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ब्रह्मचर्य

ब्रह्मचर्य का दिव्य संदेश

आत्मसंयम

पशु और मनुष्य के बीच मुख्य अंतर यही है कि मनुष्य होश संभालते ही सतत आत्मसंयम का जीवन जीना शुरू कर देता है। ईश्वर ने मनुष्य को यह बुद्धि दी है कि वह अपनी मां, अपनी बेटी और अपनी पत्नी के बीच भेद कर सके।

विगांसी, पृ. 84

ब्रह्मचर्य की आवश्यकता

ब्रह्मचर्य के बिना मुझे जीवन फीका और पशुवत प्रतीत होता है। पशु स्वभाव से ही आत्मसंयम नहीं जानता। मनुष्य इसीलिए मनुष्य है कि वह जितना चाहे उतना आत्मसंयम बरतने में समर्थ है। जो पहले मुझे अपनी धार्मिक पुस्तकों में ब्रह्मचर्य की अतिरेकी प्रशंसा प्रतीत होती थी, वही आज अधिकाधिक स्पष्टता के साथ, पूर्णतः उचित और अनुभवाश्रित लगती है।

ए, पृ. 234

सही अर्थ

ब्रह्मचर्य का पूरी तरह पालन करने वाले स्त्री-पुरुष मनोवेगों से पूर्णतया मुक्त होते हैं। ऐसे व्यक्ति ईश्वर के सान्निध्य में निवास करते हैं, वे ईश-तुल्य होते हैं। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि ऐसे ब्रह्मचर्य का मनसा, वाचा, कर्मणा पूरी तरह पालन करना संभव है।

यंग, 5-6-1924, पृ. 186

परिभाषा

जब तक मन पूर्णतया इच्छाशक्ति के वश में नहीं हो जाता तब तक पूर्ण ब्रह्मचर्य की प्राप्ति संभव नहीं है। अनैच्छिक विचार मन की एक प्रवृत्ति है, इसलिए विचार पर नियंत्रण पाने का मतलब है मन को नियंत्रित करना जो वायु को नियंत्रित करने से भी अधिक कठिन है। फिर भी, अंतःकरण में ईश्वर का अस्तित्व मन को नियंत्रित करना भी संभव बना देता है। कोई यह न समझे कि चूंकि यह कठिन है इसलिए यह असंभव है। यह उच्चतम लक्ष्य है, अतः इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि उसकी प्राप्ति के लिए प्रयास भी अधिकतम करना पडता है।

ए, पृ. 153

आंतरिक दशा

ब्रह्मचर्य ऐसा गुण नहीं है जिसका विकास बाह्य निग्रहों से किया जा सके। जो व्यक्ति स्त्री के अपरिहार्य संपर्क से भी दूर भागता है, वह ब्रह्मचर्य के संपूर्ण अर्थ को नहीं समझता...

सच्चा ब्रह्मचारी झूठे निग्रहों से दूर रहेगा। उसे अपनी सीमाओं को ध्यान में रखते हुए अपने बचाव की विधियां स्वयं ही निर्धारित करनी होंगी और जैसे-जैसे वे अनावश्यक लगती जाएं, उन्हें छोडते जाना होगा। पहली चीज तो यह है कि आदमी यह जाने कि सच्चा ब्रह्मचर्य क्या है, फिर उसका मूल्य पहचाने और अंत में, इस अमूल्य गुण को विकसित करने का प्रयास करे। मेरी धारणा है कि इस देश की सच्ची सेवा करने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है।

