अपने बारे में (गांधीजी)

1. न संत, न पापी

मैं सोचता हूं कि वर्तमान जीवन से 'संत' शब्द निकाल दिया जाना चाहिए। यह इतना पवित्र शब्द है कि इसे यूं ही किसी के साथ जोड़ देना उचित नहीं है। मेरे जैसे आदमी के साथ तो और भी नहीं, जो बस एक साधारण-सा सत्यशोधक होने का दावा करता है, जिसे अपनी सीमाओं और अपनी त्रुटियों का अहसास है और जब-जब उससे गुटिया! हो जाती है, तब-तब बिना हिचक उन्हें स्वीकार कर लेता है और जो निस्संकोच इस बात को मानता है कि वह किसी वैज्ञानिक की भांति, जीवन की कुछ 'शाश्वत सच्चाइयों' के बारे में प्रयोग कर रहा है, किंतु वैज्ञानिक होने का दावा भी वह नहीं कर सकता, क्योंकि अपनी पद्धतियों की वैज्ञानिक यथार्थता का उसके पास कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है और न ही वह अपने प्रयोगों के ऐसे प्रत्यक्ष परिणाम दिखा सकता है जैसे कि आधुनिक विज्ञान को चाहिए।

यंग, 12-5-1920, पृ. 2


मुझे संत कहना यदि संभव भी हो तो अभी उसका समय बहुत दूर है। मैं किसी भी रूप या आकार में अपने आपको संत अनुभव नहीं करता। लेकिन अनजाने में हुई भूलचूकों के बावजूद मैं अपने आपको सत्य का पक्षधर अवश्य अनुभव करता हूं।

सत्य की नीति

मैं 'संत के वेश में राजनेता' नहीं हूं। लेकिन चूंकि सर्वोच्च बुद्धिमला है इसलिए कभी-कभी मेरे कार्य किसी शीर्षस्थ राजनेता के-से कार्य प्रतीत होते है। मैं समझता हूं कि सत्य और अहिंसा की नीति के अलावा मेरी कोई और नीति नहीं है। मैं अपने देश या अपने धर्म तक के उद्धार के लिए सत्य और अहिंसा की बलि नहीं दूंगा। वैसे, इनकी बलि देकर देश या धर्म का उद्धार किया भी नहीं जा सकता।

यंग, 20-1-1927, पृ. 21


मैं अपने जीवन में न कोई अंतर्विरोध पाता हूं, न कोई पागलपन। यह सही है कि जिस तरह आदमी अपनी पीठ नहीं देख सकता, उसी तरह उसे अपनी त्रुटियां या अपना पागलपन भी दिखाई नहीं देता। लेकिन मनीषियों ने धार्मिक व्यक्ति को प्रायः पागल जैसा ही माना है। इसलिए मैं इस विश्वास को गले लगाए हूं कि मैं पागल नहीं हूं बल्कि सच्चे अर्थों में धार्मिक हूं। मैं वस्तुतः इन दोनों में से क्या हूं, इसका निर्णय मेरी मृत्यु के बाद ही हो सकेगा।

यंग, 14-8-1924, पृ. 267


मुझे लगता है कि मैं अहिंसा की अपेक्षा सत्य के आदर्श को ज्यादा अच्छी तरह समझता हूं और मेरा अनुभव मुझे बताता है कि अगर मैंने सत्य पर अपनी पकड़ ढीली कर दी तो मैं अहिंसा की पहेली को कभी नहीं सुलझा पाउंगा.... दूसरे शब्दों में, सीधे ही अहिंसा का मार्ग अपनाने का साहस शायद मुझमें नहीं है। सत्य और अहिंसा तत्वतः एक ही हैं और संदेह अनिवार्यतः आस्था की कमी या कमजोरी का ही परिणाम होता है। इसीलिए तो मैं रात-दिन यही प्रार्थना करता हूं कि 'प्रभु, मुझे आस्था दें'

, पृ. 336


मेरा मानना है कि मैं बचपन से ही सत्य का पक्षधर रहा हूं। यह मेरे लिए बड़ा स्वाभाविक था। मेरी प्रार्थनामय खोज ने 'ईश्वर सत्य है' के सामान्य सूत्र के स्थान पर मुझे एक प्रकाशमान सूत्र दिया : 'सत्य ही ईश्वर है'। यह सूत्र एक तरह से मुझे ईश्वर के रू-ब-रू खड़ा कर देता है। मैं अपनी सला के कण-कण में ईश्वर को व्याप्त अनुभव करता हूं।

