। जुलाई
1944
में गांधीजी बीमारी के बाद आराम करने के लिए पंचगनी गये
थे। तब पूना से
20
युवकों का एक गुट बस लेकर पंचगनी पहुंचा। दिनभर वे
गांधी-विरोधी नारे लगाते रहे। इस गुट के नेता नाथूराम गोडसे को गांधीजी ने
बात करने के लिए बुलाया। मगर नाथूराम ने गांधीजी से मिलने के लिए इन्कार कर
दिया। शाम को प्रार्थना सभा में नाथूराम हाथ में छुरा लेकर गांधीजी की तरफ
लपका। पूना के सूरती-लॉज के मालिक मणिशंकर पुरोहित और भीलारे गुरुजी नाम के
युवक ने नाथूराम को पकड लिया। पुलिस-रिकार्ड में नाथूराम का नाम
नहीं है,
परन्तु मशिशंकर पुरोहित तथा भीलारे गुरुजी ने गांधी-हत्या
की जा!च करने वाले कपूर-कमीशन के समक्ष स्पष्ट शब्दों में नाथूराम का नाम
इस
घटना पर अपना बयान देते समय लिया था। भीलारे गुरुजी अभी
जिन्दा हैं।
1944
में तो पाकिस्तान बन जाएगा, इसका
खुद मुहम्मद अली जिन्ना को भी भरोसा
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