हरि, 15-6-1947, पृ. 192

मेरा ब्रह्मचर्य

जिस दिन से मैंने ब्रह्मचर्य की शुरुआत की, हम स्वतंत्र होने लगे। मेरी पत्नी एक स्वतंत्र स्त्री बन गई, उसके स्वामी के रूप में मैं उस पर जो अधिकार चलाता था उससे वह मुक्त हो गई और मैं अपनी उस भूख की गुलामी से छुटकारा पा गया जिसकी तृप्ति का साधन वह थी। किसी अन्य स्त्री के प्रति मेरे मन में उस तरह का आकर्षण नहीं था जैसा कि अपनी पत्नी के प्रति था। मैं अपनी पत्नी के प्रति इतना नैष्ठिक था और अपनी मां के सामने किए गए प्रण से इतना बंधा था कि मैं किसी अन्य स्त्री का दास नहीं बन सकता था। लेकिन मेरा ब्रह्मचर्य जिस रूप में मुझे मिला, उससे मैं स्त्री को मनुष्य की मां समझते हुए उसकी ओर अवश होकर खिंचता चला गया। वह मेरे लिए इतनी पवित्र हो गई कि भोग की वस्तु कदापि नहीं बन सकती थी। और इस प्रकार, हर स्त्री तत्काल मेरे लिए मेरी बहिन अथवा बेटी बन गई।

हरि, 4-11-1939, पृ. 326


अगर मैं स्त्रियों के प्रति यौनाकर्षण का अनुभव करता तो मुझमें इतना साहस था कि, इस उम्र में भी, बहुविवाह करने से न चूकता। मुझे स्वच्छंद प्रेम - वह प्रकट हो अथवा गुप्त में विश्वास नहीं है। स्वच्छंद और प्रकट प्रेम को मैं कुत्तों की वासना का दर्जा देता हूं। और गुप्त भोग तो, उसके अलावा, कायरतापूर्ण भी है।

वही

समाज में स्त्रियों की स्थिति और भूमिका

आदमी जितनी बुराइयों के लिए जिम्मेदार है उनमें सबसे ज्यादा घटिया, बीभत्स और पाशविक बुराई उसके द्वारा मानवता के अर्धांग अर्थात नारी जाति का दुरुपयोग है। वह अबला नहीं, नारी है। नारी जाति निश्चित रूप से पुरुष जाति की अपेक्षा अधिक उदात्त है;
आज भी नारी त्याग, मूक दुख-सहन, विनम्रता, आस्था और ज्ञान की प्रतिमूर्ति है।

यंग, 15-9-1921, पृ. 292


स्त्री को चाहिए कि वह स्वयं को पुरुष के भोग की वस्तु मानना बंद कर दे। इसका इलाज पुरुष की अपेक्षा स्वयं स्त्री के हाथों में ज्यादा है। उसे पुरुष की खातिर, जिसमें पति भी शामिल है, सजने से इंकार कर देना चाहिए। तभी वह पुरुष के साथ बराबर की साझीदार बन सकेगी। मैं इसकी कल्पना नहीं कर सकता कि सीता ने राम को अपने रूप-सौंदर्य से रिझाने पर एक क्षण भी नष्ट किया होगा।

यंग, 21-7-1921, पृ. 229


यदि मैंने स्त्री के रूप में जन्म लिया होता तो मैं पुरुष के इस दावे के विरुद्ध विद्रोह कर देता कि स्त्री उसके मनबहलाव के लिए ही पैदा हुई है। स्त्री के हृदय में स्थान पाने के लिए मुझे मानसिक रूप से स्त्री बन जाना पडा है। मैं तब तक अपनी पत्नी के हृदय में स्थान नहीं पा सका जब तक कि मैंने उसके प्रति अपने पहले के व्यवहार को बिलकुल बदल डालने का निश्चय नहीं कर लिया। इसके लिए मैंने उसके पति की हैसियत से प्राप्त सभी तथाकथित अधिकारों को छोड दिया और ये अधिकार उसी को लौटा दिए। आप देखेंगे कि आज वह वैसा ही सादा जीवन जीती है जैसा कि मैं।