हरि, 9-8-1942, पृ. 264

सच्चाई में विश्वास

मैं आशावादी हूं, इसलिए नहीं कि मैं इस बात का कोई सबूत दे सकता हूं कि सच्चाई ही फलेगी बल्कि इसलिए कि मेरा इस बात में अदम्य विश्वास है कि अंततः सच्चाई ही फलती है.... हमारी प्रेरणा केवल हमारे इसी विश्वास से पैदा हो सकती है कि अंततः सच्चाई की ही जीत होगी।

हरि, 10-12-1938, पृ. 372


मै किसी-न-किसी तरह मनुष्य के सर्वोत्कृष्ट गुणों को उभार कर उनका उपयोग करने में कामयाब हो जाता हूं, और इससे ईश्वर तथा मानव प्रछति में मेरा विश्वास दृढ़ रहता है

हरि, 15-4-1939, पृ. 86

संन्यासी नहीं

मैंने कभी अपने आपको संन्यासी नहीं कहा। संन्यास बड़ी कठिन चीज है। मैं तो स्वयं को एक गृहस्थ मानता हूं जो अपने सहकर्मियों के साथ मिलकर, मित्रों की दानशीलता पर जीवन निर्वाह करते हुए, सेवा का विनम्र जीवन जी रहा है... मैं जो जीवन जी रहा हूं वह पूर्णतया सुगम और बड़ा सुखकर है, यदि सुगमता और सुख को मनःस्थिति मान लें तो। मुझे जो कुछ चाहिए, वह सब उपलब्ध है और मुझे व्यक्तिगत पूंजी के रूप में कुछ भी संजोकर रखने की कतई जरूरत नहीं है।

यंग, 1-10-1925, पृ. 338


मेरी लंगोटी मेरे जीवन का सहज विकास है। यह अपने आप आ गई, न मैंने इसके लिए कोई प्रयास किया, न पहले से सोचा।

यंग, 9-7-1931, पृ. 175


मैं विशेषाधिकार और एकाधिकार से घृणा करता हूं। जिसमें जनसाधारण सहभागी न हो सके, वह मेरे लिए त्याज्य है।

हरि, 2-11-1934, पृ. 303


मुझे संन्यासी कहना गलत है। मेरा जीवन जिन आदर्शों से संचालित है, वे आम आदमियों द्वारा अपनाए जा सकते हैं। मैंने उन्हें धीरे-धीरे विकसित किया है। हर कदम अच्छी तरह सोच-विचार कर और पूरी सावधानी बरतते हुए उठाया गया है।

मेरा इंद्रिय-निग्रह और अहिंसा, दोनों मेरे व्यक्तिगत अनुभव की उपज हैं, जनसेवा के हित में इन्हें अपनाना आवश्यक था। दक्षिण अफ्रीका में गृहस्थ, वकील, समाज-सुधारक या राजनीतिज्ञ के रूप में जो अलग-थलग जीवन मुझे बिताना पड़ा, उसमें अपने कर्तव्यों के सम्यक निर्वाह के लिए यह आवश्यक था कि मैं अपने जीवन के यौन पक्ष पर कठोर नियंत्रण रखूं, और मानवीय संबंधों में, वे चाहे अपने देशवासियों के साथ हों अथवा यूरोपियनों के साथ, अहिंसा और सत्य का दृढ़ता से पालन करूं।

हरि, 3-10-1936, पृ. 268


अनवरत काम के बीच मेरा जीवन आनंद से परिपूर्ण रहता है। मेरा कल कैसा होगा, इसकी कोई चिंता न करने के कारण मैं स्वयं को पक्षी के समान मुक्त अनुभव करता हूं.... मैं भौतिक शरीर की जरूरतों के खिलाफ निरंतर ईमानदारी के साथ संघर्षरत हूं, यही विचार मुझे जीवित रखता है।