वह न कोई आभूषण धारण करती है, न अलंकार। मैं चाहता हूं कि आप भी उसी की तरह हो जाओ। अपनी मौज-मस्तियों की गुलामी और पुरुष की गुलामी छोडो। अपना शृंगार करना छोडो, इत्र और लवैंडरों का त्याग कर दो; सच्ची सुगंध वह है जो तुम्हारे हृदय से आती है, यह पुरुष को ही नहीं अपितु पूरी मानवता को मोहित करने वाली है। यह तुम्हारा जन्मसिद्ध अधिकार है। पुरुष स्त्री से उत्पन्न होता है, उसकी मांस-मज्जा से बना है। अपनी प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करो और अपना संदेश फिर सुनाओ।

यंग, 8-12-1927, पृ. 406

अबला नहीं

नारी को अबला कहना उसकी निंदा करना है; यह पुरुष का नारी के प्रति अन्याय है। यदि शक्ति का अर्थ पाशविक शक्ति है तो सचमुच पुरुष की तुलना में स्त्री में पाशविकता कम है। और यदि शक्ति का अर्थ नैतिक शक्ति है तो स्त्री निश्चित रूप से पुरुष की अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठ है। क्या उसमें पुरुष की अपेक्षा अधिक अंतःप्रज्ञा, अधिक आत्मत्याग, अधिक सहिष्णुता और अधिक साहस नहीं है ? उसके बिना पुरुष का कोई अस्तित्व नहीं है। यदि अहिंसा मानव जाति का नियम है तो भविष्य नारी जाति के हाथ में है... हृदय को आकर्षित करने का गुण स्त्री से ज्यादा और किसमें हो सकता है?

यंग, 10-4-1930, पृ. 121


यदि पुरुष ने अपने अविवेकपूर्ण स्वार्थ के वशीभूत होकर स्त्री की आत्मा को इस तरह कुचला न होता और स्त्री 'आनंदोपभोग' का शिकार न बन गई होती तो उसने संसार को अपनी अंतर्हितअनंत शक्ति का परिचय दे दिया होता। जब स्त्री को पुरुष के बराबर अवसर प्राप्त हो जाएंगे और वह परस्पर सहयोग और संबंध की शक्तियों का पूरा-पूरा विकास कर लेगी तो संसार स्त्री-शक्ति का उसकी संपूर्ण विलक्षणता और गौरव के साथ परिचय पा सकेगा।

यंग, 7-5-1931, पृ. 96


मेरा मानना है कि स्त्री आत्मत्याग की मूर्ति है, लेकिन दुर्भाग्य से आज वह यह नहीं समझ पा रही कि वह पुरुष से कितनी श्रेष्ठ है। जैसा कि टाल्सटॉय ने कहा है, वे पुरुष के सम्मोहक प्रभाव से आक्रांत है। यदि वे अहिंसा की शक्ति पहचान लें तो वे अपने को अबला कहे जाने के लिए हरगिज राजी नहीं होंगी।

यंग, 14-1-1932, पृ. 19

स्थान-व्यतिक्रम

स्त्री पुरुष की सहचरी है, उसकी मानसिक क्षमताएं पुरुष के बराबर हैं। पुरुष के छोटे-से-छोटे कार्यकलाप में भाग लेने का उसे अधिकार है और जितनी स्वाधीनता और आजादी का हकदार पुरुष है, उतनी ही हकदार स्त्री भी है।

स्त्री को कार्यकलाप के अपने क्षेत्र में सर्वोच्च स्थान पाने का वैसा ही हक है जैसा कि पुरुष को अपने क्षेत्र में है। स्वभावतया यही स्थिति होनी चाहिए; ऐसा नहीं है कि स्त्री के पढ-लिखे जाने पर ही वह इसकी हकदार बनेगी।