यंग, 1-10-1925, पृ. 338


बिना आस्था के काम करना ऐसा ही है जैसा कि बिना पेंदे के गर्त का पेंदा ढूंढना।

हरि, 3-10-1936, पृ. 268 -69

अहंकार का त्याग

मैं जानता हूं कि मुझे अभी बड़ा मुश्किल रास्ता तय करना है। मुझे अपनी हस्ती को बिलकुल मिटा देना होगा। जब तक मनुष्य अपने आपको स्वेच्छा से अपने सहचरों में सबसे अंतिम स्थान पर खड़ा न कर दे तब तक उसकी मुक्ति संभव नहीं। अहिंसा विनम्रता की चरम सीमा है।

, पृ. 371


यदि हम धर्म, राजनीति, अर्थशात्र आदि से 'मैं' और 'मेरा' निकाल सकें तो हम शीदz ही स्वतंत्र हो जाएंगे, और पृथ्वी पर स्वर्ग उतार सकेंगे

यंग, 3-9-1926, पृ. 336


समुद्र की एक बूंद भी समुद्र की विशालता का एक हिस्सा होती है, यद्यपि उसे इसका भान नहीं होता। लेकिन समुद्र से छिटककर गिरते ही वह सूख जाती है। हम कोई अतिशयोक्ति नहीं करते जब यह कहते हैं कि जीवन मात्र एक बुलबुला है।

सत्यशोधक के लिए अहंकारी होना संभव नहीं है। जो दूसरों के लिए अपने जीवन का बलिदान करने को तत्पर हो, उसके पास इस संसार में अपने लिए स्थान सुरक्षित करने का समय कहां?

यंग, 16-10-1930, पृ. 2


व्यक्ति की क्षमता की सीमाएं हैं, और जैसे ही वह यह समझने लगता है कि वह सब कुछ करने में समर्थ है, ईश्वर उसके गर्व को चूर कर देता है। जहां तक मेरा प्रश्न है, मुझे स्वभाव में इतनी विनम्रता मिली है कि मैं बच्चों और अनुभवहीनों से भी मदद लेने के लिए तैयार रहता हूं।

यंग, 12-3-1931, पृ. 32


मेरे छत्यों का निर्णय मेरा भाग्य करता है। मैं कभी उन्हें खोजने नहीं जाता। वे अपने आप मेरे पास आ जाते हैं। मेरे संपूर्ण जीवन का-दक्षिण अफ्रीका में और भारत लौटकर आने के बाद से अब तक-व्म यही रहा है।

यंग, 7-5-1925, पृ. 163

अल्प पुस्तकीय ज्ञान

मैं अपनी सीमाओं को स्वीकार करता हूं। मैंने कोई उल्लेखनीय विश्वविद्यालयी शिक्षा प्राप्त नहीं की। हाई स्कूल तक मैं कभी औसत से ।पर का छात्र नहीं रहा। मैं परीक्षा में पास हो जाता था तो शुव्गुजार होता था। स्कूली परीक्षाओं में विशेष योग्यता प्राप्त करने की तो मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था।

 हरि, 9-7-1938, पृ. 176


अपनी पढ़ाई के दिनों में मैंने पाठय्पुस्तकों के अलावा शायद ही कुछ पढ़ा हो और सव्यि जीवन में प्रवेश के बाद मुझे स्वाध्याय के लिए प्रायः कम ही समय मिला। इसलिए मैं विशेष पुस्तकीय ज्ञान का कोई दावा नहीं कर सकता। बहरहाल, मेरे इस विवशताजन्य संयम से कोई विशेष हानि हुई नहीं दिखती। इससे उलट, हुआ यह है कि कम किताबें पढ़ने के कारण मुझमें यह योग्यता आई कि जो पढूं, उसे भीतर भली भांति गुनूं-मनन करूं

इन पढ़ी हुई पुस्तकों में से जिस एक पुस्तक ने मेरे जीवन में तत्काल और व्यावहारिक रूपांतरण कर डाला, वह थी 'अनटू दिस लास्ट'। बाद में, मैंने गुजराती में इसका अनुवाद किया जिसका शीर्षक रखा 'सर्वोदय' 1सब का कल्याण1। मेरा विश्वास है कि रस्किन की इस महान पुस्तक में मुझे अपनी ही गहरी आंतरिक निष्ठाएं प्रतिबिंबित होती दिखाई दीं और यही कारण है कि इसने मुझे विमुग्ध करके मेरे जीवन का रूपांतरण कर डाला