गलत परंपरा के जोर पर ही मूर्ख और निकम्मे लोग भी स्त्री के ऊपर श्रेष्ठ बनकर मजे लूट रहे हैं, जब कि वे इस योग्य हैं ही नहीं और उन्हें यह बेहतरी हासिल नहीं होनी चाहिए। स्त्रियों की इस दशा के कारण ही हमारे बहुत-से आंदोलन अधर में लटके रह जाते हैं।

स्पीरा, पृ. 425


तथाकथित अबला वर्ग के ऊपर यह जो हीनावस्था विधि का नियामक होने के नाते पुरुष द्वारा आरोपित कर दी गई है, उसका उसे बहुत ही भयावह दंड भुगतना होगा। पुरुष के फंदे से आजाद होकर स्त्री जब अपने पूर्ण उत्कर्ष को प्राप्त होगी और मनुष्यकृत विधान तथा उसके द्वारा गठित संस्थाओं के विरुद्ध विद्रोह करेगी तो उसका विद्रोह यद्यपि अहिंसक होगा, पर फिर भी बडा प्रभावकारी सिद्ध होगा।

यंग, 16-4-1925, पृ. 133


स्त्री ने अनजाने में अनेक विचक्षण उपायों से पुरुष को विविध प्रकार से फंसाया हुआ है और इसी प्रकार, पुरुष ने भी स्त्री को अपने ऊपर वर्चस्व प्राप्त न करने देने के लिए अनजाने में उतना ही किंतु व्यर्थ संघर्ष किया है। परिणामतः एक गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इस दृष्टि से देखें तो यह एक गंभीर समस्या है जिसका समाधान भारत माता की प्रबुद्ध बेटियों को करना है। उन्हें पश्चिम के तरीकों का अनुकरण नहीं करना है, जो शायद वहां के वातावरण के अनुकूल है। उन्हें भारत की प्रकृति और यहां के वातावरण को देखकर अपने तरीके लागू करने होंगे। उनके हाथ मजबूत, नियंत्रणशील, शुचिकारी और संतुलित होने चाहिए जो हमारी संस्कृति के उत्तम तत्वों को तो बचा रखें और जो कुछ निकृष्ट तथा अपकर्षकारी है, उसे बेहिचक निकाल फेंकें। यह काम सीताओं, द्रौपदियों, सावित्रियों और दमयंतियों का है, मुस्तंडियों और नखरेबाज स्त्रियों का नहीं।

यंग, 17-10-1929, पृ. 340


पुरुष ने स्त्री को अपनी कठपुतली समझ लिया है। स्त्री को भी इसका अभ्यास हो गया है और अंततः उसे यह भूमिका सरल और मजेदार लगने लगी है, क्योंकि जब पतन के गर्त में गिरने वाला व्यक्ति किसी दूसरे को भी अपने साथ खपच लेता है तो गिरने की क्रिया सरल लगने लगती है।

हरि, 25-1-1936, पृ. 396


मेरा दृढ़ मत है कि इस देश की सही शिक्षा यह होगी कि स्त्री को अपने पति से भी 'न' कहने की कला सिखाई जाए और उसे यह बताया जाए कि अपने पति की कठपुतली या उसके हाथों में गुडिया बनकर रहना उसके कर्तव्य का अंग नहीं है। उसके अपने अधिकार हैं और अपने कर्तव्य हैं।

हरि, 2-5-1936, पृ. 93

सही शिक्षा

मैं स्त्री की उचित शिक्षा में विश्वास करता हूं। लेकिन मेरा पक्का विश्वास है कि पुरुष की नकल करके या उसके साथ होड लगाकर वह दुनिया में अपना योगदान नहीं कर सकेगी। वह होड लगा सकती है, पर पुरुष की नकल करके वह उन ऊंचाइयों को नहीं छू सकती जिनका सामर्थ्य उसके अंदर है। उसे पुरुष का पूरक बनना है।