, पृ. 220


तब मैं दक्षिण अफ्रीका में रह रहा था। मैंने 'अन टू दिस लास्ट', पैंतीस वर्ष की अवस्था में 1904 में, डर्बन जाते समय रेल में पढ़ी। इसे पढ़कर मैंने अपने संपूर्ण बाहरी जीवन को बदल डालने का निर्णय ले लिया। मैं बस यही कह सकता हूं कि रस्किन के शब्दों ने मुझे विमुग्ध कर दिया। मैं एक साथ पूरी पुस्तक पढ़ गया और उसके बाद रात भर सो नहीं सका। मैंने तत्काल अपने संपूर्ण जीवनव्म को बदल देने का फैसला कर लिया। टाल्सटाय मैं बहुत पहले पढ़ चुका था। उसने मेरे अंतर्मन को प्रभावित किया था।

इंके, पृ. 245

गरीबों की सेवा

हृदय को सच्ची और शुद्ध कामना अवश्य पूरी होती है। अपने अनुभव में, मैंने इस कथन को सदा सही पाया हैं। गरीबों की सेवा मेरी हार्दिक कामना रही है और इसने मुझे सदा गरीबों के बीच ला खड़ा किया है और मुझे उनके साथ तादात्म्य स्थापित करने का अवसर दिया है।

, पृ. 110


मैंने जीवन भर निर्धनों से सदा प्रेम किया है और भरपूर मात्रा में किया है। मैं अपने विगत जीवन के अनेक उदाहरण देकर यह स्पष्ट कर सकता हूं कि मेरा यह प्रेम मेरे स्वभाव का अंग था। मुझे गरीबों के और अपने बीच कोई फर्क महसूस नहीं हुआ। मुझे वे सदा अपने सगे-संबंधी ही लगे हैं

हरि, 11-5-1935, पृ. 99


मुझे संसार के नाशवान साम्राज्य की कोई कामना नहीं है। मैं तो स्वर्ग के साम्राज्य के लिए प्रयासरत हूं, जोकि 'मोक्ष' है। मुझे इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए गुफा में जाकर वास करने की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता होती तो मैं ऐसा ही करता।

गुफा में वास करने वाला आदमी हवाई किले बना सकता है जबकि महल में रहने वाले जनक जैसे व्यक्ति को किले बनाने की कोई आवश्यकता नहीं। विचारों के पंखों पर बैठकर संसार में विचरण करनेवाले गुफावासी का शांति नहीं मिलती। इसके विपरीत, राजसी ठाठबाट में रहते हुए भी जनक विवेकपूर्ण शांति का अनुभव कर सके।

मेरे लिए अपने देश और उसके द्वारा समूची मानवता की अथक सेवा ही मोक्ष का मार्ग है। मैं समस्त प्राणी-जगत के साथ तादात्म्य स्थापित करना चाहता हूं।

यंग, 3-4-1924, पृ. 114


मेरा जीवन एक अविभाज्य समष्टि है, और मेरे सभी कार्यकलाप परस्पर गुंफित है; ये सभी कार्यकलाप मानवता के प्रति मेरे असीम प्रेम से उद्भूत हैं।

रि, 2-3-1934, पृ. 24


मुझे जीवन भर गलत समझा जाता रहा। हर एक जनसेवक की यही नियति है। उसकी खाल बड़ी मजबूत होनी चाहिए। अगर अपने बारे में कही गई हर गलत बात की सफाई देनी पड़े और उन्हें दूर करना पड़े तो जीवन भार हो जाए। मैंने अपने जीवन का यह नियम बना लिया है कि अपने बारे में किए गए गलत निरूपणों या मिथ्या प्रचारों पर स्पष्टीकरण न देता फिरूं सिवाय तब के जबकि उनको सुधारे जाने की जरूरत लगे। इस नियम के पालन से मेरी कई चिंताएं मिटीं और बहुत-सा समय बचा।

यंग, 27-5-1926, पृ. 193


मुझे लोग सनकी, झक्की और पागल बताते हैं। मैं इस ख्याति के सर्वथा योग्य भी दिखता हूं। कारण कि मैं जहां भी जाता हूं, मेरे पास सनकी, झक्की और पागल लोग आ जुटते हैं।