रि, 27-2-1937, पृ. 19

आत्मसंरक्षण

जो लोग सीता को राम की स्वेच्छया दासी के रूप में देखते हैं, वे सीता की स्वाधीनता की ऊंचाई या हर बात में राम द्वारा सीता के लिहाज को नहीं समझ पाते। सीता अपनी और अपने सम्मान की रक्षा में असमर्थ कोई विवश निर्बल स्त्री नहीं थी।

हरि, 2-5-1936, पृ. 93


मुझे भय है कि आधुनिक लडकी को आधे दर्जन छैलाओं की प्रेमिका बनना अच्छा लगता है। उसे जोखिम पसंद है... वह जिस तरह के वस्त्र धारण करती है वे उसे हवा, पानी और धूप से बचाने के लिए नहीं बल्कि लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए होते हैं। वह रंग-रोगन लगाकर और असाधारण दिखाई देने का प्रयास करके प्रकृतिदत्त सुंदरता को बढाने का उपक्रम करती है। अहिंसा का मार्ग ऐसी लडकियों के लिए नहीं है।

हरि, 31-12-1938, पृ. 409


स्त्रियों को अपनी सुरक्षा के लिए पुरुषों पर निर्भर नहीं रहना है। उसे द्रौपदी की भांति अपने चरित्र की शक्ति और निर्मलता पर तथा ईश्वर पर भरोसा करना चाहिए।

हरि, 15-9-1946, पृ. 312

सही स्थान

जीवन में जो कुछ पवित्र और धार्मिक है, स्त्रियां उसकी विशिष्ट अभिरक्षक हैं। प्रकृति से रूढिवादी होने के कारण वे यदि अंधविश्वासों को त्यागने में शिथिल हैं तो जीवन में जो कुछ पवित्र और उदात्त है, उसका त्याग करने में भी शिथिल हैं।

हरि, 25-3-1933, पृ. 2


मैं इस बात की कल्पना नहीं कर पाता कि पत्नी सामान्यतया अपने पति से स्वतंत्र कोई जीविका करे। बच्चों का पालन-पोषण और घर की देखभाल ही उसकी सारी शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए काफी हैं।

सुव्यवस्थित समाज में, परिवार के भरण-पोषण का अतिरिक्त भार महिला पर नहीं पडना चाहिए। पुरुष परिवार के भरण-पोषण का उत्तरदायित्व ले और महिला घर-गृहस्थ के प्रबंध को देखे, इस प्रकार दोनों एक-दूसरे के पूरक और अनुपूरक बनें।

मुझे इसमें स्त्री के अधिकारों अथवा उसकी आजादी के दमन की कोई बात दिखाई नहीं देती... हमारे साहित्य में पत्नी को अर्धांगिनी और सहधर्मिणी कहकर सम्मानित किया गया है। पति द्वारा पत्नी को देवी कहकर संबोधित किया जाना उसे तुच्छ समझने का बोध तो नहीं कराता।

...जो स्त्री अपने कर्तव्य को समझती है और उसे पूरा करती है, उसे अपनी गरिमामय प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। वह जिस घर की अधिष्ठात्री है, उसकी दासी नहीं अपितु स्वामिनी होती है।

हरि, 12-10-1934, पृ. 276-77


लेकिन पुरुष ने किसी-न-किसी तरह से युगों से स्त्री पर अपना प्रभुत्व जमा रखा है जिसके परिणामस्वरूप स्त्री में हीनभावना घर कर गई है। उसने पुरुष की इस स्वार्थमय सीख में विश्वास कर लिया है कि वह पुरुष से कमतर है। लेकिन मनीषियों ने स्त्री को बराबरी का दर्जा ही दिया है।

तब भी, इसमें संदेह नहीं कि एक बिंदु ऐसा है जहां से द्विशाखन होता है। यद्यपि मूल रूप से स्त्री और पुरुष समान हैं, पर यह भी सही है कि दोनों के स्वरूप में महत्वपूर्ण अंतर है। इसलिए दोनों के कार्यक्षेत्र भिन्न-भिन्न होने चाहिए।

हरि, 24-2-1940, पृ. 13

स्त्री और अहिंसा

मेरा विश्वास है कि अहिंसा के उच्चतम और सर्वोत्कृष्ट स्वरूप का प्रदर्शन करना स्त्री का जीवन-लक्ष्य है... कारण यह है कि अहिंसा के क्षेत्र में खोज करने और साहसिक कदम उठाने के लिए स्त्री अधिक उपयुक्त है... आत्मत्याग का साहस पुरुष की अपेक्षा स्त्री में निश्चित रूप से कहीं ज्यादा है, ठीक उसी प्रकार जैसे कि पशुता का साहस पुरुष में स्त्री की अपेक्षा ज्यादा है।

हरि, 5-11-1938, पृ. 317


मेरी अपनी राय में चूंकि पुरुष और स्त्री मूलतः एक हैं, अतः उनकी समस्या भी तत्वतः एक होनी चाहिए। दोनों में एक ही आत्मा का वास है। दोनों एक-सा जीवन जीते हैं, दोनों की भावनाएं एक जैसी होती हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दूसरे की सक्रिय सहायता के बिना इनमें से कोई भी जी नहीं सकता।

हरि, 24-2-1940, पृ. 13


मैंने कहा है कि... स्त्री अहिंसा का अवतार है। अहिंसा का अर्थ है असीम प्रेम, जिसका अर्थ है पीडा भोगने का असीम सामर्थ्य। यह सामर्थ्य स्त्री, जो पुरुष की मां है, से अधिक और किसमें है ? अपने गर्भ में नौ मास तक शिशु का पोषण करके और उस क्लेश को प्रसन्नतापूर्वक झेलकर वह इस सामर्थ्य का प्रचुर प्रमाण देती है। प्रसव-पीडा से बडी पीडा कोई और है ? लेकिन सृजन के सुख में वह उसे भी भुला देती है।

बच्चे के दैनंदिन विकास के लिए और कौन है जो रोज खटता है ? स्त्री को चाहिए कि वह इस प्रेम का विस्तार करके समूची मानवता को इसमें समाविष्ट कर ले और यह भूल जाए कि वह पुरुष की वासना का विषय है। यदि ऐसा हो सके तो वह पुरुष के साथ उसकी मां, उसकी सृष्टिकर्ता और उसकी मूक पथप्रदर्शिका के रूप में अपने गौरवमय पद की प्राप्ति कर सकेगी। शांति के लिए व्याकुल युद्धरत संसार को शांति का पाठ स्त्री को ही पढाना है।

वही, पृ. 13-14

विशेष जीवन-लक्ष्य

मातृत्व का कर्तव्य, जो अधिकांश स्त्रियां सदा निभाएंगी, वहन करने के लिए जिन गुणों की अपेक्षा होती है, उनका पुरुष में होना आवश्यक नहीं है। स्त्री निक्रिय है, पुरुष सक्रिय है। मुख्यतया, वह गृहस्वामिनी है। पुरुष रोजी कमाता है, स्त्री भोजन की व्यवस्था और वितरण करती है। वह हर दृष्टि से रक्षक की भूमिका निभाती है। प्रजाति के शिशुओं को पाल-पोसकर बडा करना उसका विशिष्ट तथा एकल अधिकार है। वह देखभाल न करे तो संपूर्ण प्रजाति लुप्त हो जाए।

मेरी राय में, स्त्री से गृहस्थ के संचालन की जिम्मेदारी छोडकर उसकी रक्षा के लिए बंदूक उठाने को कहना पुरुष और स्त्री, दोनों के लिए गिरावट की बात है। यह बर्बरता की ओर लौटना है और अंत की शुरुआत है। पुरुष जिस घोडे पर सवार है उसी पर सवारी करने की कोशिश में स्त्री स्वयं भी गिरेगी और अपने साथ पुरुष को भी गिराएगी।

यदि पुरुष ने स्त्री को अपनी विशिष्ट भूमिका त्यागने के लिए प्रलोभित अथवा बाध्य किया तो इसका पाप मनुष्य के सिर पर ही होगा। अपने घर को सुव्यवस्थित रखने में भी उतनी ही वीरता है जितनी कि उसकी बाह्य आक्रमण से रक्षा करने में...