यंग, 13-6-1929, पृ. 193

व्यावहारिक स्वप्नद्रष्टा

मैं ईश्वर के, और इसीलिए मानवता के, परम एकत्व में विश्वास करता हूं। यदि हमारे शरीर अलग-अलग हैं तो क्या हुआ? आत्मा तो एक है। सूर्य की किरणें अपवर्तन के कारण अनेक हो जाती हैं पर उनका त्रोत तो एक ही है। इसलिए मैं बड़ी-से-बड़ी दुष्टात्मा से भी अपने को विलग नहीं कर सकता न ही मुझे बड़ी-से-बड़ी पवित्रात्मा के साथ तादात्म्य से वंचित किया जाना चाहिए। और इसीलिए मैं चाहे जो करूं, मुझे संपूर्ण मानवता को अपने प्रयोग में भागीदार बनाना चाहिए। मैं प्रयोग करना भी नहीं छोड़ सकता। जीवन प्रयोगों की एक अनंत श्रृंखला ही तो है।

यंग, 25-9-1924, पृ. 313


मुझे मेरे संपूर्ण दोषों के साथ ही स्वीकार किया जाना चाहिए। मैं एक सत्यशोधक हूं। मेरे लिए मेरे प्रयोग सर्वोलम तैयारी वाले हिमालय अभियानों से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं

यंग, 3-12-1925, पृ. 422


यह मेरा दुर्भाग्य अथवा सौभाग्य रहा है कि मैं दुनिया को हैरत में डाल देता हूं। नये प्रयोगों, या नये तरीके से किए गए पुराने प्रयोगों से कभी-कभी भ्रांत धारणा उत्पन्न हो ही जाती है

एफ्, पृ. 132


वस्तुतः मैं एक व्यावहारिक स्वप्नद्रष्टा हूं। मेरे स्वप्न हवाई नहीं हैं। मैं अपने स्वप्नों को जहां तक संभव हो, यथार्थ में परिवर्तित करना चाहता हूं।

हरि, 17-11-1933, पृ. 6


यदि मेरे द्वारा पवित्र माना गया मेरा कोई कार्य अव्यावहारिक सिद्ध हो जाए तो उसे असफल घोषित कर दिया जाना चाहिए। मेरा पक्का विश्वास है कि सर्वाधिक आध्यात्मिक कर्म सच्चे अर्थों में सर्वाधिक व्यावहारिक होता है।

हरि, 1-7-1939, पृ. 181

मेरी चूकें

मैं स्वयं को एक साधारण व्यक्ति मानता हूं जिससे अन्य मनुष्यों की ही तरह गलतियां हो सकती हैं। हां, मेरे अंदर इतनी विनम्रता जरूर है कि मैं अपनी गलतियों को स्वीकार कर सकूं और उनका सुधार कर सकूं। मैं यह भी मानता हूं कि ईश्वर और उसकी दयालुता में मेरा अविचल विश्वास है। साथ ही, मेरा सत्य और प्रेम में असीम अनुराग है। लेकिन, यह भावना क्या प्रत्येक मनुष्य के भीतर अंतर्निहित नहीं है?

यंग, 6-5-1926, पृ. 164


जिन्होंने सरसरी तौर पर भी मेरे साधारण जीवन-व्म पर दृष्टिपात किया है, उनके ध्यान में यह बात अवश्य आई होगी कि मैंने जीवन में एक भी काम किसी व्यक्ति या राष्टं को चोट पहुंचाने के लिए नहीं किया है.... मैं यह दावा नहीं करता कि मुझमें कोई खामियां नहीं हैं। मैं जानता हूं कि मैंने भयंकर भूलें की हैं, लेकिन मैंने वे जान-बूझकर नहीं कीं और न ही मैंने किसी व्यक्ति अथवा राष्टं या किसी मानव अथवा अवमानव के प्रति अपने मन में कभी किसी तरह का शत्रु-भाव पाला है।

एफ्,ा पृ. 133


मैंने अपने अनेक पापों को बिलकुल स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। लेकिन मैं इन पापों की गठरी को अपने कंधों पर लादकर नहीं चलता। यदि मैं ईश्वर की ओर अग्रसर हूं, जैसा कि मैं अनुभव करता हूं, तो मैं सुरक्षित हूं। कारण, कि मैं ईश्वर की उपस्थिति की उष्मा का अनुभव करता हूं।

मुझे पता है कि मेरी सादगी, मेरे उपवास और मेरी प्रार्थनाएं-तब कोई मूल्य नहीं रखेंगी जब मैं अपने को सुधारने के लिए उन्हीं पर आश्रित हो जाउंगा। लेकिन यदि वे आत्मा की इस ललक का प्रतिनिधित्व करती हैं कि अपने सिरजनहार की गोद में अपने श्रांत सिर को रखकर आराम और ताजगी पाई जाए, और मेरा मानना है कि वे इसी का प्रतिनिधित्व करती हैं, तो फिर उनका मूल्य अपरिमेय है

हरि, 18-4-1936, पृ. 77

सभी से नातेदारी

जब भी मैं किसी दोषी व्यक्ति को देखता हूं तो मैं अपने आप से कहता हूं की मैंने भी गलतियां की हैं; जब मैं किसी कामुक व्यक्ति को देखता हूं तो अपने आप से कहता हूं की मैं भी कभी ऐसा ही था; और इस प्रकार दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति के साथ मैं अपनी नातेदारी, अपनी बंधुता अनुभव करता हूं और यह अनुभव करता हूं कि जब तक हम में से सर्वाधिक दीन व्यक्ति सुखी नहीं होगा, मैं भी सुखी नहीं हो सकता।

यंग, 10-2-1927, पृ. 44


यदि मैं किसी को उसके प्राप्तव्य से कम दूं तो मुझे अपने प्रभु और सिरजनहार के सामने जवाब देना होगा, लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि यदि वह यह देखता है कि मैंने किसी को उसके प्राप्तव्य से अधिक दिया है तो वह मुझे आशीर्वाद अवश्य देगा

यंग, 10-3-1927, पृ. 80


मैं किसी व्यक्ति विशेष से नाराज नहीं होता, क्योंकि मुझे इस बात का अच्छी तरह अहसास है कि मेरी जाति के प्राणी अर्थात मानव कितने अपूर्ण हैं। मैं जहां भी कोई बुराई देखता हूं तो उसे दूर करने का प्रयास करता हूं; उसके लिए दोषी व्यक्ति को चोट पहुंचाने की कोशिश नहीं करता, चूंकि मैं भी तो यह नहीं चाहूंगा कि मुझसे निरंतर होनेवाली गलतियों के लिए कोई मुझे चोट पहुंचाए।

यंग, 12-3-1930, पृ. 89-90


मैं सच्चे हृदय से यह बात कह सकता हूं कि मैं अपने साथियों के दोष ढूंढने में बड़ा शिथिल हूं और चूंकि स्वयं मेरे भीतर इतने सारे दोष हैं इसलिए मुझे इन साथियों की उदारता की जरूरत है। लोगों के बारे में बहुत कड़े मानदंडों के आधार पर निर्णय न करना और उनकी भूलों को देखकर भी उदार रहना मैंने सीख लिया है।

हरि, 11-3-1939, पृ. 47

विरोधियों का सम्मान

दृष्टिकोणों की भिन्नता का अर्थ परस्पर युद्ध की स्थिति में होना नहीं है। यदि ऐसा हो तो मैं और मेरी पत्नी एक-दूसरे के घोर शत्रु बन जाएं। मैं किन्हीं ऐसे दो व्यक्तियों को नहीं जानता जिनमें कोई मतभेद न हों और चूंकि मैं गीता का भक्त हूं, मैंने सदा यह प्रयास किया है कि जिनका मुझसे मतभेद है, उनसे भी अपने स्वजनों और प्रियजनों जैसा ही प्रेमपूर्ण व्यवहार करूं।

यंग, 17-3-1927, पृ. 82


मुझे सदा यह देखकर संतोष का अनुभव हुआ है कि मैं जिनके सिद्धांतों और नीतियों का विरोध करता हूं, वे भी प्रायः मेरे प्रति अपना प्रेम और विश्वास यथावत बनाए रखते हैं। दक्षिण अफ्रीकियों ने भी व्यक्तिगत स्तर पर मुझे अपना विश्वास और मित्रता दी।

ब्रिटिश नीति और प्रणाली की भर्त्सना करने के बावजूद मुझे हजारों अंग्रेज स्त्री-पुरुषों का स्नेह प्राप्त है और आधुनिक भौतिकवादी सभ्यता की पूरी तरह निंदा करने पर भी मेरे यूरोपीय और अमरीकी मित्रों की संख्या बढ़ती ही जाती है यह भी अहिंसा की ही विजय है।

वही,