इस गहन समस्या के समाधान में मेरा योगदान यह है कि मैं जीवन के हर क्षेत्र में, व्यक्तियों और राष्ट्रों, दोनों के समक्ष सत्य और अहिंसा को अपनाने का प्रस्ताव रखता हूं। मैंने यह आशा बांध रखी है कि इसमें स्त्री निर्विवाद नेता बनकर सामने आएगी और इस प्रकार मानव के विकास में अपना स्थान सुनिश्चित करने के फलस्वरूप वह अपनी हीन भावना का भी त्याग कर सकेगी।

यदि वह सफलतापूर्वक ऐसा कर सकी तो वह इस आधुनिक सीख में विश्वास करने से भी दृढ़तापूर्वक इंकार कर देगी कि इस दुनिया में हर चीज यौन आवेग द्वारा निर्धारित और विनियमित होती है...

वही, पृ. 13


स्वयं पीडा भोगना स्त्री के स्वभाव में है। इसलिए अहिंसा उसके लिए अधिक सहज है।

हरि, 5-5-1946, पृ. 118


मैं पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों से अधिक प्रेम और सहिष्णुता की आशा करता हूं। मुझे आश्चर्य है कि वे भटक कर किधर जा रही हैं और अगर उनके घरों में घृणा का वातावरण फैल गया तो वे अपने बच्चों को क्या सिखाएंगी या सिखा सकेंगी ?

हरि, 18-5-1947, पृ. 155

स्त्री-पुरुष समानता

जहां तक स्त्रियों के अधिकारों का सवाल है, मैं कोई समझौता नहीं करूंगा। मेरी राय में, उन्हें ऐसी किसी कानूनी निर्योग्यता का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए जो पुरुष पर लागू नहीं होतप। मैं बेटे और बेटियों के साथ बिलकुल एक जैसा व्यवहार करना चाहूंगा।

हरि, 17-10-1929, पृ. 340


स्त्री-पुरुष समानता का यह अर्थ नहीं है कि काम-धंधे भी समान हों। यह सही है कि स्त्री के आखेट करने अथवा भाला लेकर चलने पर कोई कानूनी बंदिश नहीं होनी चाहिए। लेकिन जो काम पुरुष का है, उसे करने से वह स्वभावतया झिझकती है। प्रकृति ने स्त्री और पुरुष को एक-दूसरे का पूरक बनाया है। जिस प्रकार उनके शरीर के आकार परिभाषित हैं उसी प्रकार उनके काम भी परिभाषित हैं।

हरि, 2-12-1939, पृ. 359


कानून बनाने का काम ज्यादातर पुरुषों के हाथ में रहा है, और इस स्वनिर्धारित काम को करते समय पुरुष ने सदा औचित्य और विवेक से काम नहीं लिया है। स्त्रियों के पुनरुद्धार का सबसे बडा काम यह है कि हम उन कलंकों को मिटा दें जिन्हें हमारे शास्त्राsं ने स्त्रियों के अनिवार्य और स्वभावगत लक्षण बताया है। इसे कौन करेगा और कैसे करेगा ?

मेरी विनम्र सम्मति में, इसके लिए हमें सीता, दमयंती और द्रौपदी जैसी निर्मल, दृढ और आत्मनियंत्रित महिलाएं पैदा करनी होंगी। यदि हम यह कर सकें तो हिंदू समाज इन आधुनिक बहनों को भी वही आदर देगा जो वह बीते युग की महान देवियों को देता आया है। उनके शब्द भी शास्त्र के समान प्रामाणिक माने जाएंगे। हम अपनी स्मृतियों में उन पर कहीं-कहीं किए गए आक्षेपों के लिए शर्म महसूस करेंगे और जल्दी ही उन्हें भुला देंगे। हिंदू समाज में ऐसी क्रांतियां पहले हुई हैं और भविष्य में भी होंगी; वस्तुतः इससे धर्म को स्थिरता प्राप्त होगी।

स्पीरा, पृ. 424


मैं स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं करता। स्त्रियों को भी पुरुषों के समान स्वयं को स्वाधीन अनुभव करना चाहिए। वीरता केवल पुरुषों की बपौती नहीं है।

हरि, 5-1-1947, पृ. 478


आज बहुत कम महिलाएं राजनीति में भाग लेती हैं और इनमें से अधिकांश स्वतंत्र चिंतन नहीं करतप। वे अपने माता-पिता अथवा अपने पति के आदेशों का पालन करके ही संतोष का अनुभव कर लेती हैं। अपनी निर्भरता का अहसास होने पर वे स्त्री-अधिकार की आवाज बुलंद करने लगती हैं। महिला कार्यकर्ताओं को चाहिए कि ऐसा करने के बजाए स्त्रियों के नाम मतदाता सूचियों में लिखाएं, उन्हें व्यावहारिक शिक्षा दें या दिलाने की व्यवस्था करें, उन्हें स्वतंत्र रूप से सोचने की सीख दें और जात-पांत के बंधनों से मुक्त कराएं ताकि बदलाव आए। इससे पुरुष उनकी शक्ति और त्याग की क्षमता को पहचानने और उन्हें प्रतिष्ठित स्थानों पर बिठाने के लिए बाध्य होंगे।

हरि, 21-4-1946, पृ. 96


स्त्रियों का स्वयं को पुरुषों के अधीन या उनसे हीन समझने का कोई कारण नहीं है। विभिन्न भाषाओं में स्त्री को पुरुष का अर्धांग कहा गया है और इसी तर्क से, पुरुष स्त्री का अर्धांग हुआ। ये अलग सत्ताएं नहीं हैं, बल्कि एक ही के दो भाग हैं। अंग्रेजी भाषा और भी आगे बढते हुए स्त्री को पुरुष का बेहतर अर्धांग (बैटर हाफ) कहकर पुकारती है।

इसलिए स्त्रियों को मेरी सलाह है कि वे सभी अवांछनीय और निकम्मी बंदिशों के खिलाफ सविनय विद्रोह करें। बंदिशें वे ही फायदा पहुंचा सकती हैं जो स्वैच्छिक हों। सविनय विद्रोह से कोई हानि होने की आशंका नहीं है, चूंकि उसके मूल में शुद्धता और सुविवेचित प्रतिरोध होते हैं।

हरि, 23-3-1947, पृ. 80


पुरुष को चाहिए कि स्त्री को उचित स्थान देना सीखे; जिस देश अथवा समुदाय में स्त्री का आदर नहीं होता, उसे सुसंस्कृत नहीं कहा जा सकता।

हरि, 11-1-1948, पृ. 508

पर्दा

स्त्री के चरित्र की निर्मलता को लेकर इतनी विकृत चिंता करने की क्या जरूरत है ? क्या पुरुष के चरित्र की निर्मलता के मामले में स्त्री को बोलने दिया जाता है ? पुरुष की पाकीजगी के बारे में स्त्री की चिंता की बात कभी सुनाई नहीं देती। स्त्री के चरित्र की निर्मलता को विनियमित करने का अधिकार पुरुष के हाथों में क्यों रहे ? यह चीज ऊपर से नहीं थोपी जा सकती। यह अंदर से पैदा होने वाली चीज है, इसलिए यह व्यक्ति के अपने प्रयास पर छोडनी होगी।